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नया हरियाणा

शनिवार, 22 सितंबर 2018

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इनेलो बसपा गठबंधन भी नहीं सुलझा पा रहा है हिसार के भाटला गांव की समस्या

हिसार संसदीय क्षेत्र में आने वाले भाटला गांव में जाटों व ब्राह्मणों ने दलितों का बहिष्कार किया हुआ है.

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12 जुलाई 2018

मनास

मनास ने फेसबुक पर हरियाणवी समाज के जातिगत तानेबाने में राजनीतिक चेतना के विविध आयामों का विश्लेषण किया है.

5 जुलाई की रात हिसार के एक गाँव भाटला में था. भाटला वह गाँव है जहाँ पिछले एक साल से जाटों व ब्राह्मणों ने दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर रखा है. जाट सरपंच ने तो मुझे घर में घुसने ही नहीं दिया, फूहड़ ढंग से बात की सो अलग.फिर मैं एक दलित (अजय) के घर पर रूका. उन्हीं की बस्ती में रात दो बजे तक, लगभग चालीस-पचास दलितों की उपस्थिति में बैठक चलती रही. उनका अनुशासन, सुनने का धैर्य, सीखने की ललक, आंबेड़कर की शिक्षाओं पर अमल; सबने मुझे प्रभावित किया.

हालांकि दक्षिण हरियाणा की तरफ़ दलितों के साथ इस तरह का अन्याय कभी सुनने में नहीं आया. इससे मैंने दो निष्कर्ष निकाले. एक, जहाँ-जहाँ खाप पंचायतें ज़्यादा हावी हैं, वहाँ दलितों पर दमन ज़्यादा हो रहा है. दूसरा, यहाँ के जाटों (मतलब मध्य और उत्तर पश्चिमी हरियाणा) को मैंने क़रीब से देखा और पाया कि वो बेकार के जातीय दंभ में धंसे हुए हैं. उनसे ज़्यादा सामाजिक चेतना तो दलित जातियों में देखने को मिली. वह दिन दूर नहीं जब हरियाणा के जाटों की हालत भी राजस्थान के ठाकुरों जैसी हो जायेगी.

हरियाणा में इनेलो व बसपा का गठबंधन है लेकिन इन पार्टियों के किसी भी नेता की तरफ़ से गाँव में जाकर, समस्या को सुलझाने का प्रयास नहीं किया गया है.  स्थानीय प्रशासन का भी कोई सहयोग पीड़ित पक्ष को नहीं मिल रहा है. उल्टा वह झूठे मुकदमों के सहारे दलितों को और प्रताड़ित ही कर रहा है.  लेकिन सबसे अच्छी बात ये है कि इन सबके बावज़ूद भी ये लोग हार नहीं मान रहे हैं और संगठित होकर लड़ रहे हैं. इनके संघर्ष को सलाम. हालांकि दलितों में से ही कुछ दलित, दबंगों के दबाव में आकर, संघर्ष से सुविधाजनक दूरी बनाए हुए हैं. यह बहुत ही निराश करने वाली बात है.

अब सबसे महत्वपूर्ण बात कि इस समस्या का हल क्या हो? 

भाटला के दलितों को तो मैं बता आया कि इसका स्थायी समाधान क्या हो सकता है. आप लोगों को भी बताऊँगा लेकिन अभी नहीं, सही समय आने पर.


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