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नया हरियाणा

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

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राहुल गांधी के नेतृत्व पर क्यों ना उठे सवाल!

लगातार हार के कारणों को समझकर जमीनी स्तर पर काम न करना भारी पड़ रहा है कांग्रेस को।

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16 मई 2018

प्रदीप डबास

कर्नाटक चुनावों ने एक बात तो साफ कर दी है कि कांग्रेस और खास तौर पर राहुल गांधी को ज्यादा काम करने की जरूरत है। उन्हें समझ लेना चाहिए कि राजनीति पार्ट टाइम नहीं हो सकती। ये चौबीस घंटे और बारह महीनों का काम है। इतना आसान नहीं है लोगों के बीच अपनी छवि को सुधार लेना और एक डूबी हुई पार्टी को पार लगा देना। राहुल की लीडरशिप को लेकर जो सवाल लगातार उठते रहे हैं कर्नाटक के बाद ये हमले शायद अब तेज हो जाएंगे। उनके अध्यक्ष और उससे पहले उपाध्यक्ष बनने से लेकर एक पंजाब को छोड़कर कांग्रेस ने हर राज्य में हार का ही सामना किया है। आंकड़ा कहता है कि राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी अब तक 24 चुनाव हार चुकी है। सवाल ये उठने लगा है कि क्या राहुल सही में कांग्रेस की हालत को सुधार पाएंगे। इतनी बुरी गत तो इस पार्टी की पहले कभी नहीं हुई। क्या राहुल चुनावों को लेकर रणनीति बनने में पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। क्या उनकी छवि को लोग स्वीकार नहीं कर रहे हैं। क्या राहुल गांधी अभी तक अपनी टीम तैयार नहीं कर पाएं हैं। ये कई बड़े सवाल हैं। सबसे पहले बात कर लेते हैं टीम की। कांग्रेस पार्टी ने देश को बड़े से बड़ा नेता दिया है लेकिन वो सब अब गुजरे जमाने की बाते हो चुके हैं। फिलहाल तो कांग्रेस में बड़े चेहरों के नाम पर कुछ ही लोग बचे हैं जैसे डॉ. मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, डॉ. कर्ण सिंह, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलौत और कुछ ऐसे ही नाम। सीधा कहें तो ये सभी चले हुए कारतूस हो चुके हैं। कभी संजय गांधी और कभी राजीव गांधी और सोनिया की टीम का हिस्सा रहे ये लोग अब सीधी जमीन की राजनीति करने में उतने सक्षम भी नहीं हैं। ये टीम राहुल को विरासत में मिली है। इनमें से सिर्फ अशोक गहलोत ऐसे नेता दिख रहे हैं जो राहुल को थोड़ा सपोर्ट कर रहे हैं और घूम भी रहे हैं। ऐसे ड्राइंग रूम के नेताओं के साथ राहुल किसी भी सूरत में पार्टी का बेड़ा पार तो लगा ही नहीं सकते तो राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने लिए एक मजबूत टीम तैयार करना बन गई है। ऐसा नहीं कि पार्टी में उनका साथ देने के लिए युवा नेता नहीं हैं। इनकी भी एक पूरी फौज है। राजेश पायलेट के बेटे सचिन पायलेट, माधव राव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्या सींधिया, जितेंद्र प्रसाद के बेटे जतिन प्रसाद, रणदीप सुरजेवाला। लेकिन ये तमाम भी तो एक विरासत लेकर कांग्रेस में आगे बढ़ रहे हैं। इन सभी के पिता कांग्रेस में बड़ा नाम होते थे इसलिए इन्हें भी पार्टी ने स्वीकार कर लिया, नहीं तो इनमें एक भी ऐसा नेता नहीं है जो सड़क पर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके। कम से कम अभी तक तो इस तरह का कोई उदाहरण दिखा नहीं। मतलब साफ है कि इतनी बड़ी पार्टी होने बावजूद राहुल गांधी के पास अपनी कोई टीम नहीं है। उन्हें जमीन से जुड़े हुए नेताओं को उबारने की जरूरत है। उन्हें जरूरत है कि एक ऐसी टीम तैयार की जाए जो लोगों के बीच रहकर उनके मुद्दों पर काम कर सके उन्हें समझ सके और जोरदार ढंग से उठा सके, नहीं तो लोग भाषणों पर भरोसा नहीं करते और हार का आंकड़ा बढ़ता जाता है। कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में थी और फिर से सरकार बनाने की भी भरपूर उम्मीदें जताई जा रही थीं लेकिन सीटों की संख्या 80 तक भी नहीं पहुंची। मुझे लगता है राहुल गांधी को व्यक्तिगत तौर पर इस पर विचार करना ही होगा। जब सरकार होने के बावजूद सत्ता बचाने में असफल रहे तो आने वाले वक्त में तो राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसी चुनौतियां हैं राहुल उनसे कैसे निपट सकेंगे। वैसे गुजरात और कर्नाटक चुनावों के दौरान राहुल ने हिंदू कार्ड खेलने की पूरी कोशिश की। कभी मंदिरों में पूजा की तो कभी कीर्तन में बैठकर भजन भी गाये। वो मठों में भी दर्शन करते और मत्था टेकते दिखे लेकिन सब विफल। इन सब के जरिए राहुल ने बीजेपी के हिंदू वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की लेकिन वो इसमें भी सफल नहीं हो सके। यानि सवाल अब ये उठता है कि बीजेपी के हिंदू वोट बैंक को तोड़ने के लिए क्या कांग्रेस या राहुल गांधी के पास कोई और रास्ता भी है या नहीं। ये उनके लिए आने वाले वक्त की सबसे बड़ी चुनौतियों में एक हो सकती है। राहुल के लिए एक चुनौती अपने सहयोगी दलों का साथ बनाए रखने की भी मानी जा रही है। कर्नाटक चुनावों के नतीजे आने के बाद जिस तरह कांग्रेस के सहयोग देने की बात पर ही जेडीएस के कुछ विधायकों ने विरोध जता दिया वो इस पार्टी के लिए चिंता पैदा कर सकता है। अगर एक व्यक्ति विशेष से पार्टी नेताओं को दिक्कत हो सकती है तो ये बात पहले क्यों नहीं पहचानी गई और इसका हल पहले क्यों नहीं निकाल लिया गया। ये बातें आगे भी मायने रखेंगी। कांग्रेस के साथ जो दल हैं उनका अपने अपने राज्यों में पूरा दबदबा है और कांग्रेस के पास सिर्फ पंजाब है। ऐसे में अगर कांग्रेस इसी तरह कमजोर होती रही तो ये आपस में मिलकर ही बीजेपी को टक्कर दे सकते हैं कांग्रेस कहीं दिखाई भी नहीं देगी। कांग्रेस की एक बड़ी समस्या और भी है और वो है आपसी फूट। ये समस्या लगभग हर राज्य में बनी हुई है। कांग्रेस के नेता हर स्टेट में आपस में ही एक दूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं। इस समस्या से निपटना भी एक बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस को डूबने से बचाने के लिए राहुल गांधी को इस हार को आखिरी हार के तौर पर लेना होगा। उन्हें समझ लेना चाहिए कि जो लोग उनके लिए काम करते हैं उन्हें समय दिया जाना चाहिए। चुनावों के बाद छुट्टिया नहीं होती और काम करने के लिए एक टीम की जरूरत होती है।

 


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