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नया हरियाणा

गुरूवार, 20 सितंबर 2018

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सांग सम्राट लख्मीचंद को धरती पुत्र कहा जाना चाहिए!

लख्मीचंद बहमुखी प्रतिभा के धनी थे.

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18 जून 2018

एडवोकेट नारायण तेहलान

शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने बयान देते हुए कहा है कि पंडित लख्मीचंद को भारत रत्न दिलाने के लिए हरियाणा सरकार से प्रस्ताव पारित करवा कर केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। इसी कारण पंडित लख्मीचंद दोबारा चर्चा का विषय बने हुए हैं. 

पंडित लखमीचंद जी को कोई सूर्यकवि कहे या चंद्र कवि कहे, और कोई इन रुत्बों को माने या न माने लोककवि व्यवहार और लोकभाषा के लोककवि तो वे थे ही। वो वेदों शास्त्रों के ज्ञाता थे, अगम बुद्धि थे, ये सब विशेषण हैं जो श्रद्धालुओं द्वारा अक्सर चस्पां कर दिये जाया करते हैं, वर्ना सच यह है कि वेद शास्त्र के ज्ञान से उनका कुछ लेनादेना नहीं रहा है। हां इतना है कि वे पुराणों के किस्से कहानियां अपने किसी थोड़ा बहुत पढे लिखे सहयोगी से सुन लेते थे और इन्हें आधार बनाकर सुंदर सार्थक सटीक शब्दों में पिरो कर रागनी /भजन रूपी माला तैयार करते थे जिसका मेल जनसाधारण के जीवन में नित्य घटित होने वाली घटनाओं से इस तरह बैठा हुआ होता था कि सुनने वाले को यूं लगता था कि उसी की कहानी सुनाई जा रही है।
कुछ लोग आशुकवि की उपाधि से भी पंडित जी को नवाजते हैं, यानी तुरंत भजन रागनी तैयार करने की योग्यता क्षमता वाला बताते हैं। यह अतिश्योक्ति हो सकती है लेकिन इतना तो निश्चित था कि वे लोकप्रचलित नए नए कथानक किस्से उठाते और उस कथानक को रागनियों में बांधते। वे अपनी बनाई हुई रागनी ही गाते थे। एक एक किस्से के लिए 50 -100 तक रागनियां मिलती हैं लेकिन उन में से कुछ चुनिंदा ही प्रसिद्धी पा सकी और इनसे ही वे प्रसिद्ध हुए। 70 %तक ऐसी रचनाएं उपलब्ध हैं कि जिन्हें न कोई गाता और न सुनता। उनकी प्रसिद्धि का एक कारण यह भी रहा कि वे अपने समय के चोटी के साजंदे अपने बेड़े में रखते थे। उनकी आवाज दबी हुई होने पर भी दूर तक जाती थी। वे गाते थे तो अभिनय भी गजब का करते थे। इस अभिनय के कारण मस्ती का आलम छा जाता था। मेरा परिचय कुछ ऐसे लोगों से रहा जो लखमीचंद के सांग के इतने कायल थे कि 10 - 20 कोस तक सांग देखने जाया करते थे और कई कई दिन बेड़े का हिस्सा बनकर रहते। पंडित जी उच्चकोटि के शराबी थे (बकौल उनके) जब उन्हें तख्त पर चढाया जाता तब वे नशे में धुत होते थे लेकिन जल्दी ही वह नशा उनके लिए निखार बन जाता था। कहते हैं कि साज और सुर का उन्हें इतना ज्ञान था कि यदि कोई मामूली सी चूक करता तो वहीं बेंत मारते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि वे अपने जमाने के सांग किंग थे। यह भी सही है कि वे अॉल इन वन की कैटिगरी के थे। यानी कंपोंजर सिंगर और एक्टर एक साथ। जब तक वे जिंदा रहे तब तक उन्हें बहुत सम्मान मिलता रहा, खासतौर पर जाट किसान तबके से। उसके बाद बहुत सालों तक वे समय समय पर गाई जाने वाली रचनाओं के माध्यम से जिंदा रहे जिसका श्रेय मुख्य रूप से उनके दो शिष्यों, पंडित सुल्तान रोहदिया और पंडित मांगे राम पानची को जाता है। इसके बाद कंप्यूटर और सांस्कृतिक खोजबीन का जमाना आया। कुछ उत्साही आई ए एस अधिकारियों ने पंडित जी की रचनाओं को काफी प्रचार दिया और उनकी लगभग सभी रचनाओं को पुस्तक रूप में संकलित कराया। इन लोगों के पास पद थे अधिकार थे। पैसा इनके लिए कोई समस्या नहीं थी लेकिन जो सबसे जरूरी होना चाहिए था वह नहीं था, यानी कोई ऐसा प्रतिभावान समर्पित ज्ञानी पुरुष जो जबानी तौर पर इधर-उधर बिखरी रचनाओं को प्रसंग संदर्भ और शब्द विन्यास की दृष्टि से शोध करके पेश करता। नतीजा यह हुआ कि पुस्तक छपी और बहुत सारी बेची बांटी गई लेकिन लगभग हर रचना को एक कबाड़ के रूप में पेश किया गया। पंडित जी की रचनाओं की दो विशेषताएं अनन्य हैं। एक तो यह कि इनका संदर्भ कहीं नहीं टूटा मिलता। दूसरा शब्दों का चुनाव रखाव और जमाव इतना बेजोड़ है कि यदि एक शब्द भी इधर-उधर हो गया तो वह दिल में चुभे बिना न रहा। इन किताबों में इन दोनों खासियतों का नितांत अभाव कदम कदम पर अखरता है।
फिर रागनी कंपटीशन का जमाना आया। पंडित जी की रचनाओं को खूब गाया गया। हजारों लोगों को रोजगार मिला। सैंकड़ों करोड़पति उद्यमी हुए। इस दौरान पंडित जी की रचनाओं को सर्वाधिक बेहतर ढंग से गाया भैसवालिया मास्टर। एक एक वाक्य को यथासंभव शुद्ध रूप में पेश किया। लय सुर ताल तर्ज आदि की पूरी रक्षा की। और सबसे बड़ी और निराली बात यह कि सिर्फ लखमीचंद की रचनाओं को गाया। जैसे पुरानी फिल्मों के संगीत गीत आदि को एक तरफ कर दिया जाए तो संगीत के नाम पर - 0 जीरो बच रहती है ऐसे ही रागनी विधा में से अगर पंडित जी की रचनाओं को निकाल दिया जाए तो परिणाम एक बड़ा शून्य रहेगा। हर आदमी का अपना अलग किरदार होता है। अलग हालात और अलग सोच होती है इस सब पर न जाकर हम अगर रचनाकार गायक संगीतकार अभिनेता लखमीचंद की बात करें तो वह इस क्षेत्र में अपने समय की बेजोड़ हस्ती था, हालाँकि उसी समय और भी कई प्रसिद्ध सांगी हुए लेकिन लखमीचंद तो बस लखमीचंद ही था। मैं उन्हें एक ऐसी शख्सियत कहूंगा जो चंद्र कवि, सूर्यकवि भी कहे जा सकते हैं लेकिन मेरे हिसाब से उन्हें धरती कवि कहा जाना चाहिए, क्योंकि वे ऐसे ही थे।


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