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नया हरियाणा

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

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हरियाणा में भाजपा कर सकती है क्लीन स्वीप!

हरियाणा में चुनाव अभी दो साल दूर हैं लेकिन राज्य में सभी राजनीतिक दलों के नेता चुनावी मॉड़ में नजर आ रहे हैं. भाजपा, इनैलो और कॉंग्रेस तीनों ही दलों के नेता अलग अलग समीकरणों के दम पर अपनी जीत को आसान मानकर चल रहे हैं. राज्य के जमीनी हालात क्या हैं, जानिए


BJP can clean sweep in Haryana!, naya haryana

30 अक्टूबर 2017

नया हरियाणा


हरियाणा की राजनीति में जो सुगबुगाहट शुरू हुई है उसका विश्लेषण करने के बाद यह कहा जा सकता है कि हरियाणा में भविष्य में होने वाले चुनावों में भाजपा कांग्रेस और इनेलो के विरूद्ध क्लीन स्वीप कर सकती है. ऐसा कहने के पीछे कुछ आधार हैं. यह कोई भविष्यवाणी या दावा नहीं है. राजनीति पल-पल करवट बदलती है. चुनाव के समय में बनने वाले गुणा गणित इसे बदल भी सकते हैं. इसलिए इसे अंतिम न माना जाए.

फिलहाल जो समीकरण बन रहे हैं उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भाजपा इस समय शीर्ष पर है क्योंकि कांग्रेस की फूट जगजाहिर है और इनेलो में आम हरियाणवी का विश्वास बन नहीं पा रहा है. दूसरी तरफ इन दोनों दलों की जो मजबूती है, वही इनकी कमजोरी भी बनती जा रहा है. हुड्डा वाली कांग्रेस और इनेलो दोनों की नज़र जाट वोटरों पर टिकी है, जबकि भाजपा ने इनकी आक्रामकता का फायदा उठाकर कांग्रेस के पारंपरिक वोटर और विकल्पहीनता में कभी कांग्रेस तो कभी इनेलो को वोट देने वाले वोटरों को अब भाजपा के रूप में एक नया विकल्प मिल गया है. अगर हुड्डा को हरियाणा कॉंग्रेस की कमान मिलती है और वो कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को वापिस ले आते हैं तो वो भाजपा को टक्कर दे सकते हैं. जबकि दूसरी तरफ दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में इनेलो लड़ती है तो पार्टी को नया उत्साह और युवा चेहरा मिलने के कारण काफी बढ़त मिलेगी और इनेलो की बढ़त सीधे-सीधे हुड्डा को कमजोर करेगी. कांग्रेस से अगर हुड्डा चेहरा नहीं होंगे तो दुष्यंत को काफी बढ़त मिल सकती है. हालांकि इनैलो में अभय चौटाला के रहते दुष्यंत को कमान मिल सकेगी इसकी संभावना भी फिलहाल तो कम ही नजर आती है.

दरअसल हुड्डा, दुष्यंत और खट्टर तीनों अपने-अपने गढ़ में मजबूत हैं, परंतु मोदी लहर और केंद्र में भाजपा सरकार की वापसी हरियाणा में भाजपा को सीधे बढ़त की तरफ लेकर जाएगी. दुष्यंत और हुड्डा दोनों की बराबर की टक्कर भाजपा की मुश्किलों को आसान बना देगी. दूसरी तरफ इनेलो अभय सिंह चौटाला को चेहरा बनाती है तो इनेलो फिर तीसरे स्थान पर भी जा सकती है. हालांकि 1972 से लेकर 2014 तक इनेलो विधानसभा चुनाव में पहले और दूसरे स्थान पर रही है. यूपी चुनाव में मायावती की पार्टी का जो हाल हुआ हरियाणा में वही हालत कांग्रेस या इनेलो की हो सकती है.

कांग्रेस और इनेलो को सत्ता का सफर जितना आसान दिख रहा है. दरअसल उनका सफर उतना ही मुश्किल है. क्योंकि इन दोनों के वोटर खुलकर अपनी बात कहते हैं, जबकि भाजपा का वोटर चुपचाप अधिक दिख रहा है. इसलिए इन दोनों पार्टियों को अपनी हवा बनते हुए दिख रही है, जबकि भाजपा का वोटर इस हवा के कारण पक्का होता जा रहा है.

कांग्रेस और इनेलो दोनों पार्टियों ने जाट आरक्षण आंदोलन के समय में यह स्थापित करने की कोशिश की थी कि खट्टर सरकार जाट विरोधी है और आंदोलन के बीच-बीच में यह स्वर भी निकलने लगा था कि हमें जाट मुख्यमंत्री चाहिए. विपक्ष जिस चतुराई से भाजपा सरकार को घेर रहा था, वह उसके खिलाफ ही जा रही थी. जाट आरक्षण के नाम पर राजनीति करने वाले लोग और सांसद राजकुमार सैनी दोनों दरअसल गैर जाट वोटरों को भाजपा के लिए पक्का करने का काम रहे थे. रही-सही कसर स्थानीय स्तर पर कुछ छोटे जाट नेताओं ने पूरी कर दी. उनके आक्रामक व्यवहार ने जनता का भाजपा सरकार में विश्वास पहले से मजबूत ही किया.

कुछ लोग इनेलो और भाजपा के गठबंधन का कयास लगाते रहते हैं. जो कि अभी किसी भी तरह संभव नहीं लग रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय दलों के प्रति जनता का रूझान कम हुआ है. जिसका नुकसान जाहिर-सी बात है इनेलो को भी होगा. दूसरा सत्ता से काफी लंबे अर्से से दूर रहने के कारण पार्टी के लिए कार्यकर्ता बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है. जमीनी स्तर पर इनेलो के पास सबसे मजबूत कार्यकर्ता तो हैं लेकिन दूसरी तरफ उनके लिए आफत भी यही कार्यकर्ता खड़े करते रहे हैं जो कि पार्टी की छवि को खराब करने में अहम् भूमिका निभाते हैं. ऐसे कठिन समय में कन्फ्यूज करने वाले तीन नेतृत्व (ओमप्रकाश चौटाला, अभय सिंह चौटाला और दुष्यंत चौटाला) भी वर्करों के हौसलों को कमजोर कर रहे हैं. हालांकि सूत्रों की माने तो इनेलो दुष्यंत के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का निर्णय ले सकती है.

इन सभी समीकरणों को देखते हुए लगता है कि भाजपा में हरियाणा में क्लीन स्वीप आसानी से कर देगी. क्योंकि एक जाति के भरोसे लड़ने वाली हुड्डा वाली कांग्रेस और इनेलो दोनों ही फिलहाल जनाधार जुटा पाने में सफल होती हुई प्रतीत नहीं हो रही है.


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