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नया हरियाणा

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

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टीवी पत्रकारिता और सोशल मीडिया में फिलहाल कोई मुकाबला नहीं: रोहित सरदाना

रोहित सरदाना भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता का बड़ा चेहरा हैं. वे उन चुनिन्दा पत्रकारों में शामिल हैं जो ना केवल युवा पत्रकारों बल्कि दर्शकों के भी रोल मॉडल हैं. हरियाणा के कुरुक्षेत्र के मूल निवासी रोहित खुद के हरियाणवी होने पर गर्व महसूस करते हैं और कई बार हरियाणवी में ट्वीट भी करते हैं. फेसबुक और ट्विटर पर उन्हें 20 लाख से भी ज्यादा लोग फॉलो करते हैं. पढ़िए उनका Exclusive इंटरव्यू.

naya haryana

20 नवंबर 2017

नया हरियाणा

क्या एक पत्रकार के संस्थान बदल लेने से पत्रकार के तेवर और शैली बदल जाते हैं?
मुझे नहीं लगता कि संस्थान बदलने से किसी के चीज़ों को देखने- समझने का तरीका बदलता है. संस्थानों की सोच अलग हो सकती है, व्यक्तियों की सोच तब तक नहीं बदलती जब तक वे स्वयं न चाहें. 

सोशल मीडिया के दौर में टीवी पत्रकारिता पर किस तरह के दबाव आप महसूस करते हैं?
टीवी पत्रकारिता और सोशल मीडिया में फिलहाल तो कोई ऐसा मुकाबला दिखता नहीं. सोशल मीडिया टीवी के लिए प्रतियोगी नहीं, सहयोगी की तरह उभरा है. जो बहुत सी ऐसी ख़बरों को टीवी पत्रकारों तक जल्दी पहुंचाता है, जहां तक टीवी पत्रकार खुद पहुंचने में शायद ज़्यादा समय ले लें. और उनकी गलतियों को दुरूस्त करने में भी सोशल मीडिया देर नहीं लगा रहा. 

आप सोशल मीडिया और टीवी दोनों पर इतने सहज कैसे रह पाते हैं, जबकि कई पत्रकार परेशान नज़र आते हैं?
अगर व्यक्ति अपने सोच-विचार-आचार में सहज है, तो वो हर जगह सहज ही रहेगा. चाहे सोशल मीडिया पर चाहे टीवी पर. अगर जो विचार पर आप सोशल मीडिया पर रख रहे हैं, वो टीवी पर न रख पाएं तो फिर आपको एक माध्यम से हट जाना चाहिए. ऐसा मुझे लगता है. और अगर आप कहीं स्वयं इस बंधन को मान्यता देते हैं कि टीवी की अपनी सीमाएं हैं वहां कोई बात नहीं कही जा सकती - लिहाज़ा आप सोशल मीडिया का सहारा ले कर वो बात कहते हैं, तो भी बुरा नहीं है. लेकिन दोनों बातें सौ फीसदी एक दूसरे से उलट हों - ऐसा नहीं लगना चाहिए. कोई भी संस्थान या मीडिया समूह, अपने पैसे पर आपको क्रांति तो नहीं ही करने देगा ना !

समाज, राजनीति के साथ पत्रकारिता में आये बदलावों को आप कैसे देखते हैं?
समय के साथ पत्रकारिता बदली है. अब उदंत मार्तंड नहीं है. अब उद्योग घराने हैं. उनके पैसे से समाचार उद्योग चलता है. लाखों लोग रोज़गार पाते हैं. विज्ञापन की उसमें अपनी जगह है. आदर्श स्थिति कहीं होती नहीं है. आदर्श स्थिति बनानी पड़ती है - वो भी अधिकतम सीमाओं तक, जो सौ के पैमाने पर सौ तक आदर्श कभी नहीं होती. 

पत्रकारिता के क्षेत्र में यह सभी जानते हैं कि लेखन के लिए साहित्य पढ़ना जरूरी है, परन्तु इस पर कभी बात नहीं होती कि टीवी पत्रकारिता के लिए क्या करना पड़ता है? बहुत से युवा इस जानकारी के अभाव में फेमस पत्रकारों के क्लोन बनने की कोशिश करते हैं. आपकी क्या राय है?
टीवी पत्रकारिता की भी वहीं ज़रूरतें हैं जो प्रिंट की हैं. विषय का ज्ञान होना ज़रूरी है. भाषा पर पकड़ होनी ही चाहिए. समाचार को समझ पाने की क्षमता के बिना काम चलेगा नहीं. 

