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नया हरियाणा

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

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हरियाणा में बदलाव तो दिखाई देता है, बस आदत नहीं है अभी 

हरियाणा में भाजपा सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर बहुत बारीकी से विश्लेषण किया गया है. सरकार की कमियों और ताकतों दोनों के साथ साथ समाज के वर्तमान माहौल पर भी नज़र रखते हुए यह लेख लिखा गया है. जरुर पढ़ें.


haryana me badlav to dikhta hai lekin abhi aadat nahi hai, naya haryana

26 अक्टूबर 2017

धर्मेंद्र कंवारी

मनोहर लाल सरकार आज तीन साल पूरे कर लिए हैं। इसी के साथ ही सरकार के कामकाज का आंकलन तो होगा ही, लोग भी करेंगे। करना भी चाहिए। सवाल भी पूछे जाएंगे और सरकार की तरफ से जवाब भी आएंगे। ऐसा माना जाता है कि सालभर पहले सरकार चुनावी मोड में आ जाती है, इस लिहाज से देखें तो मनोहर सरकार के पास काम के लिए अभी सालभर का समय ही बचा है बाकी तो चुनावी मौसम होगा। उस मौसम में की जाने वाली घोषाणाएं और राहत का  वोटर पर कुछ खास असर नहीं हो पाता है, पिछली सरकार में ये प्रयोग गोहाना रैली में घोषणाओं की बारिश के बावजूद फेल रहा था। खैर, अब बात करते हैं मनोहर सरकार की। तीन साल पहले सरकार का जब गठन हुआ था तो पहली महत्वाकांक्षी योजना सीएम विंडों के रूप में सामने आई थी। सीएम का कहना था कि जनता को चंडीगढ जाने में तकलीफ होती है इसलिए उनकी शिकायतों का समाधान इस तरह होना चाहिए कि सीधे अधिकारी की जवाबदेही तय हो। इस तरह बनी सीएम विंडो। शुरुआत में यह योजना कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई लेकिन आज यह जनता के लिए अपनी वाजिब समस्या को हल कराने का हथियार बन चुकी है और अधिकारी इसकी शिकायतों पर खौफ खाते हैं। इसपर अमल नहीं करने पर सैकडों अधिकारियों पर गाज गिर चुकी है इसलिए अब काम तेजी से भी होता है। कुछ मिलाकर जो सोचा था यह योजना उस पर खरा उतरी है। इसके बावजूद भी ये पूरी तरह प्रभावी नहीं है। अफसर जुगाड लगा ही लेते हैं और मनोहर जी कुछ नहीं कर पाते हैं। 

तीन साल में सरकार का ऑनलाइन सेवाएं करने पर जोर रहा है। पानी का कनेक्क्क्षन लेना हो या बिजली का। कोई भी काम हो अब सबकुछ ऑनलाइन मौजूद है। हालांकि अब भी लोग परंपरागत तरीकों में विश्वास करते हैं इसलिए ईदिशा केंद्रों पर भीड़ कम नहीं हो रही लेकिन जो जागरूक लोग हैं उन्हें ऑनलाइन में मजा आता है। बुढापा पैंशन को सीधा बैंक खातों में डालने की चुनौती में भी सीएम मनोहर लाल ने हाथ डाला और इस काम को कर भी दिखाया। अब बुजुर्गों के खाते में सीधे पैसे आते हैं, कहीं जाना नहीं पडता है। हालांकि तीन साल पूरे होते होते कल्याण विभाग ने करीब तीन लाख पेंशन पर वेरिफिकेशन का जो अडंगा लगाया है उससे बुुजुर्ग परेशान हैं। मनोहर सरकार की विशेष बात ये है कि उसने जो भी योजना पब्लिक को राहत देने के लिए बनाई उसमें लोगों को तकलीफ जरूर हुई है। 

मनोहर सरकार बनी थी तब पहले साल उसकी खासी फजीहत खाद के वितरण पर हुई थी। खाद लेने के लिए इतनी लंबी लंबी लाइनें लगी कि मीडिया ने सरकार ने खूब खिंचाई की। दूसरी और तीसरी साल सरकार ने इसका मौका नहीं दिया। मॉनीटरिंग इस तरीके से की गई कि अब खाद सरप्लस पडी है, हां, इसे आधार कार्ड से जोडा गया और कोटिड खाद दी गई तो कालाबाजारी भी खुद रूक गई। दो साल में एक मौका भी ऐसा नहीं आया है कि खाद के लिए किसी किसान को कभी लाइन में लगे देखा हो। यही केरोसिन फ्री स्टेट बनाने के मामले में हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आहवान पर जब हरियाणा केरोसिन मुक्त प्रदेश बनाने की राह पर चला तो अधिकारियों तक को संदेह था लेकिन सालभर में ही काम हो गया, हालांकि गैस कनेक्क्षन देने के मामले में कई जगह कंपनियों ने लापरवाही बरती है लेकिन अब कोई समस्या देखने को नहीं मिलती। कम से कम करोसिन फ्री करने के मामले में सरकार को पूरे नंबर दे सकता हूं। 

