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नया हरियाणा

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कॉमिक्स और फिल्मों के सुपर हीरो बनाम विज्ञान

जानिए आखिर इन सुपर शक्तियों का विज्ञान की नजर में क्या खेल है!

कार्टून्स, फिल्म्स, सुपर पॉवर, , naya haryana, नया हरियाणा

23 मई 2018

विजय सिंह ठकुराय


.कॉमिक्स अथवा हॉलीवुड फिल्मों में अजीबोगरीब शक्तियों से लैस नायकों की उत्पत्ति के पीछे एक कारण अक्सर समान होता है और वो है गामा रेडिएशन !!!
गामा रेडिएशन में नहाइये और यह रेडिएशन आपके डीएनए को म्युटेट करके आपको अमानवीय शक्तियों से सम्पन्न बना देगा।
सुनने में अच्छा लगता है।
पर... तकनीकी तौर पर बेहद सूक्ष्म वेवलेंथ होने के कारण गामा अथवा एक्स रे जैसे हाई एनर्जी रेडिएशन आपकी कोशिकाओं में मौजूद डीएनए को हिट करके डैमेज करने की क्षमता रखते हैं इसलिए
असली जिंदगी में गामा रेडिएशन आपको सिर्फ एक चीज दे सकता है और वो है मौत !!!
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पर... इसका यह मतलब नही कि डीएनए म्युटेट नही हो सकता।
आज से 7000 वर्ष पहले हम सभी की भूरी अथवा काली आंखें हुआ करती थी पर डीएनए में मौजूद OCA2 नामक जीन में हुए एक म्यूटेशन के कारण एक ऐसा मानव उत्पन्न हुआ जिसकी आंखों में काले-भूरे रंग के पीछे उत्तरदायी "मेलेनिन" नामक केमिकल अनुपस्थित था और परिणाम के तौर पर प्रथम "नीली आंखों वाला मानव" उत्पन्न हुआ। आज विश्व मे जीवित सभी नीली आंखों वाले मानव उसी एकमात्र मानव की संतानें हैं।
मानवों के रक्त में फैक्टर-10 नामक प्रोटीन रक्त में सुसुप्त अवस्था मे मौजूद होता है और चोट लगने पर जाग्रत होकर चोट वाले स्थान पर रक्त का थक्का बना कर रक्त के बहने से रोकता है
पर वहीं सर्पों की लार ग्रंथियों में यही प्रोटीन जाग्रत अवस्था मे पाया जाता है और सर्पदंश के साथ रक्त में दाखिल होकर रक्त को तेजी से जमाता हुआ ठोस रक्त के ढेर में बदल देता है जिससे पीड़ित की मृत्यु हो जाती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि फैक्टर-10 नामक जीन में आये बदलाव ने मनुष्यों में जीवन देने वाली शक्ति को सर्पों में जीवन छीन लेने वाली शक्ति के रूप में विकसित कर दिया है।
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म्यूटेशन अथवा जीवों में बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। एक मनुष्य के जीवनकाल मे प्राकृतिक तौर पर डीएनए में लगभग 60 म्यूटेशन होते हैं। कुछ म्यूटेशन शरीर के लिए हानिकारक होते हैं तो कुछ लाभदायक। ऑफकोर्स ये म्यूटेशन आपको हवा में उड़ने लायक पंख अथवा मुंह से आग उगलने की क्षमता प्रदान नही कर सकते...
वजह?
वजह यह है कि पक्षी वर्ग का विकास रेप्टाइल तथा मैमल वर्ग के अलग होने के बाद हुआ है यानी हमारे (मैमल) के किसी भी पूर्वज में उड़ने के लिए पंख धारण करने क्षमता नही थी इसलिए डीएनए में किसी भी तरह का म्यूटेशन हमारे डीएनए में पंख उत्पन्न करने के लिए आवश्यक जीन की कोडिंग नही कर सकता और इसी प्रकार... आपका कोई पूर्वज मुंह से आग भी नही उगलता था।
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यहां स्पष्ट है कि एवोल्यूशन सिर्फ क्षमताओं अथवा शारीरिक विशेषताओं में अच्छे/बुरे रूप में एडिटिंग कर सकता है। एकदम से हवा में नयी विशेषताएं उत्पन्न नही कर सकता।
फिर भी... मायूस होने की जरूरत नही। कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जिन्हें तकनीकी तौर पर "सुपर पावर" कहा जा सकता है।
या शायद बीमारी भी...!!!
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साउथ अफ्रीका के निवासी टिमोथी ड्रेयर स्क्लोरोटियोसिस नामक डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। LRP5 नामक जीन में आये बदलाव के कारण टिमोथी की हड्डियां अमानवीय रूप से सघन और मज़बूत हैं इतनी मजबूत कि कार से टक्कर मारने पर भी एक हड्डी में खरोंच ना आये।
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या 2007 में 57 वर्ष की आयु में दिवंगत हुए फ्रांसीसी नागरिक माइकल लोटिटो का उदाहरण ले लीजिए। अपने जीवनकाल मे लोटिटो ने 2 बेड, 7 टीवी, 18 सायकल, तथा एक छोटे एरोप्लेन समेत लगभग 900 किलो मेटल खाया था। उनके इस अजीबोगरीब शौक के पीछे दो कारण थे। पहला तो "पीका" नामक एक डिसऑर्डर जो मानवों में लोहे को खाने की इच्छा को जन्म देता है और दूसरा ऐसा म्युटेशन जिसने उनके पेट के आवरण की झिल्ली को सामान्य से दो गुना मोटा कर दिया था।
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अमेरिका के निवासी स्टीवंस पीट जैसे ना जाने कितने मनुष्य हैं जो सीआईपी (CIP Disorder) से पीड़ित हैं जिनके तहत इंसान दर्द महसूस करने की क्षमता खो देता है।
स्टीवन पीट अनजाने में ही सही लेकिन अपने शरीर को इस प्रकार क्षतिग्रस्त कर चुके हैं कि आज वे ठीक से चल फिर भी नही सकते।
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उदाहरण काफी हैं लेकिन एक संदेश साफ है कि अगर इस तरह के म्युटेंट्स जन्म लेते हैं तो कहीं ना कहीं ये खूबियां उनके जीवन के लिए जंजाल भी बन जाती हैं और अंततः मृत्यु का कारण भी...
तो क्या इन सभी "म्युटेंट्स" की शारीरिक क्षमताओं को पावर कहा जाए अथवा बीमारी???
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Well... Depends... ये भी एक सच्चाई है कि टिमोथी अथवा स्टीवन जैसे लोगों के डीएनए सैंपल के द्वारा वैज्ञानिक कमजोर हड्डियों तथा क्रोनिक पैन का इलाज ढूंढ रहे हैं और मेडिकल क्षेत्र में निरंतर सफलता प्राप्त कर रहे हैं।
शायद इन म्युटेंट्स की सुपरपावर खुद इनके लिए कुदरत द्वारा अभिशाप स्वरूप प्रदान एक बीमारी ही है लेकिन कुदरत के निर्मम चेहरे को धता बता कर कुदरत के अभिशाप को हम मानवता के लिए वरदान के रूप में इस्तेमाल करना सीख रहे हैं।
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फिल्मों की तरह ही म्युटेंट्स सुपरहीरोज असली जिंदगी में भी होते हैं।
हमनें से ही एक...स्टीवंस जैसे लोग... जो अपनी बीमारी के बावजूद खुश हैं और फक्र महसूस करते हैं कि उनकी तकलीफ मानवता के किसी काम आ रही है।

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