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वरिष्ठ पत्रकार रोहित सरदाना को मिल रही हैं धमकियाँ, पुलिस को की शिकायत

देश के मीडिया वर्ग में भी खेमेबाजी साफ देखने को मिलती है. जहां पत्रकारों के हितों के सवाल भी ग्रुप देखकर तय किए जाते हैं. दूसरों से सवाल करते-करते खुद से सवाल करना लगता है मीडियाकर्मी भूलते जा रहे हैं और पक्ष-विपक्ष की राजनीति के मौहरे बनकर खेलने लगते हैं. असहिष्णुता का सवाल भी इस एकांगी दृष्टिकोण की वजह से कभी देश की आम जनता के गले नहीं उतर पाया.

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22 नवंबर 2017

डॉ. नवीन रमण

किसी भी प्रकार की हिंसा को कभी भी समर्थन नहीं दिया जा सकता. वह चाहे धर्म, जाति और क्षेत्र आदि के नाम पर हो. परंतु खास नियत से एक का विरोध और दूसरे मामले पर चुप्पी सवाल तो खड़े करती ही है. देश का जाना-माना बौद्धिक-वर्ग जब किन्हीं खास मामलों में दिलचस्पी लेता है और बाकी के मामलों में चुप्पी साध लेता है. तो उनकी तथाकथित ईमानदारी सवालों के घेरे में आती है और इस चयनात्मक राजनीति के पीछे छिपे एंजेडे को उजागर करती है. वरना देश के बौद्धिक वर्ग को हर तरह की हिंसा और मॉब-लीचिंग की आलोचना समान ढंग से करनी चाहिए. जबकि ऐसा देखने में नहीं आता. जिसकी वजह से इस वर्ग की मंशा शंकाओं के घेरे में आ जाती है.

देश के मीडिया वर्ग में भी खेमेबाजी साफ देखने को मिलती है. जहां पत्रकारों के हितों के सवाल भी ग्रुप देखकर तय किए जाते हैं. दूसरों से सवाल करते-करते खुद से सवाल करना लगता है मीडियाकर्मी भूलते जा रहे हैं और पक्ष-विपक्ष की राजनीति के मौहरे बनकर खेलने लगते हैं. असहिष्णुता का सवाल भी इस एकांगी दृष्टिकोण की वजह से कभी देश की आम जनता के गले नहीं उतर पाया. वरना यह हर सरकार पर दबाव बनाने का काम करता. देश में असहिष्णुता, मॉब-लीचिंग आदि सवालों पर गंभीरता से विचार विमर्श होने के बजाय हुड़दंग ज्यादा मचता है और बौद्धिक किस्म की बौद्धिक जुगाली के साथ-साथ एक खास किस्म का प्रायोजित विरोध देखने को मिलता है. वह भी एक खास सरकार के खिलाफ. जबकि ये मसले वर्तमान समय की देन नहीं है और न ही सांप्रदायिकता कोई नई समस्या है. जबकि कुछ मीडियाकर्मी इस खेल में शिद्दत से लगे रहते हैं कि यह साबित कर दिया जाए कि यह सभी कुछ मोदी सरकार की ही देन है और हिंदू कट्टरता ही इसके मूल में है. जबकि कट्टरता किसी एक धर्म की बपौती न तो कभी रही है और न रहेगी. हर धर्म के अंदर कट्टरता के तत्त्व मौजूद हैं. जिसे चिह्नित किया जाना चाहिए. आरोप-प्रत्यारोप की गंदी राजनीति से निकलकर इनके समाधान खोजने चाहिए.

गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार रोहित सरदाना ने ट्विट किया. उनके ट्विट करते ही उन्हें और उनके परिवार को धमकियां दी जाने लगी. ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के लिए चिलपौंह करने वाले समुदाय पर जूं तक नहीं रेंगी. हिंदू धर्म में ही कट्टरता देखने वाले समूह को यह दूसरी हिंसा नजर नहीं आई और न ही मॉब-लीचिंग का मामला ही नजर आ रहा. मीडिया का वह वर्ग पूरी तरह खामोश है जो चुनिंदा मामलों में अभिव्यक्ति की आज़ादी की झंडाबरदारी करता है और ऐसा मानता है की बस वही हैं जो इसके लिए प्रयासरत हैं.

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फिलहाल रोहित ने मामले की शिकायत उत्तर प्रदेश पुलिस को कर दी है. दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई बड़े पत्रकारों और नेताओं ने भी यूपी पुलिस से मांग की है कि उन्हें धमकी देने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए. देखना दिलचस्प होगा कि इस मसले पर पुलिस क्या कार्रवाई करती है और लुटियन मीडिया का रुख क्या रहता है?

हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो- "हर किस्म की समझदार चुप्पियां खतरनाक होती है." बल्कि यहां तो शातिर अंदाज में भी नजर आने लगी हैं.

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