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नया हरियाणा

सोमवार , 10 दिसंबर 2018

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 चुनाव से पूर्व बसपा ने इनेलो से गठबंधन तोड़ा तो क्या होगा?

इनेलो और बसपा गठबंधन पर कांग्रेस चुप क्यों बैठी रहेगी?

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12 जून 2018

नया हरियाणा

इनेलो और बसपा गठबंधन को लेकर विपक्षी दल शुरू से ही इसे मजबूरी का गठबंधन कहते हों, पर यह बात सभी जानते हैं कि असल में यह गठबंधन है मजबूती का गठबंधन. पर इस गठबंधन के टिके रहने को लेकर शंकाएं बनी रहती हैं, इसके कई राजनीतिक कारण हैं.
पहला कारण है कि लोकसभा और विधान सभा की टिकटों के बंटवारे को लेकर सहमति बनना बहुत मुश्किल काम है, क्योंकि दोनों दलों की अपनी राजनीतिक मजबूरियों को दोनों समझ रहे हैं. इसलिए लचीला होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं. दूसरी तरफ बसपा के पास हरियाणा में कांग्रेस का विकल्प हमेशा खुला रहेगा. जिसके कारण उसका पांव इनेलो पर भारी पड़ने की संभावना है.
कांग्रेस और बसपा का दूसरे राज्यों में गठबंधन चल भी रहा है. ऐसे में यह शंका सिर उठाती है कि चुनाव के समय बसपा इनेलो से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस से गठबंधन कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो यह इनेलो के लिए आत्मघाती साबित होगा. इससे कार्यकर्ता और इनेलो हाईकमान दोनों के हौंसले टूट सकते हैं.
कांग्रेस इस तरह के काम करने के लिए कुख्यात भी है और ऊपर से हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा को इस तरह की राजनीतिक चालें चलने का हुनर भी खूब आता है. हरियाणा की राजनीति में सबसे कुटिल चाल चलने के लिए भूपेंद्र हुड्डा का लोहा माना जाता है. कब किसे दोस्त और दुश्मन बना लें, कहा नहीं जा सकता.
इनेलो की राजनीतिक विवशता को बसपा बखूबी समझती है. इसीलिए इस गठबंधन को लेकर शक करने के कई कारण हैं. इससे पहले 1999 में भी यह गठबंधन पहले बनकर टूट चुका है. ऐसे में देखना यह होगा कि इनेलो सुप्रीमो अभय सिंह चौटाला कैसे इसे साधते हैं और बचाए रखते हैं. उनकी राजनीतिक सूझबूझ का यह सच में परीक्षाकाल चल रहा है. कठिन परिस्थितियों में उन्होंने पार्टी के वर्करों को जोड़े रखा है. अब देखते हैं वो इस गठबंधन को जोड़े रखते हैं या नहीं.

इनेलो और बसपा गठबंधन पर कांग्रेस चुप क्यों बैठी रहेगी? जबकि कांग्रेस यह जानती है कि इस गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होना है. यह गठबंधन जितना मजबूत होगा उतना ही कारगर होगा और कांग्रेस को कमजोर करेगा. जाट, दलित और मुस्लिम वोटों को ध्रुवीकरण कैरना वाली हालत कर सकता है भाजपा की. पर हरियाणा के कांग्रेसी नेता वो भी भूपेंद्र हुड्डा यह सारा खेल चुपचाप कैसे देख सकते हैं. वो केवल भाजपा की हार से संतुष्ट होने वाले नेता नहीं है.
फैवीकॉल की एड में तो होती जोड़ को तोड़ते हुए दिखाया गया है, क्या उसे प्रतीक माना जा सकता है या भविष्य की तरफ कोई संकेत.


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