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नया हरियाणा

सोमवार , 10 दिसंबर 2018

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सरपंची लेणी सै : चुनावी लोकतंत्र का झुनझुना

हरियाणवी गाना सरपंची लेने के लिए किए जाने वाले जोड़तोड़ को दर्शाता है.

सरपंची लेणी सै, , naya haryana, नया हरियाणा

24 मई 2018

नया हरियाणा

हरियाणवी  पॉपुलर गानों को आप पसंद करते हो या नापंसद करते हो. परंतु समाजशास्त्र से जुड़े शोधकर्ताओं के लिए लिखित या वाचिक संदर्भ हमेशा शोध कार्य में मदद देते रहे हैं. समाज की दशा और दिशा को समझने के लिए शोधकर्ता को अच्छे-बुरे के पैमाने से अलग हटकर इस तरह की सामग्री का अध्ययन एवं विश्लेषण करना चाहिए. तभी हम समाज की नब्ज को पकड़ एवं समझ सकते हैं. समाज की दिशा क्या होनी चाहिए, यह एक अलग विषय है और यह तभी ज्यादा सार्थक माना जाता है, जब यह पता हो कि समाज की वर्तमान दशा क्या है? 
हरियाणवी पॉपुलर गाने भी समाज को समझने का एक माध्यम है. जैसे- बोल सरपंची लेणी सै- गाने के माध्यम से सरपंच बनने की प्रक्रिया और सरपंच का चुनाव लड़ने वाले की बीवी के आपसी संवादों के माध्यम से उनके परिवार और संबंधों पर पड़ने वाले असर का विश्लेषण करते हैं. प्रवीण बरसी और रश्मि यादव दोनों ने इस गीत को खूबसूरती के साथ गाया है. प्रवीण बरसी और प्रदीप कादयान ने इसे लिखा है. 
सरपंच का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी और उसकी पत्नी(लुगाई) की आपसी बातचीत के माध्यम से गाना गाया गया है. सरपंच का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी को उसकी पत्नी कहती है---
“क्यों दुनिया न्य पयावै, या महँगी घणी हौरी.
 हाड़ै बोतल बाज रही,म्हारी ठूकरी कोली सै.”
मतलब साफ है कि सरपंची का चुनाव लड़ने के लिए शराब का पिलाया जाना आम बात है और पैसे खर्च करके जो सरपंच बणेगा, उससे आप जनहित के कार्यों की उम्मीद कैसे कर सकते हो? खासकर वह जनता जो शराब पीकर वोट देती है. हम नेताओं पर लांछन लगाने में पीछे नहीं रहते, जबकि जनता भी छोटे-छोटे लालचों में आकर अपना वोट बेच देती है. अब यह बहस का विषय हो सकता है कि नेताओं के कारण जनता भ्रष्ट हुई या दोनों ने एक-दूसरे को भ्रष्ट किया है. शराब भी वह अपने घर या बैठक में पिला रहा है, जिससे घर की औरतों का असहज होना स्वाभाविक है और दूसरी तरफ जो लोग सरपंच के यहां दारू पीकर घर जाकर लड़ाई करते हैं, उनकी बीवीयों की नजर में दोषी सरपंच ही बनता है. जबकि घर पर बैठकर शराब पीना अच्छा नहीं माना जाता. दूसरों पर दोष मढ़ने का रिवाज आम है. ग्रामीण परिवेश में यह भी आम मनोविज्ञान है.
दूसरी तरफ पति कहता है कि मुझे सरंपची लेणी सै, अबकी तो जो चाहे हो जाए. मतलब साम-दाम-दंड जो तरीका अपनाना पड़े. हर हालत में सरंपची चाहिए है.पति कहता है—
“सरपंची लेनी सै, अब कै मन्यै रै गोरी
तू कड़वी न्या बोल्यै, यारा की टोली सै.”
दारू पीते हुए दोस्तों को लेकर बीवी जब रोक-टोक करती है तो वह साफ कहता है कि ये मेरे दोस्तों को टोल है. तुम कुछ भी कड़वा मत बोलो. क्या पता कौन किस बात से नाराज हो जाए और वोट देने से मना कर दें. चुनाव के समय गांव के वोटर पुरानी से पुरानी बात को मुद्दा बना लेते हैं और चुनाव लड़ने वाले से पुराने सारे हिसाब क्लीयर करते हैं. तब भी वोट अपनी मर्जी से ही देते हैं और अब तो चलन यह हो गया है कि शराब भी सभी से पी लेते हैं और औरतों ने भी यह कहना शुरू कर दिया है कि लोगां तै शराब दे दो हो और म्हारे तै कैंपा तो पहुंचा दो. एक तरह से चुनाव अब भारत में किसी उत्सव से कम नहीं रहे हैं. मनोरंजन के साथ-साथ खाओ-पीओ चुनाव में आम बात बनती जा रही है.
पति के द्वारा उन्हें दोस्त बताने पर पत्नी कहती है-
तन्यै देव्यै गोळी सै,फेर माँग लेव्यै सॉरी
