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शादी में जरूर आना : दुनिया के आंतरिक उथल-पुथल और रिश्तों के संघर्षो की दुनिया से रू-ब-रू कराती फिल्म

फिल्म देखकर आप अंत में तय कर पाते हैं कि वास्तव में कोई गलत या सही नहीं होता है, बस वक्त और हालात आदमी को मजबूर कर देते हैं. 

shadi me jrur aana, naya haryana

18 नवंबर 2017

डॉ. अजित

पहले मुझे लगा यह  'बदरी की दुल्हनिया' टाइप की मूवी होगी और शुरूवात में थोड़ी वैसी लगी भी. मगर धीरे-धीरे 'शादी में जरूर आना' फिल्म अपने उनवान पर चढ़ी और फिल्म का तेवर और कलेवर दोनों ही बदल गए. चूंकि मैं उत्तर प्रदेश का बाशिंदा हूँ इसलिए पीसीएस की पद प्रतिष्ठा को ठीक से समझता हूँ. फिल्म का कथानक इलाहाबाद को केंद्र में रखकर बुना गया है और यूपी में इलाहाबाद सिविल सर्विस की तैयारी करने वालों का मदीना रहा है.
शादी में जरूर आना मध्यमवर्गीय चेतना के जटिल बुनावट को सिनेमेटिक फॉर्म में दर्शको के समक्ष रखने की एक ईमानदार कोशिश करती है. सपनें, सिविल सर्विस, दहेज़, लिंग भेद, नैतिकता, प्रतिशोध और शो ऑफ़ आदि जैसे तत्वों ने फिल्म की कहानी के कहन को आसान और प्रभावी बनाया है.
सत्येन्द्र ऊर्फ सत्तू और आरती शुक्ला के प्रेम को समझने के लिए आपको अपनी स्टूडेंट लाइफ में बार-बार झांकना पड़ता है और फिल्म आपको अतीत में ले जाती है. जहां किसी के लिए खुद को सिद्ध करना था या किसी के लिए खुद सिद्ध होना था. प्रेम मे विश्वास एक अनिवार्य तत्व है, मगर जब सामने एक अप्रत्याशित सपना आकर खड़ा हो जाए तो फिर आपका विवेक भी साथ छोड़ देता है. उसके बाद चीज़ें अपनी दिशा खुद तय करने लगती हैं. फिल्म में सपना ऐसे ही अचानक सामने आता है और फिल्म की शुरुवात से चल रही एक गुदगुदी को तनाव में बदल जाता है.
प्रेम में रिजेक्शन किसे अच्छा लगता है, मगर मुझे इस फिल्म में नायक का रिजेक्शन नही लगा. वह दरअसल हालात का रिजेक्शन था. जो अप्रत्याशित ढंग से घटित होता चला गया. सत्तू की सादगी और आरती का चुलबुलापन फिल्म के पूर्वाद्ध में बहुत हंसाता है, मगर बाद में दोनों को देखकर लगने लगता है क्या ये वही लव बर्ड हैं?
शादी में जरूर आना एक साफ़ सुथरी एक रेखीय फिल्म है. हाँ, फिल्म में कुछ अति भी है- जैसे डीएम बने सत्येन्द्र मिश्र का छापे के दौरान खुद तोड़-फोड़ करना मुझे नही लगता. कोई आई ए एस अधिकारी खुद इस तरह से करता होगा भले ही उसकी निजी खुन्नस क्यों न रही हो. फिल्म की कहानी में एक यह झोल मुझे जरूर लगा. इसके अलावा मेरा इंतकाम देखोगी..गाना भी प्रेम में अवांछित हिंसा का प्रतिनिधत्व करता है, मगर रोचक बात है इस गाने पर फिल्म में खूब सीटियाँ बजी. इसका मतलब है भारतीय पुरुष दर्शक अब भी दिल में गुबार लेकर जीता है. जो नही मिल सका उसे एक बार सबक जरुर सिखाना है. ये अमूमन एक मनोवृत्ति है. हालांकि मैं इसे अनुचित मानता है. 
फिल्म की कहानी कमल पांडे ने बहुत बढ़िया और गठन के साथ लिखी है. फिल्म देखतें हुए आप फिल्म से बंधे रहते हैं और फिल्म आपको एक पल के लिए भी बोर नही करती है फिल्म में गाने भी अच्छे हैं.
शादी में जरुर आना आपको प्रेम की एक रेखीय दुनिया के आंतरिक उथल-पुथल और रिश्तों के संघर्षो की दुनिया से रूबरू कराती है और मनुष्य के अंदर उपेक्षा और तिरस्कार से उपजे प्रतिशोध को देखने का अवसर देती है. मगर फिल्म देखकर आप अंत में तय कर पाते हैं कि वास्तव में कोई गलत या सही नही होता है. बस वक्त और हालात आदमी को मजबूर कर देते हैं. 
शादी में जरूर आना एक निमंत्रण है या धमकी ये आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा. मेरे ख्याल से सर्दी के इस मौसम में ऐसी शादी में एक बार जरूर जाना चाहिए. इसी बहाने आपको अपनी कहानी को रिमाइंड करने का मौक़ा मिलेगा. जो भले ही ऐसी न हो मगर उसके कुछ तार इससे जरूर मिलते-जुलते होंगे. बशर्ते आपने किसी से सच्चा प्रेम किया हो.
 


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