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नया हरियाणा

रविवार, 19 अगस्त 2018

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पति की कमाई पर तो ओटने पड़ते हैं पत्नी को पति के नखरे

स्त्री स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है आर्थिक तौर पर स्वतंत्र होना और बराबरी के संघर्ष में पहला पायदान पार करना.

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29 मई 2018

इकबाल सिंह

यह हरियाणवी पॉपलुर गाना ‘क्यो ओटू नखरे तेरे’ रामकेश जीवनपुर और अन्नु कादयान द्वारा गाया गया है. इसके लेखक मुकेश नांदल है। इस गाने में पति-पत्नी के आपसी संवाद के माध्यम से पितृसत्ताlत्मक सोच के कारण पति-पत्नी दोनों के रिश्ते में मन-मुटाव देखा जा सकता है. जो लड़का शादी से पूर्व एक अच्छा प्रेमी था, वह अब शादी के बाद पितृसत्ता मूल्य से लैस पति रूप में अपनी प्रेमिका पर अपना हक जताते हुए नखरे झाड़ रहा है । इस गाने में पत्नी, पति का प्रतिरोध करती हुए कहती है-
 “इतना मन्नैं क्यू रहा है सता 
ओटूं तेरे नखरे बात तो बता ।”
जो तुम मुझे किस लिए परेशान कर रहे हो, इसका कारण तो बताओ । किसी बात के लिए  मुझ पर नखरे झाड़ रहे हो । पति अपने काम का रोब दिखाते हुए कहता है कि 
“एक तो तू खावै मेरी कमाई गौरी रै
दूजा म्हं तेरे बाप का जमाई गौरी रै ।”

