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नया हरियाणा

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

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क्या कुलदीप बिश्नोई भजन लाल के 'कपूत' हैं?

मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जब आरोप सीधे लगाए हैं तो जाहिर है जवाब भी सीधा आना चाहिए था.

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26 जून 2018

नया हरियाणा

पहले कहते थे कि मुख्यमंत्री बोलते नहीं है. अब बोलने लगे हैं तो कह रहे हैं कि घणा बोलते हैं. बात थोड़ा या घणा बोलने से ज्यादा जरूरी ये है कि सच बोल रहे हैं या झूठ बोल रहे हैं. हुआ यूं कि मनोहरलाल ने आजमगढ़ में कुलदीप बिश्नोई को भजन लाल का कपूत कहा और कपूत कहने के पीछे का कारण भी बताया. अगर कुलदीप बिश्नोई के परिवार को लगता है कि मुख्यमंत्री झूठ बोल रहे हैं तो उन्हें सीधा जवाब देना चाहिए. जबकि पूरा परिवार बात को घुमा ज्यादा रहा है.
मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जब आरोप सीधे लगाए हैं तो जाहिर है जवाब भी सीधा आना चाहिए था. पर कुलदीप बिश्नोई ने टविटर पर अप्रत्यक्ष हमले किए और रेणुका ने आरोपों को लेकर सफाई देने में बड़ी चूक की. दूसरी तरफ चंद्रमोहन ने गलत बयानबाजी करते हुए मनोहर लाल के लिए आपत्तिजनक शब्द खच्चर का प्रयोग किया.
कपूत कहने का कारण बताते हुए मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कुलदीप बिश्नोई पर आरोप लगाया  कि 2009 के चुनाव में कुलदीप बिश्नोई भजनलाल के बजाय खुद को चाहते थे मुख्यमंत्री चेहरा बनाना. 
पिता-पुत्र के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षा का यह पहला मामला नहीं है. वैसे भी हरियाणा में कहावत भी खूब चलती है कि राज और खाज का मजा खुद करने में ही आता है. ऐसे में इस राजनीतिक मोह को व्यक्तिगत स्तर पर भले गलत न माना जाए, पर पब्लिक स्पेस में इसके निहितार्थ बदल जाते हैं, क्योंकि कुलदीप बिश्नोई को अपने पिता भजन लाल के नाम पर राजनीति करनी है.
पूरी संभावना है कि भाजपा ने भजनलाल के साथ मिलकर गैर जाट की राजनीति को कैश करने की संभावनाओं को टटोला होगा. इसीलिए यह गठबंधन हुआ होगा. पर कुलदीप बिश्नोई राजनीतिक फैसलों के मामलों में असफल ज्यादा दिखते हैं और उनमें राजनीतिक दूरदृष्टि का अभाव भी साफ दिखता है. भजनलाल की विरासत को उन्होंने मजबूती देने के बजाय कमजोर ही किया है.
. कुलदीप बिश्नोई को इस बात पर सफाई देनी चाहिए कि उन्होंने भजनलाल के बजाय खुद के नाम पर चुनाव लड़ने की बात कही थी की नहीं. जहां तक  रेणुका बिश्नोई की बात है. उन्होंने आरोप लगाया है कि मनोहर लाल ने किस हैसीयत से  कुलदीप बिश्नोई से मुख्यमंत्री चेहरे के नाम को लेकर बात की थी. इसका तो सीधा जवाब यही है कि उस समय मनोहर लाल संगठन मंत्री थे. भाजपा में संगठन मंत्री ही इस तरह के कार्य देखते हैं.
यह देखना दिलचस्प होगा कि यह जुबानी लड़ाई कहा जाकर थमती है.
2011 में भजनलाल का निधन हो गया था. 2014 के चुनाव में तो भजनलाल के मुख्यमंत्री बनाए जाने का सवाल ही नहीं बनता. दूसरी बात यह कि रेणुका बिश्नोई ने कहा कि भजनलाल कहा करते थे कि ये कच्छेधारी झूठे हैं. यह जानते हुए भी भजनलाल की मृत्यु के बाद कुलदीप बिश्नोई ने इन्हीं झूठों के साथ गठबंधन कर लिया. और वह गठबंधन 2014 के लोकसभा चुनाव तक चला. इस तरह देखे तो कुलदीप बिश्नोई सच में कपूत ही ठहरते हैं.
हालांकि व्यवहारिक राजनीति में सपूत और कपूत जैसे विशेषणों का कोई औचित्य नहीं होता. जैसा कि कहा जाता है कि राज और खाज का मजा खुद करने  में ही है तो इसका मतलब यही हुआ कि सत्ता सुख भोगने के मामले में सारे संबंध नेपथ्य में चले जाते हैं. 


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