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नया हरियाणा

सोमवार , 10 दिसंबर 2018

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अरै लागती कोन्या बहू जमींदार की!

हर समाज का पहनावे को लेकर आचार और विचार समय के साथ बदलता रहा है.

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14 जून 2018

इकबाल सिंह

मनुष्य का रहन-सहन और खान-पान अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग रहा है और समय के साथ परिवर्तित भी होता रहा है. परिवर्तन किसी की नजर में हेय होता है तो किसी की नजर में बेहतर होता है. पुरुष और स्त्री के पहनावों को लेकर रोका-टोकी सभी समाजों का हिस्सा रहा है और ग्रामीण परिवेश में यह शहर की तुलना में ज्यादा रूढ़िवादी ढंग से सक्रिय होता है. दरअसल कपड़ों को लेकर हम सभी की सोच हम सभी के अपने आसपास के जीवित अनुभवों और मूल्यों द्वारा निर्मित होती है. शिक्षा और प्रगतिशील मूल्यों के संपर्क और संसर्ग में मनुष्य के इस तरह के विचार कटते-छंटते रहते हैं. दूसरी तरफ बहुत से मनुष्य अपने पारंपरिक समाज के मूल्यों के साथ जीवन जीते रहते हैं. उनकी सोच बदलने या परिवर्तित करने के लिए उनके साथ संवाद और शिक्षा का स्तर दोनों सुधारने की जरूरत होती है. केवल उन्हें पिछड़ी हुई सोच का कहकर बहिष्कार करना या तुच्छ मानना किसी भी सभ्य समाज के लक्षण नहीं हो सकते. जबकि आजकल की आलोचना का मूल्य यही बनता जा रहा है. खुद को बेहतर बताओ और दिखाओ. 
समाज में कपड़ों को लेकर एक रूढ़िवादी किस्म की सोच है, जिसे यह गाना उजागर करता है. और समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच समाज का हस्तक्षेप एक सीमा से ज्यादा होना समाज और मनुष्य दोनों के विकास को अवरूद्ध करता है. 
हरियाणवी पॉपलुर गाना ‘बहू जमींदार की’ राजू पंजाबी और सुशीला नागर के द्वारा गाया गया है । इसके लेखक अजय हुड्डा है । इस गाने में पितृसत्तात्मक मानसिकता को देखा जा सकता है जिसे एक स्त्री का अपनी मर्जी से कपड़े पहना बर्दाशत नहीं होता है । जब भी कोई स्त्री पितृसत्तात्मक समाज द्वारा तय किये गए नियमों और मूल्यों के सांचे से बाहर निकलने की कोशिश करती है, तो पितृसत्तात्मक नामक संस्था अपने वर्चस्व बनाये रखने और मजबूत करने के लिए अनेक तर्क गढ़ कर स्त्री की यथास्थिति बनाये रखने का प्रयास करती है ।
इस गाने में दिखाया गया है कि एक किसान की पत्नी को किस तरह के कपड़े पहने चाहिए । पितृसत्तात्मक समाज द्वारा एक किसान की पत्नी के कपड़ों को लेकर जो सांचे और छवि गढ़ रखी है । जब वह उस छवि के अनुसार उस सांचे में फिट नहीं बैठती । तो लड़का उसे नसीहत देते हुए कहता है कि-
“देख कै तेरे फिंटिंग सूट सलवार की ...2
लागती र कोणा बैरण बहू जमींदार की
राणी की जो राखै मिला इसा भरतार
हाळी-पाळी कोणा वो सै बड़ा जमींदार....”
यहां पर लड़का जब किसान की पत्नी के पहनावे को देखकर कहता है कि तुम्हारे सूट–सलवार की फिंटिग देखकर, तुम किसी भी प्रकार से किसान की पत्नी नहीं लगती हो । क्योंकि उसकी नज़र में भारतीय किसान की पत्नी की छवि वही सीधे-सादे, मैले-कुचैले कपड़ो की बनी हुई है । इस पर किसान की पत्नी कहती है कि जो मेरा पति है वह मुझे रानी की तरह रखता है । वह कोई हाली-पाली नहीं है, वह तो बड़ जमींदार है । मतलब जो छवि यहाँ पर लड़का बता रहा है वह छवि छोटे-मोटे हाली-पाली की पत्नी होती है , ना की बड़े जमींदारों की ।
