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नया हरियाणा

सोमवार , 10 दिसंबर 2018

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लोकतंत्र में सभी दल जनता का प्रतिबिंब होते हैं!

कर्नाटक चुनाव के समय लोकतंत्र को लेकर शंकाएं ओर सवाल उठने लगे थे।

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22 मई 2018

आशुतोष राणा

 

दुनिया में जितनी भी शासन व्यवस्थाएँ हैं उनमें लोकतंत्र को श्रेष्ठतम माना जाता है, हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े धारक हैं। 

इस सौभाग्य के बाद हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए की जिस स्वातंत्र का आज हम सभी आनंद ले रहे हैं उसे १९४७ के पहले हमारे बुज़ुर्गों ने ही हमें उपलब्ध कराया है, जिससे उनकी आने वाली पीढ़ी ग़ुलामी और दासता के दंश से बची रहे। वे शहीद हुए ताकि हम शक्ति सम्पन्न हो सकें, उनका बलिदान हमें बलिष्ट बनाने का हेतु था, उनके अथक परिश्रम के मूल में आने वाली पीढ़ी का परिष्कार लक्षित था। 
वे भूखे रहे जिससे हमें सम्मान की रोटी मिल सके, वे हँसते हुए सूली पर चढ़ गए ताकि कोई भी शूल उनकी आने वाली पीढ़ी को ना चुभे। 
ग़ुलाम का आवास कारावास के जैसा होता है, हमारे बुज़ुर्गों ने बेख़ौफ़ अंग्रेज़ी कारावासों को ही अपना आवास बना लिया था जिससे उनकी आने वाली पीढ़ियों को यह शापित जीवन ना जीना पड़े। 

पीढ़ियों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपनी आत्माहूती देने वाली ऐसी हुतात्माएँ, जिनमें विषम परिस्थितियों को भी सम करने का बल था, क्या हम जो उनकी ही संतानें हैं अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के प्रति उतने ही सतर्क सनद्ध और सक्रिय हैं ? 

क्या हम भी अपनी आगे वाली पीढ़ियों को विषम परिस्थितियों को सम में बदलने का हुनर सीखा रहे हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी शक्ति के मद में हम उन्हें सम को विषम बनाने में दक्ष कर रहे हों ? 
क्या हम आगे की पीढ़ियों को आत्मसम्मान और गरीमा से पूर्ण आसमान दे पाएँगे ? 

हमें यह स्मरण रखना होगा की लोकतंत्र में हमारे प्रतिनिधि चाहे वे किसी भी दल के क्यों ना हो हमारा अपना ही प्रतिबिम्ब होते हैं, हमारे द्वारा अपने ही जन प्रतिनिधियों को ज़लील करना, अपमानित करना, स्वयं का स्वयं के द्वारा स्वयं के लिए किए गए अपमानित कर्म की श्रेणी में आता है। 

हमें ध्यान रखना होगा कि आत्मसम्मान की इमारत अपमान की नींव पर खड़ी नहीं होतीं। 
जो राष्ट्र स्वयं के प्रतिनिधियों का स्वयं की शासन प्रणाली का सम्मान नहीं करता उसे सम्पूर्ण विश्व सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता। 
अशिष्ट भाषा से शिष्ट भाव का सृजन नहीं होता। 
स्वयं को धिक्कारने वाले विश्व के पटल पर सत्कार नहीं पाते। 
अपने ही लोगों का तिरस्कार करने वालों को विश्व स्वीकार नहीं करता। 

भाषा भाव की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, जैसे शेर की दहाड़ उसकी पहचान होती है, हाथी की चिंघाड़ उसकी पहचान होती है, ऐसे ही मनुष्य की भाषा ही उसकी प्रतिष्ठा का कारण होती है। 
अपने नेताओं के लिए कहे गए अपशब्द मात्र उनका अपमान नहीं स्वयं के अपमान की श्रेणी में आता है, क्योंकि हमारे नेता या जन प्रतिनिधि हमारे विश्वास, हमारी कुशलता, हमारे समर्पण, हमारी शुचिता का प्रमाण होते हैं। 
स्मरण रखिए हमारे नेता हमारा चुनाव नहीं करते, अपितु हम ही अपने नेता का चुनाव करते हैं। 
हमारा व्यवहार ही हमारे व्यापार और परिवार की प्रगति या दुर्गति का कारण होता है, हमें नीतिगत विरोध और व्यक्तिगत वैमनस्य के बीच के अंतर को समझना होगा, अन्यथा हमारे बुज़ुर्गों से मिली हुई कल्याणकारी व्यवस्था को हम स्वयं ही अकल्याणकारी व्यवस्था में रूपांतरित कर लेंगे।

जय हिंद जय भारत 🌹🙏


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