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नया हरियाणा

शनिवार, 22 सितंबर 2018

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मेरी माँ सोचै थी छोरा होगा, गोल-मोल और गोरा होगा!

यह गाना सरकार के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को बढ़ावा देता है.

Presenting New Haryanvi Song Beti in the Voice of Nippu Nepewala, naya haryana, नया हरियाणा

19 जून 2018

इकबाल सिंह

इस हरियाणवी पॉपलुर गाने ‘बेटी’ के लेखक व गायक नीपू नेफेवाला है । इस गाने में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान को, और कन्या भ्रूण हत्या को आधार बनाया गया है । आज भी हमारा पितृसत्तात्मक समाज बच्चे के जन्म में पुत्र को ही प्राथमिकता देता है । क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकार पुत्र को ही माना जाता है । वही पिता को मृत्यु के बाद मुखाग्नि देकर मोक्ष की प्राप्ति करता है । इस गाने के माध्यम से हमारे समाज की बेटियों के प्रति सोच को देखा जा सकता है । जहाँ एक ओर उसे शक्ति का अवतार मानकर पूजा जाता है । वहीं दूसरी ओर उसे जन्म से पहले गर्भ में ही मार दिया जाता है । 
“मेरी माँ सोचै थी छोरा होगा, गोल-मोल और गोरा होगा...
म्हारा भी अलग ठिठोरा होगा, घर कुणबे म्हं टोरा होगा...
डॉक्टर नू बोला तेरे कोख तै जामे बेटी
दादी बैरण नू बोली ना जी दाब दो घीटी...”
इस गाने में एक भाई कहता है कि मेरी माँ सोच रही थी इस बार तो पक्का लड़का ही होगा । जो अच्छा हष्ट-पुष्ट और गोरे रंग का होगा । जिससे हमारा भी पूरे गाँव में एक अलग प्रकार का रुतबा हो जाएगा । पूरे घर-कुणबे ( कुंटब) में अलग ही प्रकार का मान-सम्मान होगा । अक्सर गाँव में देखा जाता है कि जिस परिवार में जितने अधिक लठ उठाने वाले होते है, उस परिवार का वर्चस्व उतना ही ज्यादा होता है । क्योंकि पुरुष को शक्ति और पॉवर का प्रतीक माना जाता है । परंतु जब डॉक्टर ने जाँच करने के बाद कहा कि आपको तो लड़की होगी । हमारे पूरे परिवार के अरमानों पर पानी फिर गया और फिर मेरी दादी मेरी बहन की दुश्मन बनकर डॉक्टर से कहा की आप इस को मार दो । हमें लड़की नहीं चाहिए । हमारे समाज में एक आम धारण पाई जाती है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है । इस पर विमर्श करने पर पता चलता है कि एक लड़की को बचपन से पितृसत्तात्मक मूल्यों के द्वारा संस्कारित किया जाता है , जिससे वह जिंदगी भर मुक्त नहीं हो पाती है । 
“चाचा नै फोन करा भाई कै बाळक होया भाभी कै
छोरी का नाम सुणा पाच्छै छो होया दादा-दादी कै..2
ताऊ-ताई नै भी आकै करदी अनदेखी
दादी बैरण नू बोली ना जी दाब दो घीटी..”
लड़का कहता है कि जब मेरे चाचा जी ने फोन करके पता किया कि भाई भाभी को क्या  बालक हुआ है । जब मेरे पिता ने कहा कि लड़की हुई है तो उसने बड़े अफसोस से साथ फोन काट दिया, और मेरे दादा-दादी को भी बड़ा गुस्सा आया कि हमारे लड़की हुई है । जब मेरे ताऊ-ताई जी आये तो उन्होंने भी लड़की का नाम सुन कर अनदेखी कर दी । यहा पर देखा जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में लड़के को प्राथमिकता दी जाती है । लड़की होने पर सभी अपना मन मोस कर रह जाते हैं ।  
