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नया हरियाणा

रविवार, 22 जुलाई 2018

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'पीड़ित' होना भी एक कला है!

टीवी एंकर अब एंकर कम अभिनेता ज्यादा लगने लगे हैं.

Rohit Sardana, Ravish Kumar, naya haryana, नया हरियाणा

22 जून 2018

रोहित सरदाना

'पीड़ित’ होना अपने आप में एक कला है. कोई भी मुँह उठा कर ऐसे ही ‘पीड़ित’ नहीं कहला सकता. वरना ऐवें ही थोड़ी किसी के घर तक धमकाने वाले पहुँच जाएँ तो चर्चा भी ना हो और किसी को facebook/Instagram पे कोई ‘धमकी’ दे जाए तो UN तक मसला हो जाता है!कोई ड्यूटी पूरी कर के भी बदतमीज़ कहलाता है, कोई नियम-क़ायदों को ताक पे धर के भी दुनिया भर में चर्चा पा जाता है!
कोई बेचारा सीट बेल्ट लगा के भी फ़ोन पे बात करने के लिए चालान कटवा बैठे और कोई कान में ईयरफ़ोन ठूँस के भी ये कह के गाड़ी चलाए कि इससे अपनी पहचान छुपाने में मदद मिलती है और ‘पीड़ित’ कहलाए!
कोई मकान किराए पे लेने की शर्तें पूरी ना करने के बावजूद ‘पीड़ित’ बन जाता है. कोई चलती ट्रेन में सीट के झगड़े को बीफ़ का रंग दे के. ‘पीड़ित’ होने में जातीय/धार्मिक शर्तें तो लागू होती ही हैं, इसके अलावा ‘पीड़ितत्व’ की मार्केटिंग आना सबसे ज़रूरी है. उसके लिए अपना ट्विटर या facebook खाता खुला हो तो सोने पे सुहागा! वरना ऐसी सेवाएँ देने वाले कई ‘ऐक्टिविस्ट’ उपलब्ध हैं. ‘पीड़िताई’ को प्राप्त करने के लिए इन बातों को ध्यान रखेंगे तो आपकी मनोकामना ज़रूर पूर्ण होगी!


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