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नया हरियाणा

गुरूवार, 13 दिसंबर 2018

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कदे यू ल्यादे, कदे यू ल्यादे, के तू जिंदल कै ब्याह राखी सै

आजादी के बाद से लेकर आज तक किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर हड़ताल करता रहता है. जबकि सरकारें बदलती रहती है, पर किसान के हालात नहीं बदलते.

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30 मई 2018

नया हरियाणा

यह हरियाणवी पॉपलुर गाना ‘कै जिदल के बिहा राखी सै’ पवन पनिहार व सुशीला नागर ने गाया है और इसके लेखक नीनू सिंधड़ है । इस गाने में निम्न मध्यम वर्गीय किसान के बारे में दिखाया गया है. जो अपनी पत्नी की डिमांड को पूरा नहीं कर पाता है. जिसे लेकर पति-पत्नी के बीच में झगड़े होते रहते हैं । साथ ही दिखाया है कि एक किसान दिन-रात मेहनत करने के बाद भी  दो जूण की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पा रहा है। मतलब उसे उसकी मेहनत के अनुसार उसकी फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता है. आजादी के बाद से लेकर आज तक किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर हड़ताल करता रहता है. जबकि सरकारें बदलती रहती है, पर किसान के हालात नहीं बदलते. किसान केवल राजनीतिक रोटियां सेंकने का एक टूल्स बनकर रह गया है. वादे हर सरकार करती है, पर पूरे कोई नहीं करती है. वह अपनी पत्नी को समझाना कि हमारे घर के हालात ठीक नहीं है । वह कहता है तुम कोई जिंदल के नहीं बिहा रखी है, जो तुम्हारे सभी शोक पूरे कर देगा । यहाँ पर जिंदल कोई व्यक्ति विशेष का नाम ना होकर एक खानदानी अमीर या अथा संपत्ति के मालिक या बड़े उद्योगपति का प्रतीक है।
“गौरी मार दिया तेरे नखरा नै 
और किमे खेत के सफरा नै ।”
इस गाने में पति पत्नी को कहता है कि गौरी जो तुम रोज-रोज नखरे करती रहती है कि कभी यह चीज ला दो, कभी वह चीज ला दो । इससे में बहुत परेशान हो चुका हूँ । साथ ही खेत में रोज-रोज के सफरे से मैं तंग आ चुका हूँ । यहाँ पर देखा जा सकता है कि किसानों के सामने कीटनाशक दवाइयों के बार-बार सफरे का संकट पैदा हो गया है। कीटनाशक दवाइयों के बिना कोई भी फसल पैदा करना बड़ा आज मुश्किल हो गया है । जिससे किसानों की लागत बढ़ गई है । लेकिन आमदनी वही है । जिससे पति परेशान है।
“कै जी सुक्ख था बिहा नै तेरा
क्यों आया था बांध कै सैहरा”
पत्नी पति का प्रतिरोध करते हुए कहती है कि यह तो आपकों पहले सोचना चाहिए था कि शादी के बाद पत्नी के नखरे व डिमांड भी होती है, यदि उन्हें पूरा नहीं कर सकते, फिर शादी ही क्यों करवाई ? जब इन खर्चों को उठा नहीं सकते थे तो फिर शादी के लिया सैरा बांधकर क्यों हमारे घर पर आए थे ?
 “मेरे आटण पड़गी हाथा म्हं
यो नुणा गाढ के बाड़ी का ।”
