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नया हरियाणा

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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हरियाणा की राजनीति के 51 साल : आया राम गया राम से लेकर, भगवत से लेकर मनोहर लाल तक

1 नवंबर 1966 को पंजाब ने 44 हजार 212 वर्ग का बंजर और अविकसित टुकड़ा देकर हरियाणा को अलग किया था.

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13 जून 2018

नया हरियाणा

1 नवंबर 2018 को हरियाणा पूरे 52 साल का हो जाएगा. 52 साल के हिसाब से हरियाणा के रंग-ढंग मस्त हैं. ठीक हरियाणा की तासीर के हिसाब से. हरियाणा की संस्कृति की सबसे बड़ी खासियत यही है कि खुशी हो या गम. हर पल में हंसी-ठहाके यहां गुंजते मिलेंगे.

1 नवंबर 1966 को पंजाब ने 44 हजार 212 वर्ग का बंजर और अविकसित टुकड़ा देकर हरियाणा को अलग किया था. उसी हरियाणा को राजनीति और यहां की मेहनतकश जनता ने आज भारत के शीर्ष राज्यों में पहुंचा दिया है. हरियाणा की राजनीति के पूत के पांव पालने में ही दिखने लगे थे. उसी समय से ही दल-बदल और दिल-बदल की राजनीति शुरू हो गई थी. हालत ये हो गई कि उस समय के दो नेता आया राम और गया राम ने इतनी बार पार्टियां बदली कि दल-बदल कानून बनाना पड़ा और दल-बदलने वाले नेताओं को लेकर कहावत भी बन गई- आया राम, गया राम.
भगवत दयाल शर्मा ने थामी थी पहली कमान
संयुक्त पंजाब के हरियाणवी विधायक झज्जर से विधायक पंडित भगवत दयाल शर्मा ने 1 नवंबर 1966 को प्रदेश की सत्ता की बागडोर सम्भाली। हरियाणा गठन के मात्र 3 महीने 21 दिन बाद ही प्रदेश का पहला विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में 48 सीटे लेकर कांग्रेस के पंडित भगवत दयाल शर्मा ने 10 मार्च 1967 को दोबारा सरकार बनाई। सरकार बनने के बाद जश्न मना रहे पंडित जी को मात्र 13 दिन बाद ही सत्ता से हाथ धोना पड़ा। 24 मार्च 1967 को हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष राव बीरेन्द्र सिंह ने मुख्यमंत्री की कमान संभाली। हरियाणवी संस्कृति के पक्षधर रहे राव बीरेन्द्र को भी उनके विरोधियों ने चैन की सांस नहीं लेने दी। राव के शासन में दल-बदल चरम पर था। उसी समय हरियाणा की राजनीति आया-राम गया राम के रूप में मशहूर हुई थी। मात्र 7 महीने 27 दिन में ही राव बीरेन्द्र सिंह को कुर्सी छोड़नी पड़ी।
पहली बार 1967 में लगा राष्ट्रपति शासन
प्रदेश को बुलंदियों पर पहुंचाने और मुख्यमंत्रियों की राजनीतिक बलि लेने के बाद 21 नवंबर 1967 को राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राष्ट्रपति शासन के दौरान 12 मई 1968 को मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस को बहुमत मिला। सरकार बनाने को लेकर लंबी खींचतान हुई। मामला सुलझाने के लिए हाईकमान ने गुलजारी लाल नंदा और पंडित भगवत दयाल शर्मा को जिम्मेदारी दी। एक सप्ताह लंबी बैठकों के बाद चौधरी बंसीलाल के नाम पर सबकी सहमति बनी। गुलजारी लाल नंदा से नजदीकियों के कारण बंसी लाल की लॉटरी लग गई।
बंसी लाल को मिली सत्ता
प्रदेश में 6 माह से चल रहे राष्ट्रपति शासन के बाद 21 मई 1968 को बंसी लाल ने हरियाणा की सत्ता अपने हाथ में ले ली। अपने कुशल नेतृत्व में बंसी लाल ने आया-राम गया राम वाली राजनीति पर नकेल कसी। वर्ष 1972 में प्रदेश विधानसभा के आम चुनाव हुए और वह दोबारा सीएम बने। दबंग छवि से चौधरी बंसीलाल ने अफशाही पर लगाम लगाई और केंद्र पर भी मजबूत पकड़ बनाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना विश्वस्त मानते हुए केन्द्र में बुला लिया और उन्हें रक्षा मंत्रालय की कमान सौंपी। केंद्र से बुलावा आने के बाद भी बंसीलाल ने प्रदेश की राजनीति में दबदबा बरकरार रखा। 1 दिसंबर 1975 को वह अपने विश्वसनीय बनारसी दास गुप्ता को प्रदेश की सत्ता सौंप दिल्ली चले गए। गुप्ता, बंसी लाल के मार्गदर्शन में काम करने लगे। लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में चले आंदोलन व आपातकाल की घोषणा के चलते प्रदेश में 29 अप्रैल 1977 से 20 जून 1977 तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा।
आपातकाल और कांग्रेस विरोध
आपातकाल का पूरे भारत में जबरदस्त विरोध हुआ और 1977 में कांग्रेस का सफाया हो गया। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार के गठन के साथ ही प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया लेकिन जून में हुए चुनाव में जनता पार्टी भारी बहुमत से जीती और 21 जून 1977 को देवी लाल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। करीब दो साल के बाद ही देवी लाल के कुछ विधायकों ने सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया और 28 जून 1979 को भजन लाल ने देवी लाल से सत्ता ले ली। भजन लाल जनवरी 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के केन्द्र में काबिज होते ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से हाथ मिलाते हुए दलबल सहित कांग्रेस में शामिल हो गए। भजन लाल जनता पार्टी के मुख्यमंत्री की बजाय कांग्रेस के मुख्यमंत्री बन गए।
