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सोमवार , 18 जून 2018

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सफ़दर हाशमी की 'हत्यारी पार्टी' का 'प्रचारक' बना 'सहमत' ट्रस्ट

सहमत संस्था ने अर्जुन सिंह के इशारे पर अयोध्या में एक प्रदर्शनी लगाई, जिसमें राम और सीता को भाई-बहन दिखाया।

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4 जनवरी 2018

नया हरियाणा

सफदर हाशमी एक नाटककार, कलाकार, निर्देशक, गीतकार और कलाविद थे। उन्हें भारत में नुक्कड़ नाटक के लिए जाना जाता है। भारत के राजनैतिक थिएटर में आज भी वे एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सफदर जन नाट्य मंच और दिल्ली में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के स्थापक-सदस्य थे। जन नाट्य मंच की नींव 1973 में रखी गई थी। सफदर की जनवरी 1989 में साहिबाबाद में एक नुक्कड़ नाटक 'हल्ला बोल' खेलते हुए हत्या कर दी गई थी।

किसने की हत्या?

पहली जनवरी, 1989 को उत्तर प्रदेश में पालिका चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में नाटक कर रहे थे। दोपहर दो बजे के करीब कांग्रेस समर्थित मुकेश शर्मा अपने समर्थकों के साथ नाटक मंडली से भीड़ गए और थोड़ी देर मुकेश शर्मा अपने करीब 150 साथियों के साथ डंडे और बंदूकों के साथ हमला कर दिया। इस हमले में रामबहादुर नामक व्यक्ति की गोली लगने से मौत हो गई। जो नाटक देख रहे थे। दूसरी तरफ सफदर हाशमी पर डंडों से हमला कर दिया। टाइम्स आफ इण्डिया ने  लिखा कि-"यद्यपि मुकेश शर्मा स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहा था, लेकिन सब जानते हैं कि वह कांग्रेस समर्थित है। मुकेश शर्मा ने अपना पोस्टर निकलवाया, जिसमें उसने खुद को "यूथ कांग्रेस का लीडर" कहा है।"

तीन जनवरी को सफदर हाशमी की राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मृत्यु हो गई। साप्ताहिक "द वीक" के अनुसार, "कांग्रेसी गृहमंत्री बूटा सिंह ने राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सफदर हाशमी की मृत्यु के पहले, उससे मिलना चाहा, लेकिन वहां बैठे कलाकारों ने उन्हें मिलने नहीं दिया, कहा कि पहले गुंडों को गिरफ्तार करो।"

सफदर हाशमी के आदर्शों की लड़ाई जारी रखने के लिए "सहमत" (सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) गठित किया गया। इस न्यास के प्रमुख न्यासियों में सफदर हाशमी की पत्नी मलयश्री हाशमी, सफदर की बहन शबनम हाशमी, भाई सुहेल हाशमी, एम.के. रैना आदि थे। सहमत ने कांग्रेस के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने सहमत को 35 लाख रुपए की पहली किस्त डाल दी। और सहमत, जो कल तक कांग्रेस के "गुण्डातंत्र" के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थी अचानक भाजपा, फासीवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध युद्ध का सबसे बड़ा लश्कर बन गयी।

देखते-देखते कांग्रेस के बजाय निशाना भाजपा बन गई

कहीं भी कांग्रेस को भाजपा को गाली देनी हो, उनके विरुद्ध धरना देना हो, नारे लगाने हों, मजमा लगाना हो या उनके विरुद्ध साहित्यकारों-कलाकारों को लामबन्द करना हो, तो सहमत ताबेदार की तरह कांग्रेस के हुक्म के पालन के लिए हाथ बांधे खड़ी रहने लगी। सहमत को कांग्रेस ने पैसे से खरीद लिया, जिसने सफदर की हत्या की अब सहमत उसी कांग्रेस की खरीदी गुलाम बन गई। इसी सहमत ने अर्जुन सिंह के इशारे पर अयोध्या में एक प्रदर्शनी लगाई, जिसमें राम और सीता को भाई-बहन दिखाया।

पत्रकार सुधीश पचौरी ने लिखा कि- "सफदर हाशमी की मौत के बाद उसे पीर बनाकर "सहमत" हर तरफ से चढ़ावा बटोर रहा है।" (आउटलुक, 1 जनवरी, 1997)

और इस तरह कांग्रेस और वामपंथी दल दोनों ने मिलकर सफदर हाशमी की शहादत को भुनाया है। जबकि सफदर हाशमी ने वामपंथी पार्टी के लिए कॉलेज प्रवक्ता का पद छोड़कर पार्टी की सेवा में अपनी जीवन समर्पित कर दिया। वामपंथी दल ने उसी कांग्रेस की गोद में बैठना पसंद किया, जिस पार्टी की वजह से उनका समर्पित कार्यकर्ता अपनी जान गंवा चुका था।


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