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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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पानीपत की शान : पत्रकार, लेखक और फिल्म निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास

ख्वाजा अहमद अब्बास  जिनका आज जन्म दिन है.

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7 जून 2018

रणदीप घणघस

ख़्वाजा अहमद अब्बास प्रसिद्ध पत्रकार   फ़िल्म निर्देशक, पटकथा फिल्म  लेखक और उर्दू लेखक थे। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 'अलीगढ़ ओपिनियन' शुरू किया।  उन्होंने  अनेक किताबें लिखी| हरियाणा साहित्य अकादमी ने उन्हें सम्मानित  किया| 'बॉम्बे क्रॉनिकल' समाचार पत्र  में ये लंबे समय तक बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक रहे। इनका स्तंभ 'द लास्ट पेज'  दुनिया के  सबसे लंबा चलने वाले स्तंभों में गिना जाता है।  

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ख़्वाजा अहमद अब्बास  का जन्म 7 जून 1914 को हरियाणा राज्य के पानीपत में हुआ। वे 'ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास' के पोते थे जो 1857 के विद्रोह के शहीदों में से एक थे। उनके पिता 'ग़ुलाम-उस-सिबतैन' थे जबकि 'मसरूर ख़ातून' उनकी माँ थीं। जिंनका सम्बन्ध  प्रसिद्ध शायर अल्ताफ हुसैन हाली के परिवार से था  । अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए, अब्बास साहब 'हाली मुस्लिम हाई स्कूल' गये जिसे उनके परनाना यानी प्रसिद्ध उर्दू शायर ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली  द्वारा स्थापित किया गया था। पानीपत में उन्होंने 7वीं कक्षा तक अध्ययन किया, 15 वर्ष की आयु होने पर मैट्रिक समाप्त की और बाद में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में बी.ए.  और एल.एल.बी  की  । उन्होंने मुज़्तबी बेगम के साथ विवाह का अति सुंदर वर्णन उनकी आत्मकथा 'आई एम नॉट आइलैंड' में किया गया है। 

अब्बास साहब ने जल्द ही एक पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू कर दिया। उन्होंने 'अलीगढ़ ओपिनियन' नाम की देश की पहली छात्र-प्रकाशित पत्रिका शुरू की। इससे पहले उन्होंने, तुरंत अपने बीए के बाद, नेशनल कॉल नाम के अख़बार में भी काम किया था। सन् 1935 में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बाहर आने के बाद, वे बॉम्बे क्रॉनिकल में शामिल हो गए जहां उन्हें जल्द ही फ़िल्म विभाग के संपादक के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। वहां वे 1947 तक काम करते रहे। 1936 में, वे बॉम्बे टॉकीज़ के पार्ट-टाईम पब्लिसिस्ट के रूप में फ़िल्मों में आ गएं जो हिमांशु राय और देविका रानी की प्रॉडक्शन कम्पनी थी। उन्होंने 1941 में अपनी पहली पटकथा 'नया संसार' भी इसी कंपनी को बेची।

1945 में ख़्वाजा साहब का एक निर्देशक के रूप में कैरियर शुरु हुआ जब उन्होंने इप्टा के लिए 'धरती के लाल' नाम की एक फ़िल्म बनाई। यह 1943 के बंगाल में पड़े अकाल पर आधारित थी। 1951 में, उन्होंने 'नया संसार' नाम की अपनी ख़ुद की कंपनी खोल ली जो 'अनहोनी' (1952) जैसी सामाजिक प्रासंगिकता की फ़िल्मों का निर्माण करने लगी। अब्बास साहब की फ़िल्म 'राही' (1953), मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। चेतन आनंद के लिए 'नीचा नगर' (1946) लिखने से पहले, अब्बास साहब वी. शांताराम के लिए 'डॉ. कोटनीस की अमर कहानी' (1946) भी लिख चुके थे। ख्वाज़ा अहमद अब्बास   बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे  ख़्वाजा अहमद अब्बास जो ना सिर्फ़ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी भारत के लिए एक अनमोल रत्न थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें एक फ़िल्म निर्देशक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और उर्दू, हिंदी एवं अंग्रेज़ी का पत्रकार होने की इजाज़त देता था। उनका कॉलम 'लास्ट पेज' (बॉम्बे क्रॉनिकल में 1935 में शुरू हुआ और 1947 के बाद से ब्लिट्ज़ में छपने लगा। जहां वह उनकी मृत्यु तक जारी रहा। अब्बास साहब कोई साधारण आदमी नहीं थे। वे एक ज्वालामुखी थे।  ख़्वाजा अहमद अब्बास तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू छात्र जीवन के समय से मित्र थे। सन 1947 में देश विभाजन के समय उनकी माँ सहित सभी निकट संबंधी पाकिस्तान चले गये (पिता की मृत्यु 1942 में हो चुकी थी), लेकिन वह पाकिस्तान नहीं गये 

