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नया हरियाणा

बुधवार, 23 मई 2018

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नेता इतने भी बुरे नहीं, बस हमें आदत हो गई है कोसने और रोते रहने की

जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

The leader is not so bad, we have become habituated to crushing and crying, naya haryana, नया हरियाणा

31 अक्टूबर 2017

धर्मेंद्र कंवारी

सोशल मीडिया बंदर के हाथ में उस्तरा भी है और समझो तो एक बहुत बडा मंच भी है। दोनों ही तरह के लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं लेकिन नेताओं को कोसने और लगातार रोते रहने की अब लोगों को आदत सी हो गई है। यही कारण है कि अगर कुछ अच्छा होता भी है तो या तो हमें वह दिखाई नहीं देता या हमें उसमें भी राजनीति दिखाई देने लगती है। खैर, यह वाक्या कहां से शुरू हुआ है वह बताता हूं। मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी। पोस्ट का विषय था नेताओं की नेकदिली की तीन घटनाएं जिन्होंने एक मानवता के नाते मेरा ध्यान खींचा। पांच छह महीने पर हिसार के विधायक डॉ. कमल गुप्ता रोहतक आए हुए थे। अचानक उनके एक सुरक्षाकर्मी को हार्ट अटैक आया। विधायक चाहते तो किसी को उनके साथ भेज सकते थे लेकिन वो खुद डॉक्टर थे इसलिए खुद ही साथ अस्पताल गए। जब तक स्टंट डाला गया तब तक वे अस्पताल में मौजूद रहे। मैं तब यह देखने के लिए वहां डटा रहा कि क्या नेताजी की यह काम सहानुभूतिपूर्वक है या मीडिया में बातें बनाने के लिए है। जब वो बाहर निकले तो मैं उनसे मिला और पूरा घटनाक्रम पूछा। हाथ जोडकर उन्होंने कहा कि कृप्या ये अखबार में मत छापना, ये तो सबका फर्ज बनता है मेरा भी था। खैर मैंने घटना को समाचार पत्र में जगह देना अपना धर्म समझा। पिछले ही दिनों प्रदेश के वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु से रोहतक दौरे में एक नेत्रहीन लडकी मिली। लडकी अपनी व्यथा बताते हुए रोए जा  रही थी और वित्तमंत्री उसे बेटी-बेटी कहकर ढांढस बंधा रहे थे। युवती ने वित्तमंत्री को बताया कि एक बडे ऑपरेशन के बाद उसके आंखों की रोशनी आ सकती है लेकिन परिवार यह खर्च उठाने में समक्ष नहीं है। मैंने इसको फॉलो किया, आपको यह जानकार खुशी होगी वह लडकी कुछ महीनों बाद अपनी आंखों से देख भी सकेगी, क्योंकि कैप्टन साहब ने ऐसा करना अपना फर्ज समझा है। अब सोमवार की एक घटना ने फिर मेरा दिल जीता। कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड के काफिले से एक बच्चा घायल हो गया लेकिन कृषि मंत्री खुद उसे अपनी गोद में बैठाकर पीजीआई ले गए और अस्पताल में परिजनों के आने तक और डॉक्टरों के यह कहने तक की अब बच्चा सेफ है तब तक बैठे रहे। अब इस पर क्या कहें। तारीफ करें या रोएं कि यह उन्होंने ये किया ही क्यों? या इसे राजनीतिक स्टंट कहकर खारिज कर दें। तीनों ही घटनाओं को मीडिया में कवरेज मिली है लेकिन इसके लिए कोई प्रयास नहीं किए गए नेताओं द्वारा। मौक पर मौजूद लोगों ने खुद इसे मीडिया तक पहुंचाया। ये मानवता की एक चेन है। एक अच्छा काम दूसरे को अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है। मैंने जब इन तीनों घटनाओं को फेसबुक पर शेयर किया तो कुछ भाइयों को लगा कि मैं बीजेपी नेताओं की तारीफ कर रहा है। तब मैंने उनसे यह पूछा भी कि दूसरी पार्टी के किसी नेता के ऐसे काम मुझे बताओ भाई, मैं उनको शेयर करता हूं तो जवाब ही नहीं था। हालांकि मैं यह नहीं कहता कि दूसरी पार्टियों में नेकदिल नेता नहीं हैं, होंगे जरूर पर मेरे सामने नहीं आए हैं। आएंगे तो जरूर लिखूंगा उनपर भी। पॉजीटिव थॉटस और पॉजिटीव इंसान बनने, इस तरह की घटनाओं से सबक सीखने के लिए खुद को तैयार करना पडता है और सोशल मीडिया इन बातों के लिए बेहद असरदार मंच हैं, बशर्ते वहां ज्यादा संख्या में बंदर उस्तरा लिए ना बैठे हों। लगातार रोते रहने और कोसते रहने का नुकसान हम खुद ही उठा रहे हैं, असल में नेता इतने बुरे भी नहीं हैं। इस मानसिकता को छोडकर आइए मानवता के कार्यों में अपना योगदान दें।

 कबीर दास जी का दोहा इस प्रसंग में मुझे प्रासंगिक लगता है-  
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब
मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

 




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