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सोमवार , 20 अगस्त 2018

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रवीश बाबू, तुम्हारे मुहं घमंड का खून लग गया है!

शहादत का नशा कोकिन से भी खतरनाक है। इसका लती अगर दो दिन इस चर्चा से दूर रहे, तो उसके हाथ-पांव फूलने लगता है। उसके मुंह से झाग निकलने लगती है।

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26 मई 2018

नीरज बधवार

रवीश बाबू ने कुछ दिन पहले पोस्ट लिखी थी कि मेरे कार्यक्रम के दौरान टाटा स्काई पर एनडीटीवी के सिग्नल वीक आने लगते हैं। इस तरह की पोस्ट शेयर कर वो फिर साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि कैसे उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन नीचे दी गई तस्वीर बताती है कि जब भी चैनल की तरफ से ऑपरेटर को पेमेंट में देरी होती है तब चैनल के प्रसारण में इस तरह की दिक्कत आने लगती है।

मगर रवीश बाबू ने इसमें साजिश ढूंढ ली और एक बार फिर खुद को शहीद बताने में लग गए। और यही उनके साथ दिक्कत हो गई है। शहादत का नशा कोकिन से भी खतरनाक है। इसका लत अगर दो दिन इस चर्चा से दूर रहे, तो उसके हाथ-पांव फूलने लगता है। उसके मुंह से झाग निकलने लगती है।

इसलिए हर वक्त वो यही साबित करने में तुले रहते हैं कि कैसे सारी दुनिया मेरे पीछे पड़ी है। हर दूसरी लाइन में ये बोलना कि बाकी मीडिया तो आपको बताएगा नहीं, मैं बताऊंगा। अच्छी बात है। आप बताइए मगर आप बताकर कुछ अनूठा नहीं करेंगे। कोई भी काम जैसे किया जाना चाहिए,वैसे करना, दुनिया पर अहसान कैसे हो गया!

क्या कोहली हर बार अच्छी पारी खेलने के बाद अपनी स्पीच में बाकी बल्लेबाज़ों को नसीहत देते हैं! क्या वो उन्हें इस बात के लिए कोसते हैं कि देखो, तुम्हें खेलना नहीं आता। मैं बताता हूं। क्या ए आर रहमान ओरजिनल न होने के लिए हर दिन प्रीतम को कोसते हैं। नहीं वो अपना काम करते हैं। कौन महान है और कौन चोर है ये दुनिया तय करती है, न कि काम करने वाला। और अगर वो खुद ही ये कर रहा है, तो उससे बड़ा ओछा कोई नहीं। लेकिन रवीश बाबू ऐसे ही ओछे हैं। वो दिन-रात यही काम करते हैं, क्योंकि जब आपका मकसद पत्रकारिता करना या सही ख़बर दिखाना कब और उसके माध्यम से खुद को महान साबित करना ज़्यादा हो, तो आप ऐसे ही दुनिया को कोसते हैं। आप बताते है कि देखो दुनिया कितनी गिरी हुई है और इस गिरी हुई दुनिया में मै कितना पवित्र और महान। मगर खुद को महान साबित करने की उनकी ये भूख लगातार बढ़ती जा रही है और भूख बढ़ने के साथ-साथ वो शहादत के भूखे भेड़िए हो गए हैं। खुद को शहीद बनाए रखने के लिए उन्हें हर दिन victim कार्ड खेलना पड़ता है।

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अब वो बताने लगे हैं कि लोग मुझे मौत की धमकी दे रहे हैं। मोदी राज में पत्रकारों की आवाज़ दबाई जा रही है। अच्छा भाई, आपको कबसे पत्रकारों की स्वतंत्रता की चिंता होने लगी। बंगाल में पंचायत चुनावों में इतने पत्रकारों को धमकियां मिलीं,क्या आपने उसका संज्ञान लिया? क्या सवाल किया कि कैसे ममता राज में लोकतंत्र और पत्रकारिता खतरे में है? आप ही की तरह रोहित सरदाना को कॉल करके, वीडियो बनाकर लोगों ने जान से मारने की धमकियां दीं, क्या तब आपने पत्रकारों की सुरक्षा कौ रोना रोया? उस पर कोई कार्यक्रम किया? अगर पत्रकारों की सुरक्षा की इतनी ही चिंता है, तो वो चिंता सिर्फ तब क्यों सताती है जब खतरा पर खुद पर आता है? अगर आपको धमकी मिलने से ये साबित होता है कि मोदी राज में उनके खिलाफ बोलने वाले सुरक्षित नहीं, तो सरदाना को धमकी मिलने से ये भी साबित होता है कि मोदी राज में उनसे हमदर्दी रखने वाले भी सुरक्षित नहीं। लेकिन नहीं ऐसा नहीं है।