पति कहता है कि खेतों में बाड़ी (कपास) का नुणा (जो पेड़ नीचे झुक जाते है उन्हें लकड़ी गाढ़ कर सहारा देना) गाढ-गाड़ कर मेरे हाथों में आटण (अधिक काम करने से हाथों में गाठ पड़ जाना) पड़ गई है । यहाँ गाना दिखाता है कि एक किसान दिन-रात खेतों मे अपना खून-पसीना बहा कर काम करता है, फिर भी वह भूखे मरने के कगार पर है ।  
“मेरे आटण पड़गी हाथा म्हं
यो नुणा गाढ के बाड़ी का
मेरे सैंडल ला दो पिया जी
रंग मेच कर साड़ी का
क्यों गरकाणी गैळा लाई
कै खोट करा था राम तेरा
कै जी सुक्ख था बिहा ने तेरा
क्यों आया बांध कै सैरा”
पति कहती है कि पिया जी मेरे सैंडल ला दो, जो इस साड़ी से मिलते हो । मतलब यह है कि पत्नी कोई फरक नहीं पड़ रहा है कि घर के परिस्थिति कैसी है ,बस उसे तो अपने शोक पूरा करना है । पति भगवान को दोष देता हुआ कहता है कि हे भगवान ! तुमने इस गरकानी के साथ मेरी जोड़ी क्यों बनाई ? मैंने ऐसा आपका को बिगाड़ा था । जो मुझे यह मिली है । पत्नी कहती है  कि यह तो तुम्हें शादी करवाने से पहले सोचना चाहिए था ।
“तेरी च-च-च रूके नहीं
 तन्नैं भड़क कसुती ठा राखी
कदै यू ला दे, कदै यू ला दे 
कै तू जिंदल कै बिहा राखी ।”
पति कहता है उसे समझाते हुए कहता है कि हर समय तुम चिलाती रहती हो, जिससे मेरे सिर में सर्द होने लगा है । कभी तुम कहती हो यह ला दो, कभी वह ला दो । हर समय डिमांड करती रहती है । कोई तुम जिंदल के साथ नहीं बिहा राखी हो । जो तुम्हारे सारे शोक पूरा कर दे । मैं तो एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान हूँ । 
“घर कै चारू पहर बैड पर 
सारा दिन तू लावे बात
म्हं जलू दोपहरे की गरमी म्हं
 भैया बरगा होरा गात”
यहां पर दिखाया गया है कि पत्नी पूरे दिन बैड पर आराम करती रहती है और के बीच में बैठकर इधर-उधर बाते करती रहती है वही दूकरी ओर पति खेत में गर्मी की दोपहरी में भी काम करता रहता है जिससे उसका शरीर गर्मी की तपने के कारण बिहार के लोगों की तरह हो गया है । यहाँ देखा जा सकता है कि जो बिहार  में गरीबी होने के कारण वहाँ के लोग दूसरे राज्यों में काम की तालाश में  जाते है । वह वहाँ पर दिन रात बड़ी कठिन मेहनत करते है जिससे से उनका रंग काला पड़ जाता है, वैसे ही उसकी भी रंग काला पड़ गया है ।    
 “जमीदारे इस माणस ने
 खा गई बणे की उधार
कित ते ला दू रै मैडम
 तेरी खात्तर नोलखा हार”
पति फिर उसे समझाता हुआ कहता है कि जमीदारा करना आज कोई आसान काम नहीं है । आज जो जमीदारा है वह केवल नाम का जमीदारा रह गया है, वरना जो आड़ती से आगामी फसल के लिए उधार लिया है उससे तो वह कर्ज भी नहीं उतरता है । जिससे जमीदार को हमेशा आड़ती की उधार खाती रहती है । फिर वह कैसे अपनी पति के लिए नोलखा हार ला सकता है क्योंकि उसे तो उधार चुकाना ही बड़ा मुश्किल हो रही है ।  
“याद आग्गी बात सारी 
वा दादी कहगी मरती
आड़नी ढण्डी राड़ कदै भी
 घर ना बसाया करती
तेरी सोच कसुती छोटी है
 तेरे सोख राम बढ़ै है”