सरकार की सबसे बडी उपलब्धि, संभवत सरकार जिसको चुनाव में लेकर भी जनता के बीच जाएगी, वह है ऑन लाइन ट्रांसफर और पारदर्शी तरीके से नौकरी। एचपीएससी ने जब एचसीएस का पहला रिजल्ट जारी किया तो कुल्फी बेचने वाला, हेयर ड्रेसर का काम करने वाला और 40 गज के मकान में रहकर तैयारी करने वाले अनेक युवाओं का अफसर बनने का सपना पूरा हुआ तो हर किसी ने इसका लोहा माना। इंटरव्यू खत्म हुआ नहीं कि रिजल्ट जारी की पॉलिसी से हरियाणा के बेरोजगारों में सिफारिश को छोडकर अगर तैयारी के भरोसे नौकरी की आस जगी है तो निसंदेह सरकार की यह बडी उपलब्धि है। प्रदेश में मंत्रियों के हाथ में जब नौकरी का सिफारिश पत्र पकडाया जाता है तो जवाब होता है कि-चौधरी साहब आपको पता है कि अब प्रदेश में ये जमाना जा चुका है, नौकरी ईमानदारी से दी जा रही हैं। इसकी एवज में सामने से गुस्सा या झुंझलाहट नहीं बल्कि जवाब होता है कि बात तो थारी सही सै, छोरे नै कहूंगा तैयारी करै। यही टीचर ट्रांसफर पॉलिसी का नतीजा है। जिन्होंने कभी सोचा नहीं था कि वो बिना सिफारिश शहर के स्कूल में पढाएंगे वो आज शहर में पढा रहे हैं और जिन्होंने सिफारिश के बल पर कभी शहर से ट्रांसफर नहीं होने दी वो आज गांवों में पढा रहे हैं। यह बदलाव ही तो है पर अभी हमें इसकी आदत नहीं पडी है बस। इसलिए कोशिश करते हैं। यह सरकार की उपलब्धि है कि उन्होंने कुछ मील के पत्त्थर जरूर खडे किए हैं। हालांकि यह जनता को तय करना है कि उन्हें कौन सा ढर्रा चाहिए। अब कोई कामों की ठेकेदारी नहीं लेता प्रदेश में, यह असलियत है। विपक्ष ने सरकार के इस पारदर्शी सिस्टम की खामियां ढूढने की तमाम कोशिशें की हैं लेकिन अभी तक कुछ खास निकल नहीं पाया है। 

कुछ मोर्चों पर सरकार असहज रही है। असहज बहुत छोटा है दअरसल फेल रही है कई मोर्चों पर मनोहर सरकार। तीन साल हो चुके हैं जाट आरक्षण का का मामला सरकार के गले की फांस बना हुआ है। तीन बार प्रदेश इस आंदोलन की आंच में झुलस चुका है। रोहतक तो वो उपद्रव देख चुका है जिसकी कल्पना भी कभी किसी ने नहीं की होगी। बाहर से आए लोग सरकार को आंखें दिखाते हैं और मनोहर साहेब हैं कि आंखें खोलकर देखना ही नहीं चाहते। जाट-नॉन जाट के नाम पर प्रदेश बुरी तरह बंटा है तो इसकी बडी जिम्मेदारी सरकार की भी रही है। भाजपा के दो सांसदों ने इस जहर को फैलाने में अपनी तरफ से कोई कसर छोडी नहीं। सरकार प्रदेश के लोगों से बात करना सीधे। आंदोलन हो तभी बात होगी यही इस सरकार की सबसे बडी दिक्कत है। इसे दूर नहीं किया गया तो मनोहर लाल का मनोहर सफरनामा दुखद सफर में तब्दील होते भी देर नहीं लगेगी। 

(यह लेख हरियाणा की नब्ज़ को बखूबी समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र कंवारी ने लिखा है.)


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