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नया हरियाणा

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

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राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा भर है जाट आरक्षण!

जाट समाज गर्म तवे के समान हो गया है, जिस पर सभी राजनीतिक दल रोटियां सेंक रहे हैं और जिसके नीचे आग सुलगाने का काम यशपाल मलिक गुट और राजकुमार सैनी गुट कर रहे हैं.

naya haryana

23 नवंबर 2017

नया हरियाणा

जाट समुदाय अगर समझदारी दिखाता है तो उन्हें आरक्षण मिल सकता है. अन्यथा गुटबाजी का शिकार निरंतर होता रहेगा. पार्टी-दर-पार्टी विश्लेषण करने पर कुछ नतीजे निकलते हैं. पहले कांग्रेस की बात करते हैं. क्योंकि जाटों को राज्य और केंद्र में आरक्षण देने का काम उन्होंने ही किया था. इसी से जुड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस सरकार की नियत जाटों को आरक्षण देने की है? जवाब अतीत में देख चुके हैं. अधूरे मन से अधूरा आरक्षण दिया गया था. जिसका हश्र यह हुआ कि कोर्ट में जाते ही वह धराशायी हो गया. अब विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस इस मुद्दे पर जितनी सक्रियता दिखा रही है. उतनी ही ईमानदारी देते वक्त दिखाई होती तो आज ये हालात ही पैदा नहीं होते.

अब बात करते हैं दूसरी विपक्षी पार्टी इनेलो की. इनेलो किसी भी सूरत में इतनी हैसीयत नहीं बना पाएगी कि वह केंद्र में जाटों को आरक्षण दिलवा सके. उसके पास हमेशा यह बहाना रहेगा कि उसके हाथ कटे हुए हैं. अगर राज्य में उनकी  सरकार बनती भी है तो वह राज्य तक सीमित होने के कारण आरक्षण के मुद्दे को नहीं सुलझा पाएगी. उसके लिए राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होना जरूरी है. उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों की हालत दिन-ब-दिन खराब ही होती जा रही है. जिसकी सबसे बड़ी वजह है सत्ता का लालच और क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा.

अब देखते हैं भाजपा सरकार की नियत. उसके पास राज्य और केंद्र दोनों में बहुमत है. परंतु उसकी नियत संदेह के घेरे में है. वह हर बार कोर्ट का बहाना बनाकर  खुद को बचाने का प्रयास करती है. भाजपा पर भाजपा के जाट नेता दबाव बना सकते थे. परंतु विपक्ष ने बड़ी चालाकी से उनके खिलाफ जाटों को ही खड़ा कर दिया. जिसके कारण उनका दबाव कमजोर हो गया. वरना जाट समझदारी दिखाते तो उन्हें मजबूत करते. उन पर दबाव बनाते. अगर वो फिर भी सरकार पर दबाव नहीं बनाते तो उनके खिलाफ मोर्चा खोलना आसान हो जाता. इस रणनीति से जाट समुदाय भाजपा सरकार पर बाहर और भीतर दोनों तरफ से दबाव डाल सकता था. 

इस सारी उठापठक में भाजपा के गैर जाट नेता फायदा उठा रहे हैं. क्योंकि जाट समाज का प्रतिनिधित्व करने वालों ने इस भागीदारी के सवाल को जाट समाज के सम्मान से जोड़कर समाज को दो भागों में बांट दिया-जाट और गैर जाट. अगर ये प्रतिनिधित्व करने वाले अपने व्यक्तिगत फायदे को दरकिनार करके समाज के लिए सोचते तो यह नौबत कभी नहीं आनी थी. और न राजकुमार सैनी इस फूट का फायदा उठा पाता. भाजपा हाईकमान पर न तो अब भीतर से कोई दबाव बन पा रहा है और न बाहर से. इस पूरे खेल में यशपाल मलिक गुट ने जो घालमेल किया, उसका नतीजा यह निकला कि न तो हरियाणा की भाजपा सरकार और केंद्र सरकार दोनों पर कोई खास दबाव नहीं बन पा रहा है. हालात दिन-ब-दिन उलझते ज्यादा जा रहे हैं.

दूसरी तरफ मुहिम इस तरह चलाई जा रही है कि आरक्षण लेने से ज्यादा बड़ा मकसद भाजपा सरकार की अक्ल को ठिकाने लगाना बन गया है. इसका नतीजा यह निकला कि आरक्षण की मांग अब ठंडे बस्ते में जा पहुंची है. यशपाल मलिक और उनके गुट के लोगों ने चंदे के मामले में जो ढुलमुल रवैया दिखाया है. उससे भी साफ पता चलता है कि वो भी जाट समाज को उलझाकर रखने में यकीन करते हैं. दूसरी तरफ जिन पर केस चल रहे हैं उनके मामले सुलझाने के लिए भी कोई सार्थक पहल नहीं की गई. बल्कि उनके मामले सुलझे ही नहीं. इस तरह के बयान भाजपा सरकार के खिलाफ दिए गए हैं कि कोई समाधान निकले ही नहीं. यशपाल गुट की करणी का ही फल है कि आज जाट आपस में बंटकर लड़ रहे हैं और समाज में 35 बिरादरी अलग से बुरा माने हुए है. वह भी यशपाल गुट के लोगों के कारण.
यशपाल गुट का पूरा फोकस अब संस्थान खोलने में है. इस गुट का राजनीतिक फायदा इसी में है कि मामला जितने लंबे समय तक उलझे रहेंगे, इनकी राजनीतिक रोटियां उतने समय तक सिकती रहेंगी. ऐसे हालात में कोई सुलझा हुआ नेतृत्व ही इनकी खाइयों को भर सकता है. वरना जाट समाज यूं ही भटकने के लिए अभिशप्त रहेगा.

(फोटो गूगल से साभार)

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