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नया हरियाणा

रविवार, 25 अगस्त 2019

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साली कै लाग ग्या म्हारे गाम का पाणी

हरियाणा में एक कहावत खूब चलती है-पाणी लाग ग्या-इसका सीधा अर्थ होता है बिगड़ना.

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13 जून 2018



नया हरियाणा

हरियाणवी गाना ‘म्हारे गाम का पाणी’ राजू पंजाबी एवं सुशीला ठाकुर द्वारा गाया गया है । इसके लेखक अजमेर सिँह है । हरियाणवी समाज में किसी अवैवाहिक लड़की का अपनी बहन की सुसराल जाना, सामाजिक तौर पर ठीक नहीं माना जाता । क्योंकि वहाँ पर लड़कों के द्वारा उस पर अनेक प्रकार की टोंट मारी जाती है । इस गाने में लड़की अपनी बहन की सुसराल आई हुई है । उसे देख कर लड़का कहता है कि-
“तू बदलै नई-नई तैयारी रै,
घणी होंदी जा सै प्यारी रै,
तेरे हुश्न का भाग हाड़ै जाग्गा बैरण रै,    
म्हारे गाम का पाणी तेरे लाग्गा बैरण रै,”

हरियाणा में एक कहावत खूब चलती है-पाणी लाग ग्या-इसका सीधा अर्थ होता है बिगड़ना. मतलब कोई भी इंसान अपने परिवार में रहकर कंट्रोल में रहता है और रिश्तेदारी में जाकर उसका कंट्रोल कम हो जाता है तो उसका बिगड़ना स्वाभाविक है. जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते वैसे भी बड़े नाजुक रिश्ते होते हैं. इनमें  बहुत महीन रेखा होती है, जिसे अक्सर लांघ दिया जाता है. जबकि ये दोनों रिश्ते बहुत आत्मीय रिश्ते होते हैं, इन्हें शारीरिक बना दिया गया है. जिसके कारण इन रिश्तों की गरिमा दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है.
इस गाने में देखा जा सकता है कि लड़की को अपनी बहन की सुसराल में आकर रोज नये-नये कपड़े पहने की छुट मिल गई है । जिससे उसके रंग-रूप में एक अलग प्रकार का निखार आ गया है । जिसे वह बहुत सुंदर लग रही है । जिस पर लड़का उसे कहता है हमारे गाँव में आकर ऐसा लगता है कि तुम्हारे यौवन का तो भाग्य ही खुल गया है । ऐसा लगता है तुमे हमारे गाँव का पानी लग गया है । आखिर ऐसा क्या कारण है कि लड़का जो यह कह रहा है कि तुमे म्हारे गाम का पानी लग गया है, क्या लड़की के गाँव में पानी नहीं है, या इस के पिछे कोई ओर कारण है । इसका कारण जानने पर पता चलता है कि लड़की पर अपने घर में अनेक की पाबंदियाँ हैं । उसे अपनी मर्जी से खाने-पीने, ओढ़ने-पहने की, जाने-आने की छुट नहीं है ।
‘वोड़का की बोतल बरगा रूप कसुत्ता लेरी सै,
मीता बरोदा गट-गट पी जा याऐ इच्छा मेरी सै,
जब तेरी बेबे नै बुलाई थी,
तू कत्ती सुकली-सी आई थी....
दस दिन म्हं भोलापन तेरा भाग्गा बैरण रै, 
म्हारे गाम का पाणी तेरे लाग्गा बैरण रै’
यहाँ पर लड़का पितृसत्तात्मक मानसिकता से लैश होकर कहता है कि मुझे तुम्हारा यौवन सौंदर्य वोड़का की बोतल की तरह दिखाई दे रहा है । जिस तरह एक शराबी शराब देख कर ललाहित हो जाता है उसी प्रकार लड़का, लड़की के यौवन को देखकर ललाहित हो गया है । वह कहता है कि तुम्हारे यौवन सौंदर्य को वोड़का की बोतल की तरह गट-गट पीना ही मेरी इच्छा है । फिर वह कहता है कि जब तुमे तुम्हारी बहन ने बुलाया था । तब तुम बहुत ही दुबली-पतली-सी आई थी लेकिन अब दस दिन के अन्दर ही तुम्हारे चहरे पर जो मासूमयित और जो सादगी थी अब वह गायब हो गई है । ऐसा लगता है कि तुमें हमारे गाँव का पानी लग गया है ।