प्रदेश का पांचवां चुनाव
19 मई 1982 को प्रदेश में पांचवीं बार चुनाव हुए। पूर्ण बहुमत न होते हुए भी प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तपासे द्वारा सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता के रूप में भजन लाल को सीएम पद की शपथ दिलवा दी। राजनीति में पीएचडी की उपाधि के रूप में विख्यात भजन ने तय समय में बहुमत साबित कर सबको अचम्भित कर दिया। देवी लाल ने इसका विरोध किया। हालात भांपते हुए कांग्रेस हाईकमान ने 5 जून 1986 को भजन लाल की जगह बंसी लाल को सीएम बना दिया। बंसी लाल ने माहौल बदलने की कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए। 17 जून 1987 को हुए विधानसभा चुनाव में 78 सीटों पर लोकदल व उसकी सहयोगी पार्टियों ने कब्जा किया। 20 जून 1987 को देवी लाल ने सीएम की शपथ ली। उस समय देवीलाल ने लोकराज-लोकलाज से चलता है का नारा दिया था। नवंबर 1989 के लोकसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देवी लाल 2 दिसंबर 1989 को देश के उपप्रधानमंत्री बने और प्रदेश की कमान अपने बेटे ओमप्रकाश चौटाला को सौंप दी।
चौटाला बार-बार बने सीएम
ओमप्रकाश चौटाला उस समय विधायक नहीं थे और उनका 6 माह में विधायक बनना जरूरी था। देवी लाल द्वारा महम विधनसभा सीट से त्यागपत्र देने के बाद उपचुनाव हुआ और चौटाला ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में हिंसक घटनाएं हुई और सरकार की छवि खराब होने के कारण चौटाला मात्र 5 माह 22 दिन बाद ही सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। उस समय उप मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्ता को सीएम बनाया गया। मात्र 1 माह 19 दिन बाद ही बनारसी दास को सीएम पद से हटाकर ओमप्रकाश चौटाला फिर सीएम बन गए। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण मात्र 6 दिन बाद ही उप मख्यमंत्री मास्टर हुकम सिह को सीएम बनाना पड़ा। विभिन्न हालातों के कारण मास्टर हुकुम सिंह को बीच में ही हटाकर फिर चौटाला सीएम बन गए। कुछ दिन बाद ही राज्यपाल ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। उस समय राज्यपाल धनिक लाल मंडल ने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। चौटाला मात्र 15 दिन ही सीएम रहे। अब तक चौटाला 6 माह 12 दिन के कार्यकाल में तीन बार सीएम बन चुके थे। उनका बार-बार सीएम बनना और हटना चर्चा में रहा।
शराबबंदी पर हुआ विवाद
विपक्ष ने पिछले घटनाक्रमों को ओमप्रकाश चौटाला की पद लोलुपता व राजनीतिक अपरिपक्वता के रूप में पेश किया। 10 मई 1991 को हुए चुनाव में कांग्रेस बहुमत से जीती और भजन लाल फिर से सीएम बन गए। भजन लाल ने पांच साल प्रदेश में राज किया। इसी दौरान बंसी लाल ने प्रदेश में हरियाणा विकास पार्टी बना ली और 27 अप्रैल 1996 में हविपा-बीजेपी गठबंधन ने 44 सीट जीत कर सत्ता प्राप्त कर ली। बंसी लाल ने सत्ता में किया गया शराबबंदी कर दी। इसी विवाद में बीजेपी ने हविपा से सर्मथन वापिस ले लिया। उस समय कंाग्रेस ने अपना सर्मथन देकर बंसी लाल की कुर्सी बचा ली। 
कुछ दिन बाद कांग्रेस विधायकों ने हविपा से सर्मथन वापस लेकर बंसी लाल को सत्ता से चलता कर दिया। इसी दौरान हविपा के कुछ विधायकों ने नया दल बनाकर ओप्रकाश चौटाला को सर्मथन दे दिया। 24 जुलाई 1999 को ओमप्रकाश चौटाला फिर से सीएम बन। चौटाला ने 6 माह के दौरान ही विधानसभा भंग की सिफारिश कर दी। 22 फरवरी 2000 को हुए चुनाव में ओप्रकाश चौटाला के नेतृत्व वाली आईएनएलडी ने 47 और सहयोगी बीजेपी ने 6 सीटें जीतकर सत्ता प्राप्त कर ली। इस बार चौटाला का कार्यकाल पूरा हुआ।
कांग्रेस का आना और जाना
3 फरवरी 2005 के चुनाव में कांग्रेस 67 सीट लेकर सत्ता पर काबिज हुई। इस दौरान कांग्रेस में सीएम पद को लेकर लंबी खींचतान हुई और आखिर में सांसद भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को प्रदेश की सत्ता पर काबित कर दिया। 5 मार्च 2005 को भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सीएम बने। अक्टूबर 2009 में कांग्रेस फिर चुनाव जीती और लगातार दूसरी बार हुड्डा सीएम पर कबिज हुए। अक्टूबर 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और इस बार प्रदेश में बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। बीजेपी ने 26 अक्टूबर 2014 को आरएसएस बैकग्राउंड वाले मनोहर लाल को सीएम के पद के लिए चुना। मनोहर लाल ने हरियाणा के 10वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। इन 50 सालों में हरियाणा ने कई पार्टियां का उत्थान और पतन देखा है।


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