“दादी तन्नै सोची कोना तू भी तो किसे की बेटी थी...
तेरी माँ नै जन्म दिया तरतै, बूकल म्हं तू भी समेटी थी...
म्हं मार दी तन्नैं धोले कफ़न म्हं आज लपेटी...
दादी बैरण नू बोली ना जी दाब दो घीटी...”
यहां पर लड़की कहती है कि दादी एक बार तुम सोच कर देखो कि तुम भी किसी की बेटी हो, यदि तुमें भी तुम्हारी माँ ने पेट में ही मार दिया होता है । लेकिन आपकी माँ ने आपको जन्म दिया और आपको बड़े प्यार से अपनी गोद में संभाल कर रखा था । फिर आज आपने मुझे क्यों मार कर सफेद कफ़न में लपेट दिया है? इस में मेरा कसूर क्या था? इस संसार में मुझे भी तो जीने का अधिकार है । क्या एक लड़की होना ही मेरा कसूर है ।
“जितणै भी टीवी देखो सो, इब ठाके रिमोट आवाज बढ़ा दो
मम्मी-पापा, चाचे-ताऊ सब नै अपने पास बुला लो
आच्छै लागै बात मेरी थोड़ी सी करयो गोर भाई
हाथ जोड़ कै बोलू सू  तम ना इग्नोर भाई”
यहाँ पर गायक समझाते हुए कहता है कि तुम जितने भी टीवी देख रहे हो, टीवी की आवाज बढ़ा कर मेरी एक बात ध्यान से सुनो । माँ-पिता, चाचा-ताऊ सभी को अपने पास बुला लो और जो बात मैं तुमें कहने जा रहा हूँ । यदि तुमें अच्छी लगे तो उसे ध्यानपूर्वक सुनना । मैं तुम से हाथ जोड़कर विनती कर रहा हूँ, इससे इग्नोर मत करना ।
“बेटी का सुणयो सोर भाई, बेटी बिन आंगन सुना सै
भेद-भाव सरेआम कर बाबू का प्यारा मून्ना सै
जब घर म्हं बेटा जन्म लेवै, कुणबे म्हं अलगे खुशी होवै
बेटी का नाम सुणा पाच्छै, ये रिस्तेदार भी दुखी होवै”
यहाँ पर लेखक कहता है कि जिस घर में बेटी की किलकारी गूंजती वह आंगन बड़ा भाग्यवान होता है । बेटी के बिना तो पूरा घर सुना होता है । लेकिन परिवार में लड़की के साथ बचपन से ही सरेआम भेद-भाव किया जाता है । परिवार में बेटी की अपेक्षा बेटे को अधिक प्यार मिलता है । जिस घर में बेटा पैदा होता है, वह घर अलग ही प्रकार की खुशियों से भर जाता है । हमारे समाज में देखा जाता है कि घर में बेटा पैदा होने पर काशी की थाली बजाई जाती है । घर के बाहर नीम की टहनी टाँग दी जाती है । घर में सभी के मुखमंडल पर अलग ही प्रकार की खुशी होता है । परंतु बेटी पैदा होने पर पूरे घर में मातम-सा छा जाता है । परिवार के लोग ही नहीं बल्कि रिश्तेदारों तक को बेटी पैदा होने का दु:ख होता हैं ।
“कै खोट कर इस कन्या नै जो क़त्ल करण पै होगै तयार
चकू, छुरी ना चाहिए, बाबू के ही हाथ बणगै हथियार
एक बात तो सोच लो जै कन्या नै मरवाओगे
सलोमण वाले दिन भाई किस पै पोची बन्धवाओगे”
यहाँ पर लेखक कहता है कि इस छोटी-सी बच्ची ने तुम्हारा ऐसा क्या कसूर कर दिया है । जिसके लिए तुम इसे मारने के लिए तैयार हो गए । क्या लड़की होना ही उसका अपराध है, जिसके लिए जो तुम उसे मारना चाहते हो । बेटी को मारने के लिए, किसी चाकू, छुरी की आवश्यकता नहीं पड़ी पिता के हाथ ही उस नादान के लिए हथिहार बन गये । आज तुम एक बार तो सोचकर देखों यदि इसी तरह से बेटियों को गर्भ या जन्म लेते ही मारते रहे, तो रक्षाबंध वाले दिन किस पर राखी बंधवाओगें । 