‘सोल्हे चढ़ती उमर तेरी, चाहे कुछ सरमाणा रै,
बेबे की सुसराड़ म्हं आकै ठीक नां गरकाणा रै,
तू घणी गाळ म्हं डोलै सै,
पाणी नै पा-पा बोलै सै,
लाम्बी चोटी ढूगे लटकै नाग-सा बैरण रै,
म्हारे गाम का पाणी तेरे लाग्गा बैरण रै’
जब भी कोई स्त्री पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाये गये नियमों और मूल्यों से बाहर निकलने की कोशिश करती है, तो पितृसत्तात्मक समाज को यह मंजूर नहीं है । वह उसे झूठे मान-मर्यादा के नाम पर, धर्म के नाम पर, परंपराओं के नाम पर इसकी यथास्थिति को बनाये रखना चाहता है । लड़का उसे समझाता हुआ कहता है कि अभी तुम सोलह वर्ष की  हुई हो, अभी तो तुम्हारे यौवन की शुरूआत हुई है । इसलिए तुमें गली में बार-बार नहीं घुमना चाहिए । तुमें बहन की सुसराल में आकर सरमाणा चाहिए । इस तरह तुम्हारा यह गली में गरकाना ठीक नहीं है और जो तुम्हारी लम्बी चोटी कमर पर लट रही है मानो ऐसा लग रहा है जैसे कोई साँप बलखा रहा हो । ऐसा लगता है कि तुमें हमारे गाँव का पानी लग गया है ।
‘मोटी-मोटी आँख्या म्हं घाळ कै सहाई तू,
चढ़ चौबारे तोड़े जा अंगड़ाई तू,
तू हद तै ज्यादा नखरी रै,
छोरा कै दिल म्हं उतरी रै, 
अजमेर सिँह का गाम बलम्बा फाब जा बैरण रै, 
म्हारे गाम का पाणी तेरे लाग्गा बैरण रै’
लड़का कहता है कि तुम जब अपनी मोटी-मोटी आँखों में काज़ल लगाकर चौबारे की छत पर चढ़ कर अंगड़ाई लेती हो । सभी तुमें देखने लग जाते हैं । तुम्हारे यौवन में बहुत ही ज्यादा निखार आ गया है ।  यह सब देखकर सभी छोरे (लड़के) तुमें प्रेम करने लगे है । तुम उन सभी के दिल में बस गई हो । ऐसा लगता है कि तुमें हमारे गाँव का पानी लग गया है ।
यह पूरा गाना पितृसत्तात्मक मानिसकता को लेकर लिखा गया है । इस गाने में दिखाया गया है कि स्त्री चाहे किसी भी वर्ग, जाति की हो, शिक्षित हो या अशिक्षित हो, शहरी हो या ग्रामीण हो, धनी हो या निर्धन, मालिक हो या मजदूर, प्रत्येक स्त्री का शोषण-दमन एक जैसा तंत्र ही करता है, जिससे पितृसत्तात्मक तंत्र कहते है । भारतीय समाज पितृसत्तात्मक समाज है । इसमें लड़की व लड़के का पालन-पोषण अलग ढंग से किया जाता है । आरम्भ से ही लड़की को परिवार के कार्यों में दक्ष बनाने का प्रयास किया जाता है । वहीं उसकी गतिविधियों व व्यवहार पर पिता का पूरा नियंत्रण होता है । यहां स्त्री अस्मिता सदियों तक परिवार की चारदीवारी में बंदी होकर रही है । अभी भी ग्रामीण अंचलों और कस्बों की स्त्रियों की स्थिति में ज्यादा परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है । वे आज भी पुरुष के दबाव में पूरी तरह रहती हैं । इस गाने  के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री पर जकड़ बंधी को आसानी से समझा जा सकता है । जो हमेशा उसे अपने आधीन रखना चाहता है । उसे स्त्री की स्वतंत्रता बर्दाश नहीं होती है । इसलिए वह उस पर अनेक प्रकार की पाबंदियाँ लगाता है ।


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