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नया हरियाणा

शनिवार, 17 नवंबर 2018

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बुआ के तै जमा तगड़ी होकै आई सै!

पॉपुलर मनोरंजन संस्कृति के नाम पर स्त्री के जीवन को यथास्थितिवादी ढंग से चित्रित करता है.

, naya haryana, नया हरियाणा

15 जून 2018

इकबाल सिंह

 पूंजीवाद का युग में लोगों के पास जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे उनका जिंदगी जीने का तरीका भी बदलता जा रहा है। उनके खाने-पीने का, कपड़ों का, मनोरंजन का, घूमने-फिरने का स्टाईल बदल गया है। जो आज हम देख रहे हैं कि छुट्टियों के दिनों में बच्चे-बड़े सभी घूमने के लिए जो टूरिस्ट पैलेसों पर जा रहे हैं। पहले ऐसा बहुत कम देखने को मिलता था। क्योंकि पैसे कम होने की वजह से बच्चे अपने रिश्तेदारों के यहां पर घूमने जाते थें। ग्रामीण आंचल में आज भी बच्चे घूमने के लिए बुआ या मामा के घर पर जाते हैं। इस गाने में एक तरफ यह दिखाया गया है, वही दूसरी तरफ दिखाया जाता है कि जब लड़की साणी(शादी के लायक) हो जाती है, तो उसके घर वाले पढ़ाई को बीच में छुड़वा कर उसे घर के कामों में दक्ष बनाने पर  जोर देत हैं। ताकि वह एक कुशल गृहणी बन सकें। इस हरियाणवी पॉपलुर गाने ‘बुआ कै जारी थी’ के गायक राजू पंजाबी व सुशीला नागर है और इसके लेखक एडी दहिया है।
इस गाने में दिखाया गया है कि लड़का-लड़की साथ में एक ही स्कूल में पढ़ते हैं। लड़का लड़की से प्रेम करता है। पेपर होने के बाद स्कूल की छुट्टी हो जाती है, जिस कारण वह छुट्टियों में मिल नहीं पाते हैं। जब वह छुट्टियों के बाद मिलते हैं तो लड़का कहता है-
“पेपर कै बाद आज देई रह दिखाई तू
छोड़ कै पढ़ाई सीखण लागी कै सीलाई तू
तेरे तै छोरे म्हं घणा तंग आ रही थी
छुट्टी-छुट्टी जातै म्हं बुआ कै जारी थी”
आज तुम पेपरों के इतने दिनों के बाद दिखाई दी हो। ऐसी तुम कहा चली गई थी। कहीं तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी पढ़ाई छुड़वा कर, तुम सिलाई तो नहीं सीखा रहे हैं। अक्सर ग्रामीण समाज में देखा जाता है कि जो लड़की पढ़ाई में कमजोर होती है या फिर साणी हो जाती है। मतलब शादी के लायक हो जाती है। घरवाले उसकी बीच में ही पढ़ाई छुड़वा कर घर के कार्यों में दक्ष बनाने पर जोर देते हैं। क्योंकि आज भी समाज का बड़ा हिस्सा लड़की को लेकर यही सोच रखता है कि शादी होने के बाद लड़की को अगला घर संभालना है और बच्चे पैदा करके अगले का वंश बढ़ाना है.  ताकि वह सुसराल में एक कुशल गृहणी बन सके। फिर लड़की कहती है कि जो तुम रोज-रोज मुझे इस तरह परेशान करते हो, इससे तंग आ चुकी थी। इसलिए मैं छुट्टियों में बुआ के घर पर चली गई थी।
“कै खाया करती बुआ कै तू होकै आई ठाढ़ी रै
सोया करती राम तै कै काटा करती साठी रै
डेढ़ महीने म्हं रै बुआ कै तै आई तू 
छोड़ कै पढ़ाई सीखण लागी कै सीलाई तू...”
लड़का लड़की से पूँछता है कि तुम बुआ के घर पर ऐसा क्या खाती थी। जो डेढ़ महीने ही तुम इतनी हष्ठ-पुष्ठ होकर आई हो। मुझे बताओ, वहाँ पर तुम आराम से सोती थी या फिर तुम खेतों में से पशुओं के लिए साठी (एक प्रकार का हरा चारा है जो बारिश के मौसम में होता है ।)काट कर लाती थी। आज तुम डेढ़ महीने के बाद बुआ के घर से आई हो।
“एरे बुआ मेरी नै घाला था मेरी खातर सांधा रै
सेब लाया करता फुफा आंदा जांदा रै..
रोक-टोक नां थी कती खुला खा रही थी
छुट्टी-छुट्टी बैरी बुआ कै जारी थी”
