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नया हरियाणा

रविवार, 19 अगस्त 2018

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70 परसेंट आशिकी : बताओ आशिकी कब से परशेंट में होने लगी सै!

पूूरे गाने के जो बोल हैं और जो वीडियो बनाया गया है. दोनों का आपस में कोई मेल नहीं है.

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25 मई 2018

नया हरियाणा

हरियाणवी एलबम- ‘सत्तर प्रतिशत आशकी’ को विजय शर्मा ने गाया है और इसके लेखक है- रामेहर मेहला.
पता नहीं 70 प्रतिशत आशिकी के पीछे क्या तर्क रहा है. प्रेम पता नहीं प्रतिशत में कब से बंटने लगा है. हमने तो मैथ के सवाल के अलावा कभी जिंदगी में प्रतिशत का फेर नहीं लगाया.

हरियाणवी परिवेश में अब तो फिर भी बड़े-बड़े घर और कई मंजिले घर बनने लगे. एक समय ऐसा भी था जब एक मंजला मकान होता था और लड़के के ब्याह के समय चौबारा बनाया जाता था. चौबारा बनते देख सब समझ जाते थे कि छोरे का ब्याह आ लिया है. खैर. इस गाने में चौबारा केंद्र में क्योंकि लड़का जिससे प्यार करता है, वो चौबारे पर बुला रहा है. जाहिर है लड़की नीचे है और लड़का लड़की को देखने के लिए गली के चक्कर काट रहा है.
अरे मेरी जान चौबारे म्हं
गळी म बेजान खड़ा रहगा हाये रै!
अरे रै मेरी जान चौबारे म्हं
एकळी खड़ी हास्यै हाये रै,
मेरी जान चौबारे म्हं.
अकेली खड़ी हुई हंस रही है और उसका हंसना आशिक से सहन नहीं हो रहा है, क्योंकि वो उसे देखने के लिए तड़प रहा है. और उससे हंसकर बात करने की भी बात कर रहा है और कह रहा है कि कोई जाकर उसको बता दे. 
बैरण खड़ी हास्यै,मेरी जान चौबारे म्हं
उसकी गळी के गेड़े लगाऊ,
उस ते हँस बतळाणा चाहू,
कोऐ जाकै नै सुन्ना दो रै,
मेरा अरमान चौबारे म्हं
नागिन जैसा जहर शरीर में और मेरी जिंदगी अब उसके ही हाथ में है. आशिकी के मौन होने की बात करता है और यह भी कहता है कि उसके जितनी सुंदर कोई नहीं है. और उसका शरीर ऐसा लगता है जैसे पेड़ फल लगने पर झुक जाता है, उसी तरह यौवन पाकर उसका शरीर निखर आया है. उसके यौवन को देखकर आशिक अपने होशोहवाश खोने लगा है. वो जब-जब चौबारे पर उसे खड़े देखता है तो सब कुछ भूल जाता है.
गळी म बेजान खड़ा रहगा हाये रै- - - - -
नागण बरगा जहर गात म्हं,
मेरी जिन्दगी उस कै हाथ म्हं
मौन-सा होग्या, यार मेरा फरमाण चौबारे म्हं
गळी म्हं बेजान खड़ा रहगा, 
हाये रै मेरी जान चौबारे म्हं
देख्यी नां कोऐ हितणी सुथरी,
जोबण की डाली-सी झुक रही
भाई रै म्हं तो होश भूल गया रै,
जब गया ध्यान चौबारे म्हं
गळी म्हं बेजान खड़ा रहगा,
हाये रै मेरी जान चौबारे म्हं.
अब आशिक अपने जीवन की फरियाद लगाते हुए कहता है कि उसे उसकी आशिकी से मिलवा दो, तभी मेरी जान बच सकती है. ये मेरा मिलने का मौक पता नहीं कब लगेगा, कब हमारी ताल मिलेगी. ताल से ताल मिलना, मतलब दोनों तरफ से प्यार होना.
कोऐ मरते की जान बचालो, 
रामेहर मेहला नै उस तै मिला दो
बैरानां कदै-सी लागै गई, 
मेरी ताल चौबारे म्हं
गळी म्हं बेजान खड़ा रहगा,
हाये रै मेरी जान चौबारे म्हं ।
