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नया हरियाणा

बुधवार, 20 जून 2018

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मासूम शर्मा और अजय हुड्डा की गली में आया नया पटोला!

हरियाणवी पॉपलुर गाना ‘म्हारी गाळ म्हं एक पटोला तू’ मासूम शर्मा द्वारा गाया गया हैं और इसके लेखक अजय हुड्डा हैं।

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12 जून 2018

इकबाल सिंह

हरियाणवी पॉपलुर गाना ‘म्हारी गाळ म्हं एक पटोला तू’ मासूम शर्मा द्वारा गाया गया हैं और इसके लेखक अजय हुड्डा हैं। इस गाने में एक स्त्री के पति से इतर प्रेम-संबंध को आधार बनाया गया है। स्त्री को समाज किसी मान्य संबंध में ही स्वीकार करता है, क्योंकि स्त्री को परिवार की वंश बेल बढ़ाने का माध्यम भर समझा जाता है. वहीं पुरुष उस पैतृक संपत्ति का रखवाला समझा जाता है. वैसे तो समाज की नजर में अनैतिक संबंध दोनों के ही गलत समझें जाते हैं, परंतु स्त्री को पुरुष की तुलना में ज्यादा दोषी माना जाता है.
समाज द्वारा निर्धारित संबंधों के अतिरिक्त यदि स्त्री-पुरुष में कोई संबंध कायम होता है तो वह ‘अवैध’ संबंध माना जाता है। जिसकी एक भारी कीमत स्त्री को ही चुकानी पड़ती है। गाने के अनुसार नायिका अपने वैवाहिक जीवन में अपने पति से संतुष्ट नहीं है। अब स्त्री या पुरुष के संतुष्ट होने का पैमाना क्या है? और कोई भी एक-दूसरे को सभी स्तरों पर यानी आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, पारिवारिक एवं शारीरिक  आदि स्तरों पर संतुष्ट कैसे कर सकता है? विमर्श इस पर होना चाहिए, जबकि बहस आरोप-प्रत्यारोप और एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर होने लगती है. बौद्धिक विमर्श पुरुषवाद को दोषी मानता है और आम इंसान स्त्री को तिरिया चरित्र मानता है. ऐसे में होना यह चाहिए कि अनैतिक कर्म करने वाले व्यक्ति का बचाव किसी भी तरह नहीं करना चाहिए. वह चाहे पुरुष हो या स्त्री. और दोनों के लिए मापदंड का पैमाना एक होना चाहिए. यह नहीं कि स्त्री के लिए दूसरा पैमाना और पुरुष के लिए दूसरा. गलत तो गलत ही होता है. वह स्त्री करे या पुरुष.
“म्हारी गाळ म्हं एक पटोला तू
हाये-हाये मरजाणी करै ओल्हा क्यू
मेरी नणदी का भाई छोल्या नू
हाय मरजाणै करू ओल्हा नू”  
इस गाने में प्रेमी अपनी प्रेमिका को कहता है कि पूरी गली में तुम ही देखने लायक हो और तुम ही (ओल्हा) पर्दा करके चलती हो, प्रेमिका कहती है मेरी ननंद का भाई, मतलब उसका पति बड़ा गुस्से वाला है यदि उसने हम गली में ऐसे बातें करते देख लिया तो हम दोनों के ले ठीक नहीं है । साथ ही यहाँ पर देखा जा सकता है कि पत्नी अपनी पति का सीधा नाम ना लेकर उसे ननंद का भाई कहकर संबोधन कर रही है । जिससे पता चलता है कि भारतीय संस्कृति में पति का नाम लेकर पुकारना अच्छा नहीं माना जाता है । इसलिए मैं गली में पर्दा करके चलती हूँ । 
“गाळ म्हं टोकै छोरे पड़ जागा रोला
एकली नै टोकयै बन जागा काम तोळा
हाड़ै गाळ सारी देख्य बोला क्यू
हाये-हाये मरजाणै करू ओल्हा नू”
जब प्रेमी अपनी प्रेमिका से गली में बात-चीत करने लगता है । वह उसे समझाती है कि गली में इस तरह सभी के सामने बोलना ठीक नहीं हैं । जब मैं अकेली हो, जब बात करना जो तुम चाहते हो, वह काम जल्दी हो जाएगा । यहाँ पर पूरी गली हमें देख रही है। इसलिए मैं पर्दा करके चल रही हूँ ।
प्रेमी प्रेमिका से कहता है कि -
“एकली नां फेटती यो खोट तेरा वारा
लाकै मोक्का मरजाणी खोल दे चौबारा
इब ढटती नां झाळ दिख्य बोला नू
हाये-हाये मरजाणी करै ओल्हा क्यू”
वह कहता है कि तुम कभी भी अकेली नहीं मिलती हो । कोई-ना-कोई हमेशा ही तुम्हारे साथ होता है । मुझे लगता है कि तुम जान-बूझकर ऐसा करती हो । मुझे इसमें तुम्हारा ही कसूर दिखाई देता है । प्रेमी कहता है कि बहुत दिन हो चुके है, तुम्हारा इन्तजार करते-करते, अब मुझसे कंट्रोल नहीं हो रहा है । इसलिए जब भी तुमें मौका मिले, तो चौबारे के किवाड़ खोल दो । यहाँ पर किवाड़ खोलना एक प्रतीक है उसे आमन्त्रण का ।   
“सो जा भरतार मेरा आइऐ आधी रात नै
दबै पैर आयै कदे तड़वालै गात नै
कदे फंसवा दे मन मेरा डोला नू
हाये-हाये मरजाणै करू ओल्हा नू”
प्रेमिका वह उसे रात के समय अपने घर आने के लिए आमंत्रित करती हैं। वह कहती है कि जब मेरा पति सो जाए, तब बड़ी सावधानी पूर्वक आना दबे पैर आना । प्रेमी उसे कहता है कि कहीं तुम मुझे घर बुलवाकर फंसवा मत देना । मुझे यह सोचकर डर लग रहा है ।
इस हरियाणवी पॉपलुर गाने में देखा जा सकता है कि पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला हमारा समाज स्त्री मन में काम-भावना होती है, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता है । काम-संबंधों के बारे में स्त्री का अपना अनुभव, अपनी संवेदना और अपनी दृष्टि को न सिर्फ अस्वीकार किया जाता है बल्कि नैतिकता की दुहाई देकर इसका दमन भी किया जाता है । यही कारण है कि जहाँ पति-पत्नी के सम्बन्ध को जिसमें स्त्री की स्वतंत्र इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता है । एक सहज और प्राकृतिक सम्बन्ध के रूप में सामाजिक मान्यता दे दी जाती है वहीं उसकी स्वेच्छाजन्य प्रेमी-प्रेमिका सम्बन्ध को अश्लील और अनैतिक करार दे दिया जाता है ।  जबकि हमारा समाज दांपत्य जीवन में जबरदस्ती किए जाने वाले सेक्स संबंधों को बलत्कार की श्रेणी में नहीं रखता है । हमारा समाज इसे पति-पत्नी का आपसी मामला समझकर उस पर चादर ओढ़े रखना चाहता है । ऐसे संबंध अंदर-अंदर सड़कर रिसने लगते हैं । स्त्रियों की तरफ से अपनी इस सहज कामेच्छा का अपनी दृष्टि से वर्णन करने की स्वतंत्रता की माँग या प्रयास स्त्री स्वतंत्रता का एक महत्त्वपूर्ण एजेंडा बन कर इस हरियाणवी पॉपलुर गीत में उभर रहा है ।
 


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