ख़्वाजा अहमद अब्बास जब अपने जीवन के अंतिम दिनों में गंभीर रूप से बीमार थे और अर्थाभाव से जूझ रहे थे तब उन्होंने अपनी फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के अधिकार उतनी ही राशि में बेचे थे जितनी राशि उनके इलाज के लिए ज़रूरी थी। हिंदी सिनेमा के मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाग में अब्बास से जुड़ी यादों को ताजा करते हुए बताया कि अब्बास सिद्धांतों पर विश्वास करने वाले ऐसे ईमानदार व्यक्ति थे जिनके मन में व्यवसायिकता अपनी जड़ नहीं जमा सकी। वह दूसरों के लिए जीने में विश्वास करते थे। लेकिन किसी से अपेक्षा नहीं करते थे। उनका दिल बहुत बड़ा था। उन्होंने लिखा है कि अब्बास इतने स्वाभिमानी व्यक्ति थे कि जीवन के अंतिम समय में भी उन्हें किसी की सहायता लेना मंजूर नहीं था। 

अब्बास साहब ने पांच दशकों की अवधि में 73 से अधिक अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू में पुस्तकें भी लिखीं। उन्हें आज भी उर्दू साहित्य की एक विलक्षण प्रतिभा माना जाता है। उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब 'इंकलाब' रही है, जो सांप्रदायिक हिंसा के मुद्दे पर चोट करती है। इंकलाब सहित उनकी कई पुस्तकों का अनुवाद कई भारतीय और विदेशी भाषाओं जैसे रूसी, जर्मन, इतालवी, फ्रेंच और अरबी में किया गया है। उनकी आत्मकथा 'आई एम नॉट ऍन आयलैंड: ऍन एक्सपैरीमेंट इन ऑटो बायोग्राफ़ी' पहली बार 1977 में प्रकाशित हुई और फिर 2010 में इसे पुनः प्रकाशित किया गया |

"उनकी  हवेली "

पानीपत में ख्वाज़ा  साहब कि खानदानी हवेली  पानीपत में थी  | पानीपत के उर्दू साहित्यकार कुमार पानीपती ने बताया कि जब  देश आजाद हुआ  उसके बाद उनकी हवेली   में कोई पारिवारिक सदस्य  नहीं था   | ख्वाज़ा साहब इस हवेली के मालिक थे | कही ये हवेली  पाकिस्तान जाने वालो की समझ  कर सरकारी कर्मचारी  किसी शरणार्थी  को अलाट न  कर दे  इसलिए  उन्होंने  हवेली के बाहर लिखवा दिया कि इस हवेली के मालिक  पाकिस्तान  नहीं  गये है  वे यही  हिंदुस्तान  में है | पर सरकारी कर्मचारियों  ने पाकिस्तान से आने  वाले एक शरणार्थी को  उनकी हवेली अलाट कर दी |  अपनी  हवेली   पाने के लिए  ख्वाज़ा साहब ने अदालत में सरकार के खिलाफ  मुकदमा दायर किया  और जीते भी  | जब उनकी हवेली में रहने वाले सरदार जी ने कहा कि अब मै कहा जाऊ   तो  दिलदार  ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने अपनी हवेली मात्र एक रूपये उन  सरदार जी को बेच दी   जब किसी ने उनसे पूछा कि आपने इतना रुपया मुकदमे में खर्च कर हवेली दुबारा प्राप्त की है और मात्र एक रूपये में बेच दी तो  ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने जवाब दिया कि  वो तो   हवेली इसे भी दे देते  पर ये भाई स्वाभिमान से इस हवेली में मालिक  बन कर  रहे   इसलिए  ये कीमत ली है  ताकि कल को कोई इन्हें ये न कहे कि फ्री के मकान में रह रहे है |


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