यहाँ पर लड़की कहती है कि मेरी बुआ ने मेरे लिए सांधा (घी, गोंद, बुरा एवं ड्राई फ्रूट से बनने वाला जिसे गुंद भी कहते हैं) घाल रखा था। और जब भी मेरे फुफा जी शहर जाते थे, तो मेरे लिए सेब लेकर आते थें । वहाँ पर मुझे किसी प्रकार की खाने-पीने में कोई रोक- टोक नहीं थी। जिस कारण से में वहाँ पर मोटी हो गई । यहां पर देखा जा सकता है कि लड़की को अपने घर पर खाने-पीने, कपड़े पहनने, बोलने आदि अनेक प्रकार की पाबंदियाँ होती हैं। जिस कारण से उसका शारीरिक विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है। 
“कै मिलगा था इसा जो भूलगी पुराणे यारा नै
जाण मेरी काड ली तेरे झूठे लारा नै
कौणा आती दया होगी हरजाई तू
छोड़ कै पढ़ाई सीखण लागी कै सिलाई तू”
यहां पर लड़का कहता है कि तुम बुआ कर घर पर ऐसा क्या मिल गया था? जो तुम अपने पुराने सभी दोस्तों को भूल गई थी। जो तुम बिना बात के झूठ बोल कर, मुझे उलझाएं रखती हो, यह बात ठीक नहीं है। किसी दिन मेरे तो जान की निकल गई जाएगी। तुम्हें तो मुझ पर दया भी नहीं आती है। तुम तो दिन-पे-दिन धोखेबाज होती जा रहती हो। 
“कदै-कदै मिलणे का हो सै मौक्का ऐ न्यारा रै
एड़ी दहिया गुस्से म्हं लागै प्यारा रै
प्यार झूठा अक सच्चा तन्नैं आज मारी थी 
छुट्टी-छुट्टी जातै म्हं बुआ कै जारी थी....”
यहां पर लड़की कहती है कि रोज-रोज मिलने में वह मजा नहीं आता। इसलिए कभी-कभी मिलने का मजा ही अलग होती है। और गुस्से में तो तुम ओर भी अधिक प्यारे लगते हो। मैं तो देखना चाहती थी मेरे दूर जाने के बाद तुम मुझे भूल जाते हो या नहीं। तुम्हारा प्यार सच्चा है या झूठ यही देखना चाह रही थी।
इस हरियाणवी पॉपलुर गाने में कहीं गई बात ऊपर से देखने पर सामान्य सी लगती हैं। लेकिन जब इस गाने का विश्लेषण करते है, तो पता चलता है कि यह गाना पुरुष मानसिकता को लेकर लिखा गया है।  देखा जा सकता है कि किस तरह पितृसत्तात्मक समाज अपनी सामाजिक स्थिति को सर्वोच्चता में रखना चाहता है। वह जानता है कि स्त्री को निम्न स्तर पर रखकर ही कर सकता है। इसलिए वह स्त्री को शिक्षा से दूर रखना चाहता है, क्योंकि वह जानता है कि स्त्री अधिक पढ़ी-लिखी, जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान हो गई तो उसकी सर्वोच्चता को शायद खतरा हो सकता है। डॉ.अम्बेडकर ने भी कहा था कि शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो भी पीयेगा, वह धहाड़ेगा जरूर। इसलिए पितृसत्तात्मक समाज जानता है यदि स्त्री ने शिक्षा प्राप्त कर ली, तो उसे अपने अधिकार का ज्ञान हो जाएगा। तो वह स्त्रियों पर अपना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक श्रेष्ठता और वर्चस्व को कैसे स्थापित कर पाएगा? इसलिए वह स्त्री को शिक्षा से दूर रखना चाहता है। पुरुष ने आदि काल से ही अपनी आर्थिक शारीरिक शक्ति के बल पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित की। उसने जो धर्म बनाये, जिन मूल्यों को गढ़ा, जिन आचरणों को मान्यता दी, वे सब उसकी अपनी सुविधा के थे। उसके इस एक छत्र राज्य को औरत ने पहले कभी चुनौती नहीं दी। कहीं-कहीं कुछ महिलाओं ने इसके विरोध में आवाज भी उठाई, कुछ आंदोलन भी हुए, किंतु पुरुष ने उतनी ही मांगें स्वीकार,जितनी उसके हित में थीं या देना चाहता था। उसने उसे उतने ही अधिकार दिए जिससे उसके वर्चस्व, प्रभुत्व को कोई भी, किसी प्रकार का खतरा न हो।
   पुरुष प्रधान समाज सदियों से स्त्री के साथ भेदभाव करता आ रहा है। वह लड़की को पराया धन मानकर चलता है। वह सोचता है कि लड़की की शिक्षा पर पैसा खर्च करना फजूली खर्चा है। क्योंकि वह तो एक दिन शादी करने के बाद चली जाएगी। इसलिए वह लड़की को घर के काम-काज, सिलाई-बुनाई में दक्ष बनाया जाता है। इस गाने के माध्यम से हमारे समाज की लड़कियों के प्रति सोच को आसानी से समझा जा सकता है।
 


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