पति कहता है कि उसे आद अपनी दादी की बात याद आ रही है जो उन्होंने इस संसार से जाते वक्त कही थी जो भी लड़की अपना घर देख कर नहीं चलती, वह कभी भी घर ठीक तरह से नहीं बसा सकती है । पति कहता है की तुम्हारी जो सोच है वह बहुत छोटी है । तुम केवल अपने और अपने शोक के बारे में ही सोचती हो और तुम्हारे जो शोक है वह आसमान से भी बड़े है । जिससे पूरा करना बड़ा मुश्किल है । इसी को लेकर हरियाणा में दो कहावत भी है कि ‘पड़ोसी नै देख कै कमा लै,और घर नै देख कै खा लै’, ‘जितनी गुदड़ी हो, उतने ही पैर पसारने चाहिए’। जो हमें सीख देते है कि आदमी को अपने घर की परिस्थिति देखकर ही चलना चाहिए ।
“म्हं भरता-भरता हार लिया
 तन्नै खोद दियै मेरे खड़ै है
ऊ ऐ होरा जगत कै 
कुछ नां बिहा का सौदा
खोल बतावै बिन्द्र
 आये गाम जनौदा”
पति कहता है कि जो तुम्हारे शोक है मैं उन्हें पूरा-पूरा करता-करता हार चुका हूँ । तुम्हारी रोज-रोज की डिमांड से मैं तंग आ चुका हूँ । इस संसार में शादी को लेकर जो अच्छी बातें कही जाती  है । वह बस वैसे ही है यदि तुम्हें शादी के बारे में जाना है, तो कभी बिन्द्र के पास जनौदा गाँव में आना । अक्सर कहा भी जाता है कि ‘शादी वह लड्डू है जो खाए वह भी पछताए और जो ना खाए वह भी पछताए’ ।
“मेरी दो तोलै की चैन करवा
 सोने का घड़वा दे कोका
लया खोळा बांध दू गोरी 
तेरे घर म्हं हो जागया डोका
म्हं पाड़ भरोटे लाऊ नां 
तू रह किस चक्करा म्हं”
पति  फिर डिमांड करते हुए कहती है कि पिया जी मेरी दो तोले की जो सोने की चैन बनावा दो और सोने का कोका करवा दो । इस पर पति कहता है कि गौरी इन पर पैसे खराब करले से अच्छा है कि मैं घर में भैस ले आता हूँ , जिससे घर में सभी के लिए दूध भी हीने के लिए हो जाएगा । इस पर पत्नी प्रतिरोध करते हुए कहती है कि मैं खेतों से चारा नहीं लाऊँगी । कभी इस चक्कर में आप भैस लाकर बांध दो, पहले ही कह देती हूँ ।
“तू ढुढ़ मेरा बिकवावै गई रै, 
देख लिया इन रेल्या म्हं
प्रवीण पनिहार आलै खसियै नां लावै,
 नै तै जिंदगी कट तेरी जैला म्हं”
पति कहता है कि यदि तुम्हारे यही हालात रहे तो एक दिन मुझे यह घर ही बेचना पड़ सकता है । इस पर पत्नी कहती है कि प्रवीन पनिहार यदि तुम मुझ पर इस तरह के इल्जाम लाओ गए तो मैं तुम्हारी जेल भी करा सकती हूँ । जिस से तुमे अपनी जिंदगी फिर जेल में ही काटनी पड़गी ।
इस गाने में एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान के परिवार को दिखाया गया है जो दिन-रात खेत में हाड तोड़ मेहनत करने के बावजूद भी उसे केवल रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है । जिस कारण वह सूदखोर आड़तियों के चक्कर में फंस जाता है । आज खेती में लागत अधिक होने और आमदनी कम होने के कारण वह आड़ती की उधार नहीं चुका पा रहा है । उस पर दिन पे दिन उधार  बढ़ता जा रहा है जिस कारण आज किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है  । उसे कर्ज की चिंता खाए जा रही है । वही दूसरी ओर अपने परिवार की छोटी-छोटी डिमांड को पूरा नहीं सकता है । इन छोटी-छोटी डिमांड को लेकर पति-पत्नी के बीच में झगड़ा होता रहता है ।


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