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शनिवार, 17 नवंबर 2018

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चुनावी नतीजे और Rubbish मीडिया की मक्कारी!

राजनीतिक दलों के बीच अपने एजेंडे ठेलते मीडियाकर्मियों पर करारा तंज कसा गया है.

NIRAJBADHWAR, naya haryana, नया हरियाणा

16 मई 2018

नीरज बधवार

ढीठ वो होता है जो 6 को 9 पढ़ने के लिए उल्टा लटक जाता है। मोदी के अंधविरोधी भी उसी प्रजाति के हैं। कर्नाटक के चुनावी नतीजे आते ही ये सब उल्टे लटक गए हैं और वो पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जो सामने लिखा ही नहीं है। कह रहे हैं कि मोदी के दस दिन प्रचार करने के बाद भी बीजेपी अपने दम पर सत्ता में नहीं आ पाई और ये पार्टी के लिए शर्म की बात है।
एक बड़े चैनल पर बैठा चुनावी विश्लेषक कह रहा था कि इन नतीजों से ये कहीं साबित नहीं होता कि कर्नाटक में मोदी की लहर है।

ये सब सुनकर मैं सोचने लगा कि ये किस तरह की नफरत या अंधा विरोध है जो इंसान को सामान्य तर्क समझने से भी रोक रहा है। पिछले चुनाव में 39 सीटें पाने वाली अपने दम पर 104 पर आ गई। पिछली बार की तुलना में 65 सीटें ज़्यादा और ये शख्श कह रहा है कि ये नतीजे मोदी के लिए झटका है। मतलब 23 साल सत्ता में रहने के बाद गुजरात में जब बीजेपी दोबारा सत्ता में आ जाती है तब आप उसकी जीत पर चर्चा न करके इस चीज़ को मुद्दा बना लेते हो कि उसने 100 के आंकडे को पार नहीं किया। वहां उसका लगातार 5वीं बार सत्ता में आना विषय नहीं होता और बल्कि इस बात पर छाती कूटी जाती है कि वो 100 का आंकड़ा नहीं छू पाई।

यहां कर्नाटक के रूप में कांग्रेस एक और राज्य से बाहर हो गई और आप इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि मोदी बीजेपी को 39 से 113 पर क्यों नहीं ला पाया। मतलब जो 65 सीटे बढ़ी वो आपके लिए मुद्दा नहीं है। मगर जो 8 सीटें कम रह गई, आपके हिसाब से सारा संदेश उसी में छिपा है। वाह! सुभानअल्लाह!

बजाए इस बात पर चर्चा करने के राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक और राज्य में सत्ता से बाहर हो रही है। पिछली बार से 43 सीटें कम लेकर आई है। क्या वजह है कि कहीं भी कांग्रेस पार्टी दोबारा सत्ता में नहीं आ रही। पिछले 4 सालों में पार्टी 17 राज्यों से सिमटकर 3 पर आई। बजाए इन सब पर चर्चा करने के आप इस बात में सुख ढूंढ रहे हैं कि बीजेपी अपने दम पर सत्ता में नहीं आई।

टीवी का Rubbish मीडिया भी बड़ी चालाकी से नतीजों पर बात न कर अब इस चीज़ को मुद्दा बना रहा है कि राज्यपाल की भूमिका क्या होगी। राज्यपाल को तो कांग्रेस-जेडीएस को न्यौता देना चाहिए। क्योंकि गोवा, मणिपुर में भी ऐसा हुआ था। लेकिन यहां राज्यपाल की पृष्ठभूमि को देखकर संदेह हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि ये कोई मुद्दा नहीं है। ये मुद्दा है मगर ये बड़ी चर्चा का एक छोटा या आखिरी हिस्सा हो सकता है। मुख्य चर्चा तो नतीजों पर होनी चाहिए। और सारे सवाल कांग्रेस से पूछे जाने चाहिए जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया। लेकिन नतीजों पर चर्चा करने पर आपको बीजेपी को कोसने का मौका नहीं मिलेगा। नतीजों पर चर्चा करेंगे तो फिर से राहुल गांधी की अयोग्यता पर चर्चा करनी पड़ेगी और ये भी आप नहीं करना चाहते। तो, आपने बड़ी चालाकी से राज्यपाल की भूमिका को प्राइम टाइम का विषय बना लिया। क्योंकि ऐसा कर आप ये साबित करेंग कि देखिए किस तरह बीजेपी की पृष्ठभूमि से आने वाला शख्स अब बीजेपी के फायदे का फैसला लेगा। आप चुनावी नतीजों पर चर्चा न कर पूरी बातचीत को राज्यापाल की नैतिकता से जोड़ देंगे। उसमें भी बजाए ये चर्चा करने के भारतीय राजनीति का 70 साल का इतिहास इसी बात का गवाह रहा है कि जो पार्टी केंद्र में होती है। जिस पार्टी का बिठाया राज्यपाल होता है, ऐसी सूरत में वो उससे अपने हित के फैसले ही करवाती है। और अगर अब भी ऐसा हो रहा है तो इसमें ताज्जु क्या? क्योंकि राज्यपाल अगर बीजेपी को पहले न्यौता देते भी हैं, तो भी वो नियम के तहत ही होगा।

लेकिन अफसोस ये है कि जब आप नैतिकता की बात करेंगे तब भी आप उसमें भी राज्यपाल और केंद्र सरकार की नैतिकता की बात करेंगे मगर ये सवाल नहीं पूछेंगे कि जिस कांग्रेस-जेडीस को आपके हिसाब से बुलाया जाना चाहिए क्या वो खुद इस तरह सरकार बनाने का दावा पेश कर नैतिक काम कर रही हैं? क्या कांग्रेस को ये समझ नहीं आ रहा कि 121 से 78 सीटों पर लाने का मतलब जनादेश उसे सत्ता से बाहर करने का है। अगर कांग्रेस यहां नैतिकता को दरकिनार कर नियम का फायदा उठा (चुनाव बाद गठबंधन कर सकते हैं) सरकार बनाने का दावा पेश कर रही है, तो राज्यपाल भी नियम के अंतर्गत ही सबसे बड़ी पार्टी को न्यौता दे सकते हैं।

मगर नहीं, यहां भी आप सहूलियत की नैतिकता पर चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि वो आपको एक पार्टी और उसकी सरकार को गाली देने का मौका देती है। और यही अफसोस की बात है। आप नतीजों पर चर्चा करने का मौका न लपककर, उसका विश्लेषण न करके, गाली देनाे का मौका लपक लेते हैं और फिर रोना रोते हैं कि लोग मुझे गाली क्यों देते हैं। उल्टा लटककर 6 को 9 पढ़ना बंद कर दीजिए। अपनी सहूलियत के हिसाब से गाली देना बंद कर दीजिए। लोग भी ऐसा करना बंद कर देंगे।


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