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नया हरियाणा

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

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जननायक देवीलाल के न्याययुद्ध से अभय सिंह के जलयुद्ध का संघर्ष

देवीलाल को जननायक उनके संघर्षों ने बनाया था.

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15 जून 2018

नया हरियाणा

क्या अभय सिंह का जलयुद्ध उन्हें नायक बना पाएगा? पार्टी के भीतर उन्हें भले ही जलनायक की पदवी मिल गई हो पर आम जनता क्या उन्हें अपना नायक स्वीकार करेगी? पार्टी के भीतर दुष्यंत चौटाला का खेमा क्या उनका नेतृत्व स्वीकार कर पाएगा? कहीं अभय सिंह पार्टी की भीतरीघात के शिकार तो नहीं बन जाएंगे? ये वो सवाल हैं जो इनेलो के भीतर और बाहर दोनों जगह सबसे ज्यादा उछल रहे हैं.

अभय सिंह चौटाला आजकल हरियाणा में एसवाईएल के पानी को लेकर अलग-अलग जिलों में जेल भरो आंदोलन छेड़े हुए हैं. जिसे सरकार और कांग्रेसी नाखून कटाकर शहीद होना बता रहे हैं. वहीं उनकी इस रणनीति को लेकर पार्टी के भीतर भी दो विचार हैं. पत्रकार कुलदीप श्योराण का कहना है कि “देवीलाल के न्याय युद्ध को देखा और अब बड़ा नेता बनने की फिराक में अभय सिंह चौटाला द्वारा एसवाईएल के मरे हुए मुद्दे को उठाए हुए देख रहा हूं.” हालांकि राजनीति में कहा तो यह जाता है कि यहां मुर्दों को जिंदा रखा जाता है, ताकि समय पर उन्हें बुलवाया जा सके. जहां तक बात एसवाईएल की ये बात अभय सिंह भी जानते हैं कि कोर्ट का फैसला जब हरियाणा के हित में आ चुका है. अगर एसवाईएल का पानी हरियाणा को मिल जाता है तो इसका श्रेय अभय सिंह को भी मिलेगा.
ऐसे में अपने दादा देवीलाल के शुरू किए न्याय युद्ध की तर्ज पर अगर अभय सिंह को जनता इस बार अभय दान देकर विजयी बनाती है तो उनकी यह रणनीति सफल होगी. दरअसल जीवन और राजनीति में रणनीति की सफलता और असफलता उसके परिणाम के साथ जुड़ी होती है. दूसरी तरफ एसवाईएल जैसे मुद्दे इनेलो कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम तो कर ही रहे हैं. 
1982 में हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी. उस समय विपक्ष के नेता रहते हुए चौधरी देवीलाल ने न्याय युद्ध लड़ा था. जिसका सीधा अर्थ यह था कि न्याय के लिए संघर्ष. उन्होंने नई पार्टी लोकदल का गठन करते हुए वादा किया था कि सभी किसानों और छोटे व्यापारियों का कर्ज माफ कर देंगे. उन्होंने वादा किया था कि यह उनकी सरकार का पहला काम होगा.
सिरसा के तेजा खेड़ा में जन्में देवीलाल ने जनसंघर्षों को अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया हुआ था. आपातकाल में 11 माह की जेल सहकर वे 26 जनवरी 1977 को जेल से रिहा हुए। तब बिखरे विपक्ष को इकट्ठा कर जनता पार्टी के गठन में विशेष भूमिका निभाई और 23 जून 1977 को हरियाणा के पांचवें मुख्यमंत्री बने। राष्ट्रहित में किसी भी राजनैतिक व सामाजिक मुद्दे पर वे अपने विरोधियों तक से भी सलाह मश्विवरा करने में संकोच नहीं करते थे। इसीलिए उन्होने सतलुज यमुना लिंक नहर के मुद्दे पर 14 अगस्त 1985 को अपने तमाम विधायकों के साथ विधानसभा से इस्तिफा दे दिया। कांग्रेस की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ  जींद में एक ऐतिहासिक रैली करके प्रथम न्याय युद्ध की शुरूआत की और वर्ष 1987 में विधानसभा की 90 सीटों में से 85 सीटें जीतकर नया रिकार्ड स्थापित करके दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। हरियाणा को न्याय दिलाने व शहीदों को सम्मान देने के लिए 23 जनवरी 1987 को रोहतक में चौ. देवीलाल के नेतृत्व में सम्मेलन हुआ जिसकी हाजरी का रिकार्ड अब तक नहीं टूटा है।
 


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