यहां एक बात साफ है कि जब तक स्त्री खुद को आर्थिक रूप से मजबूत नहीं करती, तब तक बराबरी संभव नहीं है. उसका पति पर परजीवी की तरह जीवन यापन करना और अपने सपनों के पति के पैसों से पूरा करने के कारण ही उसे पति के ताने सहन करने पड़ते हैं. आर्थिक स्वतंत्रता या बराबरी किसी भी संबंध में बराबरी की नींव मानी जाती है. उसके कहने का मतलब है कि  एक तो तुम मेरी कमाई खाती है और दूसरा मैं तुम्हारे घर का जमाई जो ठहरा इसलिए तुम्हें मेरे नखरे उठाने पड़े गए । अक्सर हरियाणवी समाज या किसी भी समाज में देखा जाता है कि लड़की वालों को लड़के वालों की हर उलटी-सीधी बातों मानी पड़ती है। जबकि हरियाणवी समाज कबीलाई समाजों की तरह ज्यादा बंधन स्वीकार नहीं करता है. भले ही सभ्यता और संस्कार के नाम पर लड़कियों को शोषित होना सीखा दिया जाता हो, परंतु समाज का ताना-बाना उतना जकड़न भरा नहीं है. जितना इसे बना या परोस दिया जाता है. एक कहावत भी है कि ‘लड़की वाले का सिर हमेशा नीचा होता है ।’ वही पितृसत्तात्मक मानसिकता यहाँ भी दिखाई देती है ।
पत्नी प्रतिवाद करती हुई कहती है-
“सारा-सारा दिन म्हं तो काम करू सू
  एक पल भी नां आराम करू सू
 इसी बता कौण-सी होई सै खता
 सारी आणा ओटूं नखरे तेरे
बेहूदे स्वाल जिकरे तेरे
फेर भी करता घणी समाई गौरी रै
दूजा म्हं तेरे बाप का जमाई गौरी रै...” 
पत्नी कहती है कि सुबह से लेकर शाम तक काम करती हूँ । मुझे एक पल के लिए भी आराम करने का समय नहीं मिलता है । वह पति से पूछ रही है कि ऐसी क्या बात होगी जो तुम मुझे इतने खफा-खफा रहते हो । हर समय मुझ पर नखरे झाड़ते रहते हो । मेरे से आपके हर समय नखरे क्यों उठाएँ नहीं जाते हैं । जो तुम बिना सोचे-समझे ही स्वाल करते हो, और बिना बात के जो दूसरे से कहते फिरते हो । उनसे मैं बहुत परेशान हो चुकी हूँ । पति पत्नी को समझाता हुआ कहता है कि मैं बहुत बरदास कर लिया है अब मुझे बरदास नहीं होता है ।  मैं तुम्हारा पति हूँ , इसलिए तुम्हें मेरे निखरे उठाने पड़गे।
बाप के घर म्हं खुश थी घणी
हाय! मेरे राम मेरी गैळ के सै बणी
पीहर चाळी जाऊ तन्नैं लाग जा पता
ओटूं तेरे नखरे बात तो बता..”
पत्नी कहती है वह अपनी पिता के घर में बहुत खुश थी । वह पर किसी बात की कोई परेशानी नहीं थी । हे भगवान ! तुमने मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया । मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था जो इतना सब सहन करना पड़ रहा हैं । वह कहती है कि अपने पिता के घर चली जाऊं तो तुम्हें पता चल जाएगा । जब सब कुछ अपने आप करना पड़ेगा । किसी बात के लिए ओटू तुम्हारे नखरे वह बात तो बातओ ।
यह गाना दिखाता है कि परिवार में स्त्री से मजदूरों की तरह काम लिया जाता है । वह सुबह सबसे पहले उठती है और पूरा दिन घर का, खेतों का, एवं पशुओं का काम करके रात को सबसे देर से सोती है । उसे कुछ पल आराम करने का भी समय नहीं मिलता है । फिर भी उसके श्रम का मूल्यांकन नहीं किया जाता है । उसके काम को कोई नहीं मानता है । पुरुष स्त्री को अपनी संपत्ति मानता है उसके साथ मन-माना व्यवहार करता है। वह उसे अपनी भोग्या समझता है और उसे दासी जैसा व्यवहार करता है । आज पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को ‘औरत जात’ के तमगे से बाहर आने देने के लिए कतई तैयार नहीं है । उसके मानस-पटल पर क्षीरसागर में विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी की छवि चिपकी है । और पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी उसके लिए पैर दबाने वाली लक्ष्मी से अलग नहीं हैं । स्त्री के अपमान के या समाज में कम होते जा रहे सम्मान के पिछे समाज की यही सीमित और स्त्री विरोधी वातावरण है । वे स्त्री की पूजा करेंगे, लेकिन उसे मुक्ति न देंगे । परंतु जैसे-जैसे स्त्री शिक्षा का ग्राफ बढ़ रहा है वैसे-वैसे आज स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती जा रही है अब वह अपने प्रति होने वाले अन्याय को प्रति विरोध कर रही है ।
प्यार की परिभाषा देते समय अक्सर कहा जाता है कि प्यार हमको बंधनों से मुक्त करता है। प्यार दोनों को बराबर का अधिकार देता है । लेकिन भारतीय समाज में प्यार की यह अवधारणा कुछ शर्तों के साथ लागू होती है। इसका कारण हमारे समाज का पितृसत्तात्मक होना है। लड़का जहां एक ओर प्रेमी होता है, वहीं दूसरी ओर वह एक पुरुष भी, जो समझता है कि स्त्री भोग्या है, उसकी दासी होती है या उससे कमजोर होती है । पुरुष का ऐसा रूप प्राय: प्रेम विवाह के बाद दिखाई देता है । प्रेमी लड़का प्रेम विवाह के बाद पति बन जाता है । वह आम भारतीय पति की तरह बर्ताव करने लगता है। यहीं आकर प्यार समाप्त हो जाता है । प्रेमी के रूप में आदर्श पुरुष के गुणों से युक्त दिखने वाला विवाह के बाद मानवीय कमजोरियों के साथ और पितृसत्तात्मक संस्कारों से युक्त दिखने लगता है । पति और पत्नी की कमजोरियाँ समाने आने लगती हैं ।


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