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नया हरियाणा

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

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ज़हरीली स्मॉग: पराली नहीं, कुछ और है इसका जिम्मेदार

धान की खेती के काल में भी मीथेन रिलीज़ होती ही है। जबकि आप पहले से ही गैस चेम्बर में हैं। जब आपका गिलास भरा है तो दो बून्द पानी भी टपकेगा ही।


The poisonous smog:  parali nahin kuch aur hai iska jimmedar, naya haryana

9 नवंबर 2017

नया हरियाणा

सबसे पहली बार वर्ष 1306, लन्दन में स्मॉग का ज़िक्र मिलता है, जिसका मुख्य कारण अधिकतम कोयले का जलना था। किंग हेनरी ने तब कोयला जलाने पर बैन लगा दिया था। फिर साठ के दशक के लंदन में भी तब 4700 लोग मर गए थे (अलग-अलग वर्णन है कई जगह)। सन् 2014 में चाइना भी स्मॉग में था। कई लोग देश छोड़ गए थे। सबसे पहले स्मॉग को समझने के लिए, प्रतिलोम क्रम (inversion) समझना पड़ेगा। इन्वर्जन का शाब्दिक अर्थ है 'उलट देना' ! यह बादलों के बनने का कारण भी है।
सामान्य परिस्थितियों में ऊंचाई पर हवा ठंडी होती है, मतलब ताप कम होता है और हवा का दाब कम होता है। लेकिन जब inversion होता है, तब नीचे की ठंडी हवा को गर्म हवा ऊपर से ढक लेती है। नीचे जो वातावरण स्मॉग के कारण पनपता है। वह कुछ समय के लिए स्थिर हो जाता है। इसके साथ-साथ जरूरी बात यह है कि तापमान और दबाव (प्रेशर) एक-दूसरे के प्रोपोर्शनल है। यानी एक बढ़ेगा तो दूसरा भी बढ़ेगा और एक घटेगा तो दूसरा भी घटेगा । (गे-लुस्साकस लॉ)
जैसे समझिये, आप गर्मी में टायर में हवा कम ही डलवाते हैं और सर्दी में हवा ज्यादा पड़ती है । क्योंकि गर्मी में हवा के अणु बहुत जल्दी गति करते हैं और ज्यादा जगह घेरते हैं। जबकि सर्दी में उनकी गति कम हो जाती है, जगह कम घेरते हैं। जब जगह कम घेरेंगे, तो ज्यादा हवा डालने की जरूरत पड़ेगी ही।
अब एक जरूरी शब्द है 'कंवेक्शन' । कंवेक्शन वही जो माइक्रोवेव की पद्धति में इस्तेमाल होता है। जब सूरज की किरण धरती पर पड़ती है, तब धरती गर्म होकर उस हीट को हवा के द्वारा वातावरण में भेजती है। अब जब इन्वर्जन के कारण स्मॉग बाहर नहीं जा रहा हो तो हीट भी एक निश्चित (पर्टिकुलर) उंचाई के बाद बाहर नहीं जा पाएगी।
अब एक अलग ही चादर बनी हुई है। जो भी हवा में घट रहा है, वो उसी के भीतर हो रहा है। कार-चिमनी सबका धुंआ वहीं भीतर रिएक्शंस हो रहे हैं। पहले बताया है कि ठंडी हवा नीचे है और गर्म ऊपर। ठंडी हवा का दबाव कम होने से सांस लेने में कठिनाई होती है। यही सिद्धांत पर्वतारोहियों पर लागू होता है जो ऑक्सीजन सिलेंडर ले कर चलते हैं।
ट्रोपोस्फेयर हमारे वातावरण की चार परतों में सबसे पहली परत जो हमारे सर के ऊपर होती है या कह लीजिए कि हम उसी में रहते हैं। इसमें भी एक ओज़ोन पाई जाती है। यह ओज़ोन, रोशनी की मौजूदगी में उद्योगों और वाहनों द्वारा छोड़ी गई सल्फर डाईऑक्साइड, ज्वलनशील कार्बन घटकों और नाइट्रोजेन के घटकों के साथ रिएक्शन कर के स्मॉग बना देती है । यह सब यहां सर्दी की शुरुआत में होता है, क्योंकि दिल्ली और उससे जुड़े क्षेत्र, sub ट्रॉपिकल क्लाइमेट वाले हैं। जो पहले से ही हाई प्रेशर रीजन में होते हैं।
चार प्रकार के inversion में से हमारे यहां  subsiedence inversion होता है। सबसे पहली बात यह कि हम सभी पहले से ही स्मॉक में रह रहे हैं, लेकिन जब फॉग होना शुरू होता है तो जो स्मॉक है वो इसके मिलकर  स्मॉग बनाता है।
जब किसान पराली जलाते हैं, तब कुछ खास बुरा नहीं होता, सिर्फ वो धान की हवा आपको आपकी असलियत दिखा देती है, धान की खेती के काल में भी मीथेन रिलीज़ होती ही है। जबकि आप पहले से ही गैस चेम्बर में हैं। जब आपका गिलास भरा है तो दो बून्द पानी भी टपकेगा ही। दूसरी बात आपने कभी अपनी चिमनियों पर ध्यान दिया ? चिमनी बेहद ऊंची बनाई जाती हैं ,क्योंकि जब वो गर्म धुंआ छोड़ेंगी तो उस धुंए के घटक buoyant हो के ट्रोपोस्फेयर से ऊपर छूटेंगे! चिमनियां जब नीचे होती हैं तो उनके घटक नीचे ही रह जाते हैं। कई बार ठंडे होकर जमीन पर ही गिरते हैं। (Buoyancy का एक सिद्धांत है उसे प्लीज़ पढियेगा)।
भारत और चाइना मिलकर इस समय बहुत कचरा कर रहे हैं। जिससे हमेशा एक धुंए का गुबार भारतीय उपमहाद्वीप पर छाया रहता है, जिसे एशियन ब्राउन चाइल्ड भी कहते हैं। एक और जरूरी बात यह है कि सरकार का काम यह होना चाहिए कि पहाड़ी इलाकों में रहने वालों को यह पराली दी जाए, क्योंकि वहां ठंड के कारण पशुओं के लिए चारे की दिक्कत रहती है। वहां यह इस्तेमाल हो सकती है। जैसे मछलियाँ सुखा के रखते हैं लोग, वैसे ही यह भी हो सकता है। जिससे अतिरिक्त प्रदूषण न हो।
 

(अपूर्वा सिंह की फेसबुक पोस्ट पर आधारित)

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