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नया हरियाणा

मंगलवार, 18 जून 2019

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राजा नाहर सिंह का संघर्ष : खून और आंसुओं की कहानी

बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह (1823-1857) ने 1857 की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विद्रोह कुचलने के बाद सन् 1858 में फांसी दी।

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18 मई 2018



नया हरियाणा

राजा नाहर सिंह के संघर्ष की कहानी खून और आंसुओं की है। उनका बलिदान अनूठा और प्रेरणादायक था। राजा नाहर सिंह बल्लभगढ़ की जाट रियासत के राजा थे। बल्लभगढ़ की जाट रियासत की स्थापना सन् 1739 में बलराम सिंह ने की थी। बलराम सिंह मुग़ल साम्राज्य की अधीनता स्वीकार नहीं करते थे, जिस कारण उन्हें 1753 में मुगलों ने मरवा दिया। उनके मित्र सूरज मल (भरतपुर राज्य के नरेश) ने उनके पुत्रों को फिर बल्लभगढ़ की गद्दी दिलवाई। बाद में जब अफ़गानिस्तान से अहमद शाह अब्दाली ने हमला किया तो बल्लभगढ़ ने उसका सख़्त विरोध किया, लेकिन 3 मार्च 1757 को हराया गया। इसके बाद बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह (1823-1857) ने 1857 की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विद्रोह कुचलने के बाद सन् 1858 में फांसी दी।
6 अप्रैल 1821 को महाराजा राम सिंह के घर जन्में नाहर सिंह का विवाह 16 वर्ष की आयु में कपूरथला घराने की राजकुमारी किशन कौर से हुआ था। 18 वर्ष की आयु में 20 जनवरी 1839 को बसंत पंचमी के दिन इनका राज्यारोहण हुआ। मात्र 36 वर्ष की आयु में 9 जनवरी 1858 को फांसी के बाद उनका मृतक शरीर भी अंग्रेजी शासन ने उनके परिजनों को नहीं दिया। अंग्रेजों को भय था कि कहीं उनके मृतक शरीर को देखकर रियासत के लोग भड़ककर शोला न बन जाएं और अंग्रेजों पर कहर बनकर न टूटें। 
प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जिसे 1857 की महान क्रांति के नाम से जाना जाता है। इसमें बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह अग्रणी क्रांतिकारी में से थे. 
वीर सपूत राजा नाहर सिंह को 9 जनवरी 1858 को लालकिले के सामने चांदनी चौक में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध विद्रोह के आरोप में फांसी पर लटकाया गया था। उनके साथ उनके विश्वस्त साथियों गुलाब सिंह सैनी और भूरा सिंह को भी फांसी दी गई थी।
राजा नाहर सिंह न केवल तलवार के धनी थे बल्कि शासकीय कूटनीति में भी दक्ष थे। दिल्ली में दोबारा अधिकार के लिये ब्रिटिश सैनिकों का दबाव बढ़ा तो बहादुरशाह जफर ने नाहर सिंह को दिल्ली की सुरक्षा के लिए बुलावा भेजा। नाहर सिंह दक्षिण दिल्ली पर लोहे की दीवार बन गए। किसी भी फिरंगी को उन्होंने दक्षिण की ओर से नहीं घुसने दिया। आगरा से आती हुई ब्रिटिश सैनिक टुकड़ियों को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया। ब्रिटिश सेना के अधिकारी नाहर सिंह की रक्षा पंक्ति से आतंकित थे।
राजा नाहर सिंह लाल किले की रक्षा बल्लभगढ़ से आगे निकलकर कर रहे थे। दिल्ली के तख्त पर दोबारा अंग्रेजी अधिकार हो जाने पर बहादुरशाह जफर बंदी बना लिए गए। शहजादों को मौत के घाट उतार दिया गया। दिल्ली की सड़के रक्त रंजित हो उठी। अंग्रेजों के अत्याचारों से दिल्ली कांप उठी। तब नाहर सिंह बल्लभगढ़ की रक्षा के लिए दिल्ली से वापस आ गए थे। शहीद राजा नाहर सिंह बल्लभगढ़ स्थित ऐतिहासिक महल आज भी राजा व उनके वंशजों की याद दिलाता है। राजा नाहर सिंह की याद में उनके शहीद दिवस के रूप में 9 जनवरी को विशेष समारोह का आयोजन करते हैं। फरीदाबाद स्थित स्टेडियम का भी नामकरण शहीद राजा के नाम पर हुआ है। 


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