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नया हरियाणा

बुधवार, 15 अगस्त 2018

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कर्मचारियों के असली गुनहगार तो हैं हुड्डा के चहेते नौकरशाह!

10 अप्रैल 2006, उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय बना रद्द होने का बड़ा कारण.

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1 जून 2018

ऋषि पांडेय

हरियाणा सरकार के तकरीबन सवा लाख ‘कच्चे कर्मचारियों’ के असली गुनहगार तो वो नौकरशाह हैं, जो अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए अनाप-शनाप नीतियां ड्राफ्ट करते हैं। हरियाणा में सवा लाख कच्चे कर्मचारियों के पक्के होने और फिर कच्चे होने पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले की खबर तो आज हर अखबार की सुर्खियों में हैं और हर हरियाणवी की जुबान पर है, लेकिन माननीय उच्च न्यायालय के कुछ आॅब्जर्वेशंस इतने बेहतरीन हैं कि हरियाणा सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए नजीर बन सकते हैं। 

हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस अनिल खेत्रपाल की बेंच ने नेताओं के साथ-साथ अधिकारियों की नीयत पर न केवल सवाल उठाया है, बल्कि हरियाणा सरकार के अधिकारियों को चेतावनी भी दी है कि वे सिर्फ अपने पॉलीटिकल बॉस को खुश करने के लिए गैरकानूनी कामों को अंजाम न दें। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि उन कर्मियों की कोई गलती नहीं है, जिनके साथ कच्चा-पक्का का राजनीतिक खेल खेला गया है। ये तो उनके साथ इसलिए हो रहा है क्योंकि नेताओं ने वोट हासिल करने के लिए असंभव वायदे किए थे। तत्कालीन हुड्डा सरकार ने राजनीतिक लाभ पाने के लिए अप्रैल 2006 में ही निर्धारित किए गए माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी धता बता दिया था। 

हाईकोर्ट ने अपने इस आदेश में नौकरशाही को भी जमकर कोसा है। कोर्ट ने कहा कि सीनियर अफसरों को चाहिए कि वो हमेशा नेताओं को कानून के अनुरूप ही राय दें, न कि राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए कानून को ही नजरंदाज कर दें। नौकरशाहों के कुछ ऐसे फैसलों से ही कोर्ट में लिटिगेशन (याचिकाओं) की तादाद बढ़ जाती है और संबंधित लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। 

10 अप्रैल 2006, उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय : 

10 अप्रैल 2006 को ही माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उमा देवी मामले में ये साफ फैसला दे दिया था कि अब रेग्युलराइजेशन को किसी भी राज्य में सिर्फ एक बार ही लागू किया जा सकता है। इसका मतलब ये कि 2006 के इस फैसले के बाद कोई भी राज्य सरकार सिर्फ एक बार ही कच्चे कर्मचारियों को रेग्युलराइज (नियमित) कर सकती है, उसके बाद कच्चे कर्मियों को पक्का करने का ये खाता ही बंद करना है। लेकिन तत्कालीन हरियाणा की भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार ने इस फैसले की जानबूझ कर अनदेखी करते हुए बार-बार सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐसे नोटिफिकेशन जारी किए, जिसमें ये लिखा गया था कि ये सिर्फ एक बार के लिए ही है और दोबारा कोई कच्चा कर्मचारी नहीं रखा जाएगा। 

2014 आते-आते देश और हरियाणा का राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था। 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में काबिज हो चुके थे और पूरे देश से कांग्रेस के पांव उखड़ने शुरू हो गए थे। लोकसभा चुनाव के बाद मोदी की सुनामी का सामना हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को ही सबसे पहले करना था। इसलिए आचार-संहिता लगने से महज दो महीने पहले जून 2014 में भूपेंद्र हुड्डा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले और दिशा-निर्देशों को नजरंदाज करते हुए रेग्युलराइजेशन पालिसी बना डाली। हुड्डा के चाटुकार अफसरों ने इस पॉलिसी को ड्राफ्ट करने और सिरे चढ़ाने में कानून की कतई परवाह नहीं की। हुड्डा को ये एहसास तो हो गया था कि उनके हाथों से प्रदेश की सत्ता छिनने वाली है, लेकिन जाते-जाते वोट बैंक की राजनीति करते हुए उन्होंने कच्चे कर्मचारियों से किया गया असंभव सा वादा पूरा कर दिया। उन्हें बखूबी पता था कि एक बार बहकावे में ये कर्मचारी कांग्रेस पार्टी के पंजे पर मुहर तो लगा ही देंगे, लेकिन उसके बाद जो भी सरकार आएगी, या तो वो इसका खामियाजा भुगतेगी या फिर प्रदेश के ये हजारों कर्मचारी माननीय कोर्ट का फैसला आने के बाद धक्के खाएंगे। विपक्ष में आने के बाद हुड्डा ने ये जुमला पहले से सोच रखा था कि जब ये मामला कोर्ट में निरस्त हो जाएगा तो ठीकरा उस समय की सरकार पर फोड़ दिया जाएगा कि सरकार ने कोर्ट में सही तरीके से मामले की पैरवी नहीं कराई।

अब सवाल इससे कहीं बड़ा है, जो हाईकोर्ट के जजों ने उठा दिया है। सवाल ये है कि इस प्रदेश के जो कुछ नौकरशाह हैं, उनकी प्रतिबद्घता भारतीय संविधान और गणराज्य के प्रति है या फिर अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति। ऐसे अफसरों को चिन्हित करते हुए यदि माकूल कार्रवाई हो जाए तो भविष्य में कोई भी नौकरशाह इस तरह की गलत नीति का खाका ड्राफ्ट करने से पहले हजार बार सोचेगा। इसलिए इस नीति को बनाने में शामिल रहे नौकरशाहों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। जिन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को जान-बूझकर नजरंदाज किया और हुड्डा के राजनीतिक स्वार्थ में अपने कैरियर की आहुति डालने से भी गुरेज नहीं किया।  


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