पिछले कुछ वर्षों में टीवी एंकरों में एक खास बदलाव नज़र आने लगा है वह यह कि एंकर प्रवचन देने वाले मॉड में जाकर अपनी बात रखने लगे हैं? क्या जनता पहले की तुलना में अज्ञान हुई है या पत्रकारों को कुछ खास ज्ञान मिल गया है?
मैं इससे सहमत नहीं हूं. भारत में टेलीविज़न पत्रकारिता धीरे धीरे आगे बढ़ रही है. उसके सामने जो रोल मॉडल हैं - भले बीबीसी या सीएनएन हों या कोई और - सबकी अपनी अपनी कमियां हैं. हर व्यवस्था की खूबियां और खामियां होती हैं. भारतीय टीवी की भी हैं. प्रवचन देने वाले एंकर भी हैं, वचन देने वाले भी और बिना टोका टाकी किए मेहमान को पूरा सुन लेने वाले भी. हर का एक दौर होता है. कभी लोगों को जिनके प्रवचन खूब अच्छे लगते थे, वो अब टीआरपी के पायदानों पर जगह बनाने के लिए घिसट रहे हैं. कई ऐसे हैं जो समय के साथ न चल पाने के कारण कब रेस से बाहर हो गए, शायद आप लोगों ने ध्यान भी नहीं दिया. कई धूमकेतु की तरह आएँगे और चले जाएंगे - दो दिन याद करने के बाद कोई पूछेगा भी नहीं. और यही टेलीविज़न की खूबी भी है, वो सतत है. लगातार बदलाव करता है.  

क्या आपको नहीं लगता कि टीवी की भाषा और तेवर पहले की तुलना में बहुत ज्यादा आक्रामक हो गयी है?
टीवी की भाषा और तेवर जब ठंडी थी तो लगता था कि सरकारी है. जब गर्म और तल्ख हो गई तो लगने लगा कि विद्रोही है. लेकिन टीवी की भाषा और प्रस्तुतीकरण समय और ज़रूरत के हिसाब से बदलती रहती है. हर दिन चिल्लााने वाले भी दर्शकों को हज़म नहीं होते, हर दिन सरकार की पैरवी करते रहने वाले भी और हर समय विरोध करने वाले भी.

राजनीतिक दलों की तरह टीवी पत्रकारिता में भी दलबाजी शुरू हो गयी है। इससे जनता का भला होगा या मीडिया उद्योग का?
दक्षिण भारतीय न्यूज़ इंडस्ट्री को गौर से देखिए. आपको पता चलेगा कि हर पार्टी का अपना न्यूज़ चैनल धड़ल्ले से चल रहा है. और जनता हर चैनल को देख ही रही है. हिंदी और अंग्रेज़ी के चैनल्स में अभी ऑब्जेक्टिविटी बची है. उनकी ज़रूरतें और उनसे अपेक्षाएं, दोनों में बैलेंस बनाए रखने वाले संपादक अभी मौजूद हैं. और मालिकान को भी ये समझ है कि चैनल चलता रहे इसके लिए ज़रूरी है वो एक ही धारा में न बहें.

युवा पत्रकारों को कोई खास सलाह जो उनका मार्गदर्शन कर सके।
मेहनत से कभी मत डरिए. 

टीवी पत्रकारों की देह भाषा पर गौर करने से एक बात तो समझ आती है कि इसके दुष्प्रभाव उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ते होंगे। कैसे इस दुनिया और परिवार के बीच तालमेल बनाते हैं?
ऐसा अभी तक तो हुआ नहीं. न ही ऐसा कोई टीवी पत्रकार मिला जो टीवी पर गुस्से वाला दिखता हो और असल ज़िंदगी में भी वैसे ही चीखता चिल्लाता रहता है. बाकियों का पता नहीं, मुझसे मिलिएगा तो आपका ये भ्रम दूर हो जाएगा. परिवार के साथ समय बिताना, सारे तनाव और दबाव को दूर कर देता है.  
 

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