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बाजार की कठपुतलियां हैं सौंदर्य प्रतियोगिताएं!

इन्सान की सुन्दरता उसका श्रम, संघर्ष और जिजीविषा से बनता है। तुम्हारी बस्तियों में घूम-घूम कर तुम्हारा गंद साफ़ कर रही सरोज बाई किसी मायने में बदसूरत नहीं है।

naya haryana

21 नवंबर 2017

देव लोहान

गर्व के पल हैं, 17 साल बाद एक भारत की लड़की ने विश्व सुन्दरी के तमगे पर कब्ज़ा किया और हम सभी उद्वेलित हो उठे। आपस में ही लग गए बधाइयाँ देने जैसे कि अब हमारे दुःखों का, दिक्कतों का निवारण बस हो ही गया है। आज भारत ने एक ताज जीत लिया। अब देश की शान में हर किसी को कसीदे पढ़ने चाहिए।  इस वजह से पढ़ने चाहिए कि मानुषी ने हमें गर्व यानि दम्ब करने का एक मौका तो दिया। अब दम्ब और गर्व में एक लकीर मात्र का फर्क है। जहाँ आप अपनी किसी नई उपलब्धि पर गर्व कर सकते हैं। वहीं दूसरों की उपलब्धि पर खुद को बधाइयाँ देना और दूसरे पक्ष को लगभग अनसुना कर देना दम्ब ही है। यक़ीनन तौर पर मानुषी ने मेहनत की है और उसने एक सौंदर्य प्रतियोगिता जीती है। उसके लिए वो बधाई की पात्र है, लेकिन यह एक सामान्य-सी घटना है। लेकिन कुछ लोगों के लिए ये घटना असामान्य बन गई है। वजह यह है कि कुछ लोगों ने मानुषी का विरोध तो नहीं किया लेकिन सुन्दरता के अलग आयाम बता दिए। जिन पर बहस खड़ी हो गई जो कि मेरे मुल्क में बिल्कुल भी नई नहीं है।

भारत में मौजूदा बधाई देने वाले 95% लोग नहीं जानते कि MISS WORLD  प्रतियोगिता कब से, किसने और क्यूँ शुरू की? मौजूदा व्यवस्था में इसे कौन चला रहा है और क्यों? यहाँ तक की हम अनभिघ हैं कि MISS UNIVERSE और MISS WORLD दो अलग-अलग चीज़ हैं, जो अलग कंपनी संचालित करती हैं। MISS WORLD की शुरुआत ERIC MORLEY नामक इन्सान ने की थी। जिसका शुरूआती नाम BIKINI CONTEST था और उद्देश्य था एक ऐसी प्रतियोगिता जहां से एरिक अपनी बिकनी बिज़नस को बढ़ा सके और ज्यादा से ज्यादा बिकिनी और महिला शरीर को बाजारवाद की खातिर इस्तमाल में ला सकें। सन् 2001 में इनकी मृत्यु के बाद इनकी विधवा JULIA MORLEY इस व्यापार को चला रही हैं। अब इनका उद्देश्य सिर्फ बिकनी नहीं रहा बल्कि दुनिया भर की बिना इस्तेमाल की चीजों को बेचना हो गया है। दुनिया भर के विवादों के बाद भी आज भी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। जहाँ हर बड़ी कंपनी इसमें साझेदार है। जहां जरूरतों के हिसाब से सामान नहीं बनाया जाता, बल्कि सामान के हिसाब से जरूरतें पैदा की जाती हैं। इस खेल में इस तरह की प्रतियोगिताएं अहम् भूमिका निभाती हैं।

बहरहाल अब बात करते हैं दूसरी यानि  MISS UNIVERSE सौंदर्य प्रतियोगिता पर। इसकी शुरुआत की गई थी PACIFIC MILLS नाम की एक कपड़ा मिल ने, ताकि वो अपने उत्पाद बेचने के लिए बहतर दिखने वाली लड़कियां छांट सकें। बाद में अलग-अलग हाथों से होती हुई, इस वक़्त अमेरिका के महामहिम श्रीमान् DONALD TRUMP के पास इसका मालिकाना हक है। हाँ, ये वही TRUMP हैं, जिन्होंने अपनी मूर्खता की वजह से दुनिया भर में USA का मजाक बनवा रखा है। एक प्राइवेट कंपनी इसे संचालित करती है व सहयोग देती है। यानी के दोनों ही प्रतियोगिता निजी सम्पति मात्र है। जिनका संचालन एक परिवार मात्र करता है। इसमें काफी सारी शर्त रखी गई हैं। जिनमें एक शर्त चरित्र है। अब चरित्र में ये बिकिनी उत्पाद वाले किस चीज़ को रखते हैं ये बात तो वो ही जाने। बाकि रजनीगंधा पान मसाला से लेकर ULTRA BEVERAGE तक का पैसा इसमें लगा है।

