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नया हरियाणा

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

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ओ छोरे बोनी वोट कोनी चाहिए मन्नै : प्रताप सिंह दौलता

हरियाणा की जनता और नेता दोनों ही हाजिर जवाबी में सबसे आगे रहते हैं.

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25 जून 2018



नया हरियाणा

प्रताप सिंह दौलता ने बीए, एलएलबी की पढ़ाई की हुई थी। सुबेदार मेजर मान सिंह के पुत्र थे। इनका जन्म गांव चिमनी (रोहतक जिला) में 13 अप्रैल, 1 9 18 को हुआ था। सरकारी हाई स्कूल रिनला खुर्द से स्कूली शिक्षा पूरी की. डीए.वी. कॉलेज, लाहौर और लॉ कॉलेज, लाहौर से उच्च शिक्षा ग्रहण की।
इनका विवाह श्रीमती सुनेरी देवी से 21 जून, 1 9 48 को हुआ था। इन्होंने पहले वकालत की और साथ में राजनीति में अपनी सक्रियता रखी। ये 1953-55 तक  पंजाब किसान सभा के उपाध्यक्ष रहे। उससे पहले 1943 में   पंजाब यंग ज़मिंदारा एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे थे।  पहले पंजाब की संघवादी पार्टी से जुड़े और किसान आंदोलनों के संबंध में कई बार कैद भी हुई।

रोहतक में कम्युनिस्ट पार्टी की एक ब्रांच पहले से ही काम कर रही थी, कामरेड आनन्द स्वरुप एडवोकेट ने इस ब्रांच को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सखुन के रोहतक आने के बाद यहां पार्टी एवं किसान सभा में काफी मजबूती आई। सखुन की मेहनत से यहां पार्टी ने किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों के कई बड़े-बड़े आंदोलन चलाये। इन आंदोलनों के परिणामस्वरुप 1957 के आम चुनाव में रोहतक लोकसभा सीट पर प्रताप सिंह दौलता कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रुप में 28000 वोटो से विजयी हुए और रोहतक जिले (वर्तमान में सोनीपत) के राई क्षेत्र से हुकम सिंह एवं झज्जर से फूल सिंह भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर एमएलए चुने गये।
प्रताप सिह दौलता बिंदास व्यक्ति थे. एक बार चुनाव में ये भाषण दे रहे थे. एक छोटे कद का युवक बार-बार टोका-टाकी कर रहा था। प्रताप सिंह ने काफी टाइम सब्र किया। पर वो युवक रूकने का नाम नहीं ले रहा था। सिंह साहब का सब्र का बांध टूटा और उन्होंने कहा कि “ओ छोरे बैठ ज्या, बोनी वोट कोनी चांदी मन्नै.” 
सिंह साहब पूरे हाजिर जवाब इंसान थे. पलटकर दो टूक जवाब देने में माहिर थे. एक बार उनसे एक कार्यकर्ता ने शिकायत की थी कि आपने कोठी पर मेरी नमस्ते नहीं ली थी. सिंह साहब ने पलटकर पूछा तन्नै कुण सी साइड तै मनस्ते करी थी. कार्यकर्ता ने कहा ओले हाथ कैनी तै। दौलता साहब ने चश्मा उतारते हुए कहा ओ फूफा देख ले, बाई आंख तै कानी सै. हरियाणा सरकार में मंत्री रहे प्रताप सिंह के किस्से खूब प्रचलित हुए थे। 


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