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नया हरियाणा

सोमवार , 16 सितंबर 2019

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भतीजा दुष्यंत चौटाला चाचा अभय सिंह को बैठा पाएगा सत्ता के सिंहासन पर!

ओमप्रकाश चौटाला जैसी असमंज वाली स्थिति देवीलाल को भी हुई थी,

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10 जून 2018



नया हरियाणा

चौटाला परिवार में सत्ता के संघर्ष की खबरें आजकल ज्यादा सुनने को मिल रही हैं, क्योंकि फिलहाल इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला और अजय सिंह पेरोल पर बाहर आए हुए हैं. हो सकता है कि परिवार में सत्ता किसे सौंपी जाए, इसे लेकर मंथन या हक की लड़ाई का संघर्ष चल रहा हो. सोशल मीडिया पर फैली खबरें के अनुसार सारी लड़ाई अभय सिंह और दुष्यंत चौटाला के बीच चल रही है. ठीक वही स्थिति ओमप्रकाश चौटाला के सामने आन खड़ी हुई है, जैसी उनके पिता देवीलाल के सामने आन खड़ी हुई थी. जब उन्हें ओमप्रकाश और रणजीत में से किसी एक को सत्ता सौंपनी थी. देवीलाल ने सत्ता ओमप्रकाश चौटाला को सौंपी थी. हरियाणवी परिवेश में कहावत भी है कि पिता का मोह छोटे पुत्र में अधिक होता है. ऐसे में संभावना यही हैं कि ओमप्रकाश चौटाला अभय सिंह को ही इनेलो की कमान सौंपेंगे. क्योंकि अभय सिंह को लेकर पब्लिक डोमेन में, जो एक खराब छवि बनी हुई है. वह उनके पिता की ही देन है या यूं कह सकते हैं कि उन्होंने एक अनुकरण करने वाले बच्चे का किरदार निभाया था.
दूसरी तरफ अजय सिंह के बच्चों के लिए चाचा अभय सिंह का नेतृत्त्व स्वीकार करना पड़ेगा. दुष्यंत चौटाला की कथनी से तो यही आभास होता है कि वो अभय सिंह का नेतृत्त्व स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि वो देवीलाल को खुद हमेशा आदर्श बताते हैं. देवीलाल कहा करते थे कि सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं, अपितु जन सेवा के लिए होती है. ऐसे में यह दुष्यंत चौटाला के लिए सचमुच परीक्षा काल है.देखते हैं उनकी कथनी और करनी में कोई सामजंस्य है या नहीं. वैसे देश के राजनीतिक परिवारों में सत्ता के लिए आपस में संघर्ष कोई नई बात नहीं है. इससे पहले भी उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक बड़े बड़े राजनीतिक परिवारों के संघर्ष देश ने देखे हैं.
किसी भी परिवार में संघर्ष की मुख्य वजह सत्ता की ताकत होती है. समस्या ये है कि परिवार में मुख्यमंत्री पद को लेकर सारा झगड़ा है, लेकिन पार्टी पर पूरा नियंत्रण अभय सिंह का है. यूपी में भी ऐसा ही नियंत्रण शिवपाल यादव का था. पार्टी में दो Power सेंटर पार्टी के लिए परेशानी पैदा करते हैं. मुख्यमंत्री चेहरा बनने से लेकर टिकट बंटवारे तक में हित आपस में टकराने लगते हैं. बाहर से सब ठीक दिख भी रहा होता है तो अंदर ही अदंर एक-दूसरे को कमजोर करने के प्रयास चलते रहते हैं. यही सब आजकल चौटाला परिवार के दो पॉवर सेंटरों में देखने को मिल रहा है.
परिवारवादी राजनीति में आपसी संघर्षों का इतिहास
 अन्य परिवारों की बात करें तो इससे पहले दक्षिण भारत की राजनीति में हम ऐसा देख चुके हैं। जब 2014 में DMK के अध्यक्ष एम करुणानिधि ने अपने बेटे एमके स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था । इसके बाद करुणानिधि के दूसरे बेटे एमके अलागिरी ने पार्टी से बगावत कर दी थी और करुणानिधि पर भेदभाव का आरोप लगाया था।इसका नतीजा ये हुआ कि एमके अलागिरी को पार्टी से निकाल दिया गया। 
इसके अलावा महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना के अंदर भी ऐसा ही झगड़ा सामने आया था। जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच में सत्ता को लेकर संघर्ष देखने को मिला था। इसके बाद राज ठाकरे ने शिवसेना से किनारा किया और अपनी अलग पार्टी बनाई जिसे आज आप महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के नाम से जानते हैं। 1995 में ऐसा ही संघर्ष आंध्र प्रदेश में भी हो चुका है। जब तेलुगुदेशम पार्टी में फूट पड़ गई थी। उस वक्त एनटी रामाराव को उन्हीं की बनाई हुई पार्टी से उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने अलग कर दिया था। 
हरियाणा में पूर्व उप प्रधानमंत्री देवी लाल के परिवार में भी ऐसी ही फूट पड़ गई थी। जब देवीलाल के बेटे रणजीत सिंह ने अपने भाई ओम प्रकाश चौटाला के खिलाफ बगावत कर दी थी । रणजीत सिंह ने कांग्रेस पार्टी को ज्वायन कर लिया था और वो कांग्रेस में करीब एक दशक तक रहे और बाद में बीजेपी में भी आए।  हरियाणा के एक और राजनीतिक परिवार बंसीलाल के परिवार में 1991 में फूट पड़ गई थी। बंसीलाल के बेटे रनबीर सिंह महिन्द्रा ने अपने ही पिता के खिलाफ बगावत कर दी थी क्योंकि बंसीलाल ने एक विधानसभा सीट का टिकट रनबीर को न देकर किसी और को दे दिया था।
भारत में बहुत सारे राजनीतिक परिवार हैं.. अब्दुल्ला परिवार है.. मुफ्ती परिवार है.. बादल परिवार है.. गांधी परिवार है..करुणानिधि का परिवार है.. लालू यादव का परिवार है.. लेकिन इन परिवारों ने राजनीति और सत्ता के चक्कर में कभी भी परिवार के अंदर दरार नहीं आने दी.. और सभी सदस्य़ों ने एक दूसरे का ख्याल रखा।.. मुलायम सिंह यादव के परिवार को भी अब तक ऐसे ही परिवारों में गिना जाता था.. लेकिन आज इस परिवार में एक बड़ी दरार दिखाई दे रही है. ऐसे में देखना यह होगा कि इस आपसी सत्ता संघर्ष को ओमप्रकाश चौटाला कैसे संभाल पाते हैं?
 


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