अब शुरू करते हैं मुद्दे की  बात, सन् 1994 में एक साथ मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स पर कब्ज़ा किया दो भारतीय सुन्दरियों ने, ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन ने। वर्ष 1994 से पहले जहाँ हमारे बाथरूम में मात्र 2 से 3 बोतल होती थी, एक साधारण शैम्पू, एक साधारण तेल और एक कोई इत्र अब इन्हीं बोतलों की संख्या लगभग 15 हो चुकी है, क्योंकि ऐश्वर्या और सुष्मिता जैसा बनना है तो आपको LUX से नहाना जरुरी है, बालो में DOVE शैम्पू लगाना जरुरी है, शैम्पू के बाद एक कंडीशनर तो बेहद जरुरी है, हाथ धोने का साबुन अलग होगा, शरीर का साबुन अलग और मुंह का साबुन अलग, मुंह पर साबुन से काम नहीं चलेगा सुष्मिता जैसा मुंह चाहिए तो XYZ कंपनी के फेशवाश से मुंह धोना जरुरी है, बालों में सिर्फ कंडीशनर और शैम्पू से काम नहीं चलेगा। तेल के साथ सीरम भी लगाना पड़ेगा। ये सब हमें किसने बताया और किसने मनवाया? हमारे समाज की दो सुन्दरियों ने, क्योंकि हम सब इनके जैसा बनना चाहते है। तो हमे वो ही करना पड़ेगा जो ये करती हैं। दूसरों जैसा बनने की चाहत पैदा करना और फिर उनका अनुसरण करवाना ही बाजार को ताकत देता है। कब LOREAL, P&G , UNILEVER, LAKME, GODREJ हमारे बाथरूम में घुस गए पता ही नहीं चला। आज हमारी व्यय योग्य आय का सबसे बड़ा हिस्सा ये ही खा रहे हैं। जबकि हम अहंकार और दम्ब के कारण पूंजीवाद का ये स्वरूप देखना ही नहीं चाहते। या देखकर अनदेखा कर देते हैं।

क्या सुन्दरता मापी जा सकती है?
बाज़ार ने सुन्दरता मापने के नए-नए मापदंड दे दिए हैं। जैसे गोल नितंब, लम्बी टांगे, भरी हुई जांघ, उभरे हुए होंठ आदि यही तो है सुन्दरता। हर किसी को यही चाहिए और ऐसा बनना है तो बाज़ार में हर वो रास्ता है जो आपको ऐसा बना सकता है। लेकिन क्या सही मायनो में सुन्दरता यही है। नहीं, सुन्दरता वो है जो मदर टेरेसा में थी। सुन्दरता तो वो है जो फूलन देवी में थी, जो सावित्री बाई फुले में थे, झलकारी देवी में थी। क्या आज तक किसी भी सुन्दरता की इन तथाकथित देवियों ने समाज के लिए कुछ किया? हमारे सामने ही ऐश्वर्या से लेकर प्रियंका तक है, जहाँ ये मुल्क पनामा पेपर और पैराडाइस पेपर में नाम आने पर भी अमिताभ बच्चन को अपना पूजनीय समझता है, वहां सुन्दरता की देवियों से सवाल करना ही पाप समझा जायेगा। 
Elenor Rossevelt बहुत पहले कह कर गए थे--
small minds discuss people /Average minds discuss events / Great minds talk about ideas.

इस मुल्क में फिलहाल भीड़ के खिलाफ बोलना एक जुर्म-सा बन गया है। मानुषी छिल्लर को किसान जाट कहकर खुद से उसको जोड़ने वाले मेरे साथी बताये की, क्या मानुषी उन किसानों की समस्याओं को लेकर अब तक कितनी बार बोली है या भविष्य में बोल सकती है। क्या मानुषी छिल्लर की ये जीत विकास की पंक्ति में खड़े आखरी व्यक्ति को कोई फायदा पहुंचाएगी? यह एक प्राइवेट कंपनी के निजी उपक्रम में एक निजी जीत है। जिस पर मानुषी छिल्लर को बधाई दी जा रही है, लेकिन इसे किसी देश या समाज के लिए उपलब्धि बताना उतना ही शानदार है, जितना की विजय माल्या को नया हवाई जहाज लेने पर देश में खुशियाँ मनाना। एक और पक्ष यहाँ खड़ा हुआ है कि मानुषी डॉक्टर है और डॉक्टर बनने के लिए सबसे ज्यादा मेहनत करनी होती है। वो इसलिए क्योंकि हमारे मुल्क में डॉक्टर की सीट इतनी काम है कि इसे मुल्क ने अपने आप मेहनत का विषय बना दिया वरना न जाने कितने देशो में mbbs की सीट पूरी नहीं हो पाती और वो अपने छात्र भी दूसरे देशो से मंगवाते हैं।

इस तरह से एक व्यक्ति मात्र की जीत पर यूँ झूम जाना हमारी बौद्धिक विक्लांगता को ही दर्शाता है। इन्सान की सुन्दरता उसका श्रम, संघर्ष और जिजीविषा से बनता है। तुम्हारी बस्तियों में घूम-घूम कर तुम्हारा गंद साफ़ कर रही सरोज बाई किसी मायने में बदसूरत नहीं है। खेतो में बाजरे की पुलिया काटती पिंकी को सजने की फुर्सत नहीं है। एक व्यक्ति की जीत पर झूमने वाले उन महान इंसानों यानि खिलाड़ियों, अभिनेताओं ,सुन्दरियों से पूछे तो सही कि उन्होंने उन्होंने समाज के लिए क्या किया है?

झूम जाना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए बहाने क्यों चाहिए? मानुषी छिल्लर जाट समाज से है, इसलिए जाट झूम उठे कल मानुषी जब बाजारवाद की हद में आकर उत्पाद बेचेगी तो उसमें जाट अपना हिस्सा ढूंढे. वरना झूमने वाले लोग जाकर मानुषी छिल्लर को बोले कि आपको एक मुकाम मिला है. जहाँ आपकी आवाज़ दुनिया सुन लेगी तो आप मरते हुए मजदूर किसान की आवाज़ उनके कानो तक पहुँचाओ. अगर आप ऐसा करने में विफल रहोगे तो मान लेना कि एक बार फिर बाज़ार ने आपको बेवकूफ बना दिया.
 

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