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नया हरियाणा

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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शहीद चंद्रशेखर आजाद : महान क्रांतिकारी जिसे देश की जनता ने समझा ही नहीं

चंद्रशेखर आजाद के जीवन के अनछुए पहलू.

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23 जुलाई 2018

योगेश गौतम

तसवीर देख कर किसी नायक की छवि को लेकर कयास लगाने में हमारी महारत के किस्से तो बाद में लिखे ही जाएंगे। पर आज हम बात करते हैं शहीद चंद्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व को लेकर। चंद्रशेखर का नाम सुनते ही एक खास किस्म की उग्र छवि हमारे दिलोदिमाग में तैरने लगती है। यह छवि चंद्रशेखर के असल व्यक्तित्व से मेल खाती भी है या नहीं। इस पर हमने विचार ही नहीं किया कि क्या चंद्रशेखर का व्यक्तित्व इसी तरह का था। यह परखने का सबसे आसान तरीका उनसे जुड़ा साहित्य होता है। पर हम ज्यादातर मामलों में साहित्य पढ़ने के बजाय एक फोलोवर की तरह नायकों को लेकर बर्ताव करने लगते हैं। उसे ही सच की तरह खुद भी परोसने लगते हैं। आइये आज आपको मिलवाते हैं चंद्रशेखर की शख्सियत से...
एक महान क्रन्तिकारी शायद जिसे उसके देश ने अभी तक सही से समझा भी नहीं है। ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि जो वो थे उसे ना समझ के अपनी तरफ से उन्हें पेश करना उनके साथ अन्याय ही है। और आजकल तो मैं देख रहा हूँ कि भगवान हनुमान के बाद तिरछी और गुस्से वाली तस्वीर आजाद की भी लगाई जा रही है। 
चन्द्रशेखर आज़ाद बहुत ही भावनात्मक और सहनशील प्रवृत्ति के इंसान थे। उनके सन्गठन के वो कमांडर इन चीफ थे और उन्हें ही दल का हैंडब्रेक भी समझा जाता था। साथ जुड़े हुए युवा कोई उत्तेजित कदम ना उठाये इसका उन्हें हमेशा ध्यान रहता था। दरअसल ज्यादातर कयास लोग उनकी एक तस्वीर को देख कर भी लगाते हैं। जिसमे वो अपनी मूंछो को ताव दे रहें हैं। उसके पीछे भी एक कहानी है। आज़ाद कभी भी फोटो खिंचवाना पसंद ही नहीं करते थे। लेकिन उनके मित्र और उस समय के फोटोग्राफर मास्टर कौल के आग्रह पर बड़ी मुश्किल से राजी हुए। और फोटो खिंचवाने से पहले उन्होंने कहा कि रुको मैं अपनी मूंछे ठीक कर लूँ। और इसी बीच मास्टर जी ने फोटो खिंच दिया। लेकिन वो तस्वीर आज भी युवाओं के सीने चोडे करने का दम रखती है। 
उनका अपनी माँ के साथ बहुत लगाव था। एक बार उनके पुराने मित्र रहे राजाराम शास्त्री ने उनसे पूछा कि तुम अब अपनी माँ के बिना कैसे रह लेते हो। तो वो बहुत रोये और बोले की एक बार भी जिन्दा रहते माँ से मिला तो मैं वापिस  लौट कर नहीं आ पाउँगा। 
नरम ह्रदय इतना था कि पहली गोली जिंदगी में भगत सिंह को बचाने के लिए सांडर्स के अर्दली चन्दन सिंह को मारी थी। उसके लिए भी पहले चन्दन सिंह को कई बार चेतावनी भी दी, लेकिन जब वो नहीं माना तो गोली उसके पट्ठ पर मारी। ताकि उसकी जान ना जाये। हालांकि ज्यादा खून बहने से चन्दन सिंह की मौत हो गयी। जिसका आज़ाद को जीते जी हमेशा दुःख रहा।
 


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