“तू फैशना की राणी वो राखै सादा बाणा,
उस नै ले कै बैठगा तेरा यू गिरकाणा
बाकी जो बचा म्हारा मण्डी सरकार की
लागती र कोणा बैरण बहू जमींदार की....”
लड़का कहता है कि तुम तो फैंशन करके चलने वालियों में रानी हो । लेकिन तुम्हारा पति तो सीधे-सादे कपड़े पहन कर चलता है । वह कहता है कि उसने जो तुमें इतनी छूट दे रखी है वह उसे एक दिन ले डूबेगी । फिर कहता है कि तुम्हारे शौक पूरा करने के बाद जो बचता है तो हमारे सरकारी मण्डी है। 
“दो-दो किले बोवै कोणा बोवै पूरे बीस हो
मेरा खसम कमा वह तेर क्या तै लागी चीस हो
कोणा दिल का माड़ा वो सै पूरा साहूकार
हाळी-पाळी कोणा वो सै बढ़ा जमींदार......” 
किसान की पत्नी कहती है कि मेरा पति और किसानों की तरह दो-दो किल्ले की खेती नहीं करता है । वह तो बीस-बीस किल्ले की खेती करता है । मेरा पति कमाने वाला  है और मैं खर्च करने वाली । तुम्हें किस बात की परेशानी है । वह दिल का कंजूस नहीं है ।वह दिल खोल कर कर्ज करने के लिए पैसे देता है । मेरे पति कोई छोटा किसान नहीं है । वह तो बड़ा जमींदार है । 
“तू मौज उड़ावै वो तो खेत म्हं कमावै सै
बणी-ठणी आडै गाम जिकर चलावै सै
माटी मत कूटयै उसके लाड-प्यार की
लागती र कोणा बैरण बहू जमींदार की....”
लड़का कहता है कि तुम तो मौज ले रही हो और वह खेत में सारे दिन काम करता है । जो तुम यों सुबह-सुबह तैयार होकर घूमती रहती हो। इस बात के पूरे गाँव में बातें चलती रहती हैं । इस तरह से तुम्हें उसके लाड-प्यार का नाजायद फयदा नहीं उठाना चाहिए।
“वो खेता का है राजा म्हं घर की सू राणी
आवै जब वो थका-हारा करू सू सही सेवा-पाणी
नां म्हारी अजय हुड्डा कदै होवै तकरार
हाळी-पाळी कोणा वो सै बढ़ा जमींदार”
वह कहती है कि मेरा पति खेतों का राजा है । मतलब खेत के काम की सारी जिम्मेदारी उसकी है और घर के काम की जिम्मेदारी मेरी है । जब वह शाम को खेत से घर थक हार कर आता है । घर पर मैं उसकी सही तरह से सेवा करती हूँ ।जिस कारण हमारी घर में कभी लड़ाई नहीं होती है । 
इस हरियाणवी पॉपलुर गाने में जहाँ एक तरफ पति-पत्नी के मधुर प्रेम-संबंधों को दिखाया गया है । वहीं दूसरी तरफ पितृसत्तात्मक मानसिकता भी दिखाई देती है । जो उस किसान की पत्नी को फिटिंग वाले सूट-सलवार पहने पर नसीहत देता नजर आता है कि तुम्हारा पहनावा देखकर तुम कहीं से भी जमींदार की पत्नी नहीं लगती हो । अक्सर हमारे हरियाणवी समाज में भी देखा जाता है, कुछ खाप पंचायतें लड़कियों के जींस व मोबाईल रखने पर रोक लगाती रही हैं । पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को अपने अधीन रखने के लिए समय-समय पर ऊट-पटांग फतवे जारी करता रहता हैं।
हर समाज का पहनावे को लेकर आचार और विचार समय के साथ बदलता रहा है. किसी को यह बदलाव सहन नहीं होता तो कोई इसे सहज ढंग से स्वीकार कर लेता है.

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