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नया हरियाणा

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

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किसानों की कर्ज माफी बीमारी या वरदान

किसानों की कर्ज माफी को लेकर यह बहस चलती रहती है.

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6 जुलाई 2018

नारायण तेलहान

"कर्ज माफी की बीमारी", यह है आज के दैनिक जागरण अखबार का एडिटोरियल। इसका विषय है किसानों की कर्ज माफी, और इसके लिखने की वजह है कर्नाटक सरकार द्वारा किसानों के लिए कर्ज माफी की घोषणा। इसमें कई मुद्दे उठाए गए हैं जिनका मैं समर्थन करता हूं, आपको भी करना चाहिए। इनमें दो मुख्य हैं। पहला, कि बार बार कर्ज माफ होने से किसानों को यह आशा लगी रहती है कि कभी न कभी कर्ज माफ हो ही जाएगा इसलिए क्यों लौटाया जाए। परिणामस्वरूप कर्ज लौटाने की स्थिति में होते हुए भी नहीं लौटाते। दूसरा, कि कर्ज माफी से किसानों का कोई स्थायी भला नहीं होता, उल्टा देश की बैंकिंग व्यवस्था चरमरा जाती है।
इस मन्तव्य से सहमत होते हुए भी एक सवाल ज़हन में उठता है जिसका उत्तर दैनिक जागरण को देना चाहिए। सवाल यह है कि इस संपादकीय में औद्योगिक घरानों के हजारों लाख करोड़ बट्टा खाता में डाल दिये जाते हैं तब बैंकिंग व्यवस्था नहीं चरमराती क्या? उद्योग के उद्धार के नाम पर लाखों करोड़ की सब्सिडी सहायता दे दी जाती है और किसी को कानों कान खबर नहीं होती, तब यह व्यवस्था नहीं चरमराती क्या? राजनेता लोग, जो देशभर में लाखों की संख्या में हैं, और जिन्होंने कार खरीदने के लिए, बंगला बनाने के लिए आदि आदि नाम पर हजारों करोड़ रुपया लगभग बिना सूद के लोन पर ले रखा है संसद और विधानसभाओं के सचिवालयों के माध्यम से, और न मूल लौटाया जाता है न ब्याज (जो भी मामूली है) की अदायगी की जाती है। इन्हें न कोई डिमांड नोटिस दिया जाता है, न कोई रिकवरी सूट दायर होता है, न इनके माल असबाब जमीन जायदाद की कुर्की होती है। कुछ लोगों के पास दर्जनों गाडि़यां हैं, शहर शहर बंगले हैं, फिर ये लोन लेते हैं और इस पैसे को या तो आगे महंगी ब्याज दरों पर देते हैं, या फिर जायदाद खरीद फरोख्त के धंधे में इन्वेस्ट करके एक के हजार तक बनाते हैं और फिर भी नहीं लौटाते, क्या इससे बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होती है? एक बार एम एल ए या एमपी बन गया तो जिंदगी भर के लिए देश का खसम बन गया। पेंशन के विशेष चिकित्सा सुविधा मुफ्त।यात्रा मुफ्त। यानी उसकी और उसके परिवार की पांच सितारा स्तर की परवरिश की जिम्मेदारी देश के कंधों पर आ जाती है। इसी तरह सरकारी अधिकारी के बारे में है।
अखबार वाले बेशकीमती जगह मुफ्त प्लाट मारते हैं। मशीनों पर कागज पर विशेष सब्सिडी लेते हैं। सरकार से करोड़ों के विज्ञापन लेते हैं। इसके खिलाफ, इसके हक में लिखने का नाटक करके करोडों ऐंठ लेते हैं। तब तो बैंकिंग व्यवस्था नहीं चरमराती !!!!!
आजकी भारतीय आर्थिक राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था में किसान से अधिक बेचारा और बेसहारा और कोई भी नहीं है। उसका अपना कुछ भी नहीं। उसे किसी तरह की सुविधा या सुरक्षा की गारंटी नहीं है। उसके उत्पाद पर उसे दो रुपए मिलते हैं और आढती 10 रुपये बना लेता है जबकि किसान के पांच रुपए खर्च हुए हैं इस उत्पाद पर। अगर इसको रात में सर्दी लग कर निमोनिया हो जाए, या रात को पानी चलाते सर्प काट ले या कस्सी से पैर कट जाए तो उसके लिए कोई मुफ्त चिकित्सा सुविधा नहीं है जबकि नेता उद्योग पति या बडे अधिकारी को छींक भी आज जाए तो डाक्टरों की टीम पंजों पर आ जाती है।
इसलिए उक्त संपादकीय लिखने वाले से मेरा निवेदन है कि इन बातों पर भी, संपादकीय न सही, कभी-कभी कोई साधारण लेख ही संपादकीय पृष्ठ पर दे दिया करो।
इस सबके बावजूद मैं अपने किसान भाइयों को सलाह दूंगा कि खेती के लिए लिए गए कर्ज के पैसे को अन्यत्र खर्च करके दुरुपयोग कभी न करें। लिये गए कर्ज को जहां तक संभव हो लौटाने की कोशिश ईमानदाराना करें। कर्ज लेकर न लौटाना किसान की आन बान शान और स्वाभिमान के खिलाफ है। यह काम संपादकीय वालों को करने दें....... किसान तेरे दुश्मनों की कोई गिनती नहीं लेकिन तेरे तथाकथित नेता, जो तेरे नाम पर लूट मचाकर चंद दिनों में उद्योगपतियों की कतार में पहुंच जाते हैं और फिर भी तुझे बहकाने के लिए किसान नेता होने का दम भरते रहते हैं, ये दम्भी तेरे सबसे बड़े और सबसे खतरनाक दुश्मन हैं.... आस्तीन के सांप!


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