ये जो शराब पी रहे हैं ये तुझे गोली दे रहे हैं मतलब झूठ बोल रहे हैं और बाद में सॉरी बोलकर चलते बनेंगे. इन्हें अपने स्वार्थों से ज्यादा मतलब है. तुम भले ही इन्हें अपना दोस्त मानते हो पर ये नहीं मानते.
पति फिर पत्नी को समझाने की कोशिश करता है कि
“मन्यै सरपंची लेनी सै, अब कै मन्यै रै गोरी
सरपंची थागी तो रै चौधर आ जागी.”
अर्थात् जो भी हो, बस एक बार सरपंची हाथ आ जाए तो पूरे गाम की चौधर हमारे पास आ जाएगी. इस चौधर के चक्कर में न जाने कितने युवाओं ने अपने घरों को बर्बाद कर लिया और चुनाव में बेहिसाब पैसा खर्च कर दिया.
पत्नी कहती है-
“या दुनिया घणी स्याणी, तन्यै लूट कै खा जागी
तेरा मोर बना जागी, क्यों करयै जोरा खोरी
 म्हारै छड़दम उतरयगा,मेरा फुक जा घणा लहू”
पत्नी पति को समझाती है कि ये दुनिया घणी स्याणी हो गई है. दारू भी पी जाएगी और वोट भी नहीं देगी. तुम समझते क्यों नहीं हो. ये जिन्हें तुम दोस्त कहते हो और दारू पिलाते हो ये तुम्हारा मोर बना जाएंगे. मोर बनाने के मतलब है ठग जाएंगे. तुम जबरदस्ती क्यों चुनाव लड़ रही हो. पत्नी के मना करने के बाद भी चुनाव लड़ रहा है और वह कहती है कि तुम्हारे चुनाव लड़ने की वजह से घर में आवाजाही इतनी बढ़ गई है एक पल चैन का नहीं रहा घर में. इससे सारा दिन मेरा लहू जलता रहता है. मतलब पत्नी बेबस है कुछ नहीं कर सकती. पर समझ सब कुछ रही है. पति की आंखों पर सरपंची ने पर्दा गिराया हुआ है. उसे बस सरपंची रूपी चौधर दिख रही है. 
पति कहता है कि-
“तेरी खातर लोग कहवै, कई सरपंच आळी बहू”
पत्नी फिर समझाती है कि हाथ जोड़कर कह रही हूं मान ले मेरी बात- 
“तन्यै जोड़ कै हाथ कहू, तू मानल्यै मोरी”
पर पति को तो एक ही धुन सवार है-
“सरपंची लेनी सै,इब कै मन्यै रै गोरी
स्पेशल करणै का, फेर ब्योत होवै म्हारा.”
पत्नी कहती है-
“कदै बरसी आलै तू बिठा लेवै ढारा
तू प्रवीण सै प्यारा, मेरी या ए कमजोरी.”
पति से प्यार करती है और यही कमजोरी बन गई है. जिसके कारण वह एक हद से ज्यादा विरोध नहीं कर पाती.
पति अपनी धुन पर अड़ा रहता है और कहता है-
“सरपंची लेनी सै, मन्यै इब कै रै गोरी।”
सरपंची लेणी सै-के बहाने इस गाने में हम हरियाणा के गांवों की चुनावी प्रक्रिया को आसानी से समझ सकते हैं. वैसे इस गीत में कुछ ऐसा नया नहीं है जो आम जन से छुपा हुआ उजागर हुआ हो. परंतु यह गीत जब इतिहास का हिस्सा बन जाएगा, तब एक समय विशेष के संदर्भ का काम करेगा. ग्रामीण मनोविज्ञान के कुछ पहलू भी उजागर होते हैं. पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे की बात मानते रहे हैं, पर जब बात चौधर की आती है तो पति-पत्नी के रिश्ते सामान्य नहीं रहते. यह पितृसत्तात्मक समाज का एक लक्षण  है. जो हर  समय परिवार और संबंधों में सक्रिय नहीं रहता, पर बात जब सत्ता की आती है तो पति और पत्नी के बीच भी सत्ता का संघर्ष शुरू हो जाता है. ठीक सरंपची की तरह. सरपंची एक तरह से सत्ता का ही प्रतीक है. सत्ता के साथ शक्ति जुड़ी होती है. चौधर मूलतः उसी शक्ति का प्रतीक है. इस गाने के माध्यम से चुनावी लोकतंत्र का खामियों को स्पष्ट रूप में समझा जा सकता है और पैसा, बल प्रयोग और संसाधनों का दुरुपयोग भारतीय चुनावों में अब स्वीकार्य हो गए हैं. भ्रष्टाचार शिष्टाचार की तरह बन गया है, उसी तरह चुनावी तंत्र की सारी खामियां स्वीकार्य हो गई हैं. यह गाना मूलतः इसी यथास्थितिवादी स्थिति का चित्रण करता है. इस गाने को सुनने के बाद मनुष्य असहज नहीं होता, बल्कि यह कहता है कि यह सब तो चलता है. यही चिंता का विषय है. यह स्वीकार्यता मूलतः मनुष्य के निहत्थे होने को दर्शाती है और चुनावी लोकतंत्र को झुनझुना मात्र साबित कर देती है.
 

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