यह गाना एक ऐसे आशिक के दर्द को बयान करता है जो अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए तड़प रहा है. अगर बात केवल प्रेमी और प्रेमिका की हो तो यह गीत प्रिय लगता है. अब बात करते हैं आखिर क्या कारण है, जिनकी वजह से वो मिल नहीं पा रहे हैं. पहला कारण तो यह है कि भारत में खासकर गांव व कस्बों में अभी लड़के और लड़कियों को प्रेम करने और दोस्ती करने की छूट नहीं मिली है. अब इसे पिछड़ा कह लीजिए या ये भी कह सकते हैं कि अभी शहरी कल्चर को आत्मसात नहीं कर पाए हैं. इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह बनता है कि क्या जो लड़का अपने आपको आशिक के रूप में स्वतंत्रता चाहता है, उसी रूप में अपनी बहन के प्रति भी उदार है. अगर नहीं है तो यह प्रेम नहीं कुछ ओर है. क्योंकि प्रेम भेदभाव नहीं करता. प्रेम मूलतः अच्छे-बुरे से ऊपर एक उदात्त मूल्य और जीवन शैली है.
जिस गांव के परिवेश में बंधन हद से ज्यादा हैं, उसी परिवेश में ये गाना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. क्यों पसंद किया जाता है. यह आप आसानी से समझ सकते हैं कि इसमें उन्हें उस बंधन से छुटकारा मिलने का अहसास होता है और जनसंचार के दृश्य एवं श्रव्य माध्यम मनुष्य की इच्छाओं और भावनाओं को उकसाने, सहलाने, आक्रोशित करने और भड़काने आदि का काम करते हैं. इस तरह के गानों का प्रस्तुतीकरण सबसे अहम् भूमिका निभाता है. जिसे आम भाषा में गाने का वीडियो कहा जाता है.
कहने को हम कह देते हैं कि ये तो गाना ही तो है. जबकि ये उस बड़े हिस्से की भावनाओं का सहलाने का काम करता है, जो ग्रामीण परिवेश में इस तरह की स्थितियों से गुजरे हैं या गुजर रहे हैं. हालांकि ग्रामीण परिवेश में अपने ही गांव में आशिकी करना अच्छा नहीं माना जाता. लोक मान्यता और विश्वास यह होता है कि गांव के सभी लड़के और लड़कियां आपस में भाई-बहन होते हैं. जबकि इसके उलट गांव में लड़के और लड़कियों के खूब शारीरिक रिश्ते बनते रहे हैं और गांव में इसके चर्चे चलते रहते हैं. यह गांव की जीवनशैली का सहज हिस्सा बन गए हैं. परंतु जब इस तरह के शारीरिक रिश्तों से हटकर कोई लड़का और लड़की शादी करते हैं तो वह गांव, जाति और गौत्र आदि के साथ खापों के लिए चिंता का विषय बन जाता है और उन्हें अपनी संस्कृति खतरे में नजर आने लगती है.
ऐसे में मीडिया के लिए यह हरियाणा, जाति, पुरुषों और खाप आदि के प्रति बनाई गई अपनी छवि के अनुरूप ‘रॉ-मेटेरियल’ मिल जाता है. टीवी की बहसों के चक्रव्यूह में फंसकर यह बौद्धिक जुगाली बनकर रह जाता है और ग्रामीण स्तर पर जो स्त्री की समस्याएं हैं, वो पहले की तुलना में बढ़ जाती है. जबकि उन्हें घटाने की जरूरत है. क्रिया की प्रतिक्रिया की कीमत भी स्त्री को उठानी पड़ती है. कोई भी समाज विकास प्रक्रिया में जंप लगाकर नहीं पहुंचता, अगर पहुंचता भी है तो वह उसका सहज विकास नहीं माना जाता. ऐसे में विकसित हो चुके दूसरे समाज के लोगों को कम विकसित समाज के प्रति सहृदयता के साथ बर्ताव करना चाहिए, न कि उनकी अवहेलना करनी चाहिए.
कुल मिलाकर प्रेम के स्तर पर अगर हम इसे परखते हैं तो इसमें कुछ भी अनैतिक या गलत नहीं है. परंतु सामाजिक स्तर पर ग्रामीण परिवेश में परखने पर इसकी खामियां उजागर होने लगती हैं और स्त्री-पुरुष के बीच असमानता और भेदभाव के पक्ष भी उजागर होने लगते हैं.
 


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