हकीकत ये है कि जब भी आप खुलकर किसी विचार या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होते हैं तब-तब एक वर्ग आपको हाथों हाथ लेता है और दूसरा आपको गालियां देता है। असहमति रखने वाला हर आदमी कैसे रिएक्ट करेगा इसे तय नहीं किया जा सकता। कोई शालीन भाषा में असहमति जता सकता है, तो कोई सिरफिरा धमकी भी दे सकता है। इस तरह की आलोचना एक विचार के साथ खड़े होने की कीमत है जो हर किसी को चुकानी पड़ती है। जैसे आप चुका रहे हैं वैसे ही हर कोई चुकाता है। इसलिए बारी-बारी मैं सच्चा, दुनिया झूठी। मैं बहादुर, दुनिया ज़ालिम का रोना रोकर शहीद बनने को कोशिश मत कीजिए।

जैसे आप शिकायत करते हैं कि मुझे गालियां पड़ती है उसी तरह रोहित बाबू को भी पड़ती है। अगर हर गाली देने वाला मोदी के इशारे पर काम कर रहा है तब तो मोदी समर्थक किसी पत्रकार को गाली नहीं पड़नी चाहिए थी। उसे कोई धमकी नहीं मिलनी चाहिए थी। जबकि हकीकत ये है कि उन्हें आपसे ज़्यादा ही गालियां पड़ती है। मुख्यमंत्री रहते मोदी की तो जान लेने की कोशिश की गई। कई आतंकी साज़िशों का खुलासा हुआ। आप तो किसी सिरफिरे की धमकी से परेशान हो गए। वहां तो पेशेवर आतंकी संगठन उन्हें सच में मारने की कोशिश कर रहे थे। अगर जान पर खतरा होना ही खुद के सही साबित होने का प्रमाण है, तब तो आपको कई वक्त पहले ही मोदी को सच्चा मान लेना चाहिए था।

मेरी सलाह है कि बेवजह का प्रोपेगेंडा बंद कीजिए। अपने काम पर ध्यान दीजिए। और काम करते वक्त भी काम कीजिए। हर वक्त ये मत गिनाइए कि बाकी ऐसे नहीं करते, मैं कर रहा हूं। बार-बार दुनिया अनैतिक, मैं पवित्र की रट मत लगाइए। क्योंकि जब आप बारी-बारी ये कहते हैं कि मैं कर रहा हूं, बाकी नहीं करते। तो उससे यही साबित होता है कि आप कर ही इसलिए रहे हैं ताकि दुनिया पर अहसान जता सकें। खुद को महान बता सकें। सच्चा इंसान सच्चाई पर इसलिए नहीं चलता कि ऐसा करके वो दुनिया को मक्कार बता सके। वो इसलिए चलता, क्योंकि उसके लिए चलने का यही एक मात्र रास्ता होता है। न्यूटन फिल्म में संजय मिश्रा राजकुमार राव से कहते हैं, जानते हो न्यूटन तुम्हारी दिक्कत क्या है...तुम्हारी ईमानदारी का घमंड। और घमंड हर हाल में घमंड होता है। जैसे केजरीवाल को अपनी ईमानदारी का है, आपको अपनी सच्ची पत्रकारिता का और मोदी को अपनी लोकप्रियता। और घमंड ऐसा खून है जो एक बार ज़बान पे लग जाए, तो प्यास बुझाने के लिए इंसान तड़प उठता है। मगर यहां वो किसी और का कत्ल नहीं करता, बल्कि खुद शहीद होता है। और हर दिन खुद को शहीद बताकर आप ऐसे ही अपने घमंड की प्यास बुझा रहे हैं।


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