“माँ किस तै बात कर साँझी, ताम किस नै बाहण बणाओगे
फिर कूकर जाकै धरमराज कै सकल दिखाओगे
तम कन्या नै मरवाओगे छोरे की खुशी मनोगे....
जो थारे बरगे होगै सारे फेर बहु कड़ै कै लाओगे...”
यहाँ पर लेखक कहता है कि माँ अपनी बातें किस के साथ में साझी करगी । कहा जाता है माँ बेटी में दोस्तों जैसा संबंध होता है, वह एक-दूसरी से अपनी सभी तरह की बातें शेयर करती हैं । फिर कहता है कि यदि ऐसे ही लड़कियों को मारते रहे, तो किस को अपनी बहन बनाओगें । तुम मरने के बाद जब ऊपर जाओगें उस भगवान को किस तरह मुंह दिखोगें । यही सभी तुम्हारी ही तरह से सोचने लगे तो, फिर अपने बेटों के लिए कहाँ से बहू लेकर आओगें । 
“इबी टम सै खोल दो अपणे धरम के पेटी
 दादी बैरण नू बोली ना जी दाब दो घीटी...2
नीपू नेफवाले कै फायदा गाना गाणै का...
कितणा ऐ ग्यान बांट लै तू ना इनके समझ आणै का...
बंजर भूमि म्हं करणै  की ना सोचे खेती...”
यहाँ पर लेखक कहता है कि अभी भी तुम्हारे पास समय है । अपने धर्म करने का अकाउंट खोल दो । फिर लेखक कहता है कि इस लोगों को कितना ही समझा लो, कितना ही ज्ञान बांट लो, यह नहीं समझने वाले हैं । यह तो उस बंजर भूमि की तरह है, जिसमें खेती नहीं हो सकती । 
इस गाने में हरियाणा प्रदेश की एक ज्लवंत समस्या को उठाया गया है। जिस के कारण हरियाणा प्रदेश की छवि भी धूमिल रही है। वह समस्या कन्या भ्रूण हत्या रही है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में पुत्र-जन्म न देने वाली स्त्री को व्यर्थ समझा जाता है; स्त्री जीवन को इस तरह से अभिशापित किया जाता है कि सारे सामाजिक, धार्मिक आदर्श पुत्र-जन्म न देने से टूट जाएंगे। सारे सामाजिक निकष फेल हो जाएंगे जिसे पितृसत्ता ने स्त्री के लिए बनाया है। पुत्र के अभाव में पुरुष पितृऋण से उऋण हीं हो पाता और इसकी जिम्मेदारी स्त्री को ही है। स्त्री को अपने पति को इस ऋण से मुक्त कराने और उसे मोक्ष प्राप्त करने में अहम् भूमिका निभानी पड़ती है। और अपनी इस भूमिका को पूर्ण करने के लिए उसे पुत्र को जन्म देने की अनिवार्यता है। और यदि स्त्री ऐसा करने में असफल रही तो उसके पारिवारिक-सामाजिक मान-सम्मान में कमी आ जाती है। स्त्रियां इस तरह के सामाजिक अपमान के दंश से बचने के लिए हर उपाय, हर प्रयास करती हैं। पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, टोटके सभी प्रकार के प्रयास पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। पुत्र को समाज में सबसे बड़ा रत्न के रूप में प्रचारित किया गया है, ऐसा रत्न जो मोक्ष दिलवाने में सहायक है।  पितृसत्ता स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक मानता है, इसलिए स्त्री की स्वतंत्र छवि को सहन नहीं कर पाता उसके प्रति दुराग्रह की भावना काम करती है।


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