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मनघडंत पत्रकारिता का नायाब उदाहरण है 'वायर' की रिपोर्ट!

वैसे भी राजीव फाउंडेशन की कथा बहुत दिलचस्प है कि कैसे दिल्ली की सबसे प्राइम लोकेशन पर कांग्रेस का दफ्तर बना और फिर वो फाउंडेशन में तब्दील हो गया। जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी बन गई।

The unimportant example of a journalistic journal is 'Wire' report!, naya haryana, नया हरियाणा

4 नवंबर 2017



आदर्श सिंह

'द वायर' एक बार फिर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। कभी भाजपा के मीडिया प्रकोष्ठ में काम करने के बाद अकस्मात सेक्यूलर क्षितिज पर धमकेतू की तरह चमकने वाली स्वाति चतुर्वेदी ने लगभग चार-पांच हजार शब्दों का आलेख लिखा है,  राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) के बेटे शौर्य डोभाल के बारे में। वो यह कि शौर्य डोभाल इंडिया फाउंडेशन का कामकाज संभालते हुए आजीविका के लिए साथ में जैमिनी फाइनेंशियल सर्विस भी चलाते हैं। यहां उन्हें हितों का टकराव दिखता है क्योंकि इंडिया फाउंडेशन के कई निदेशक केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं। 

वायर ने यह भी पता लगा लिया कि जैमिनी में दो पार्टनर सऊदी अरब के हैं। यहां तक तो ठीक पर, पर पांच हजार शब्दों के इस महा-आलेख में सिर्फ हितों के टकराव की संभावना का जिक्र है। पर दूर-दूर तक कोई आरोप तक नहीं। फिर ये है क्या? किस एंगल से यह पत्रकारिता कही जा सकती है? यह मूलतः माना मूलधन 100रु वाले सिद्धांत पर टिकी पत्रकारिता है। पूरा दुःख दर्द यह है कि फाउंडेशन होने के नाते इंडिया फाउंडेशन के पास वित्तीय लेन-देन को सार्वजनिक नहीं करने की स्वतंत्रता है। 

चिट्ठी भेजने के बाद भी शौर्य डोभाल ने कोई जवाब नहीं दिया। तो चिट्ठी का जवाब नहीं देना भी कोई घोटाला है, वो भी अगर वो वायर की तरफ से भेजी गई हो तो? पूरा आलेख है कि जरा सोचिए, अगर वाड्रा की कंपनी में सऊदी पार्टनर होते तो? तो क्या होता? अगर वाड्रा ने आधा गुड़गांव रातोंरात खरीद के बेच नहीं दिया होता तो क्या कोई पत्रिका या पोर्टल यह पूछता कि क्या स्काईलाइट हास्पिटैलिटी में कोई इतालवी पार्टनर भी है? या फिर दर्द ये है कि महान धर्मनिरपेक्ष यौद्धा जाकिर नाईक द्वारा राजीव फाउंडेशन को दिए गए चंदे का खुलासा हो गया। वैसे भी राजीव फाउंडेशन की कथा बहुत दिलचस्प है कि कैसे दिल्ली की सबसे प्राइम लोकेशन पर कांग्रेस का दफ्तर बना और फिर वो फाउंडेशन में तब्दील हो गया। जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी बन गई।

कमाल तो यह कि वायर की साइट को खंगालने से पता चलता है कि इसे भी कोई आईपीएस फाउंडेशन ही चलाता है और उसके भी ट्रस्टियों में कोई आशीष धवन हैं, जो प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर हैं। दूसरे सेबी के पूर्व अध्यक्ष सी. बी. भावे हैं, जिनके खिलाफ कमोडिटी एक्सचेंज के हजारों -लाखों करोड़ के महा घोटाले, जिसके सूत्रधार कोई जिग्नेश शाह थे, के मामले में सीबीआई जांच चली। सेबी के एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई हुई पर भावे बेदाग बरी हो गए। कहा गया कि भावे के भारी विरोध के बावजूद सेबी ने जिग्नेश शाह को अपना प्राइवेट स्टॉक एक्सचेंज चलाने की मंजूरी दे दी। यहां कोई आरोप नहीं है। सिर्फ पूर्व में घटी घटना का वर्णन है।

मुझे इसमें कोई संशय नहीं कि भावे ईमानदार अफसर थे। इसलिए सीबीआई जांच में बेदाग निकले। पर इस फाउंडेशन पर संशय है जो निर्भीक पत्रकारिता के नाम पर तीर-तुक्का ब्रांड पत्रकारिता का बीजारोपण कर रहा है। किस मकसद से?  शौर्य डोभाल पर कोई आरोप प्रथम दृष्ट्या भी प्रतीत होता है तो लगाना चाहिए, पर पांच हजार शब्द इस पर बर्बाद कर देना कि कोई खेल हो सकता है, बेमिसाल प्रतिभा का ही कमाल हो सकता है। मकसद आरोप लगाना था या सिर्फ संशय के बीज बोना? यह खोजी पत्रकारिता है या नमकहलाली की?

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(यह लेख आदर्श सिंह की फेसबुक पोस्ट पर आधारित है.)

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