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नया हरियाणा

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

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इतिहास की बात हो जायेंगे सरकारी स्कूल!

सरकारी स्कूलों की हालत लगातार खराब होती जा रही है और प्राइवेट स्कूल लूट की दुकान में तब्दील होते जा रहे हैं.

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9 मई 2018

डॉ. प्रीतिका

घबराइये नहीं ये आज की नहीं अगले बीस साल बाद की Headline है।
हरियाणा भारत का एक छोटा-सा प्रदेश है पर खेल में हम एक तिहाई मेड़ल जीत लेते हैं, IAS की परीक्षा का नतीजा आता है तो पहले पांच टापर में से तीन हरियाणा के होते हैं और चारो तरफ हमारी वाहवाही हो जाती है लेकिन साहब ये सिक्के का एक पहलू है।

एक हरियाणा गांव में भी बसता है जहां शिक्षा की लौ धीमी हो गई है। हर साल आंकडे आते हैं कि सरकारी स्कूलों की छात्र संख्या घट रही है पर शायद ही किसी ने गहराई से विवेचना की हो ऐसा क्यों हो रहा हैं। क्या कारण है कि सरकार द्वारा 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा , मध्याह्न भोजन, मुफ्त वर्दी, स्टेशनरी व बैग के पैसे व मासिक भत्ता देने के बाद भी छात्र संख्या घट रही है।

1.हरियाणा के ग्रामीण परिवेश में जहां छोटे किसान, काश्तकार, मजदूर, मिस्त्री, दिहाड़ी दार रहते हैं और सारा जीवन दो समय की रोटी जुटाने के इर्दगिर्द घूमता है। एक ही आस रहती है कि बच्चा पढ़ लिख कर कुछ बनेगा तो गरीबी का कुचक्र टूटेगा। इसी फेर में अभिभावक अपने बच्चों का मुंह सरकारी से प्राइवेट स्कूलों की ओर मोड़ देते है।

दूसरा कारण है कि समाज में एक अज़ीब किस्म का सरकारी स्कूलों के प्रति अविश्वास है। अभिभावकों को लगता है कि बच्चा सरकारी में जा रहा है क्या सीखेगा जबकि अतीत में सरकारी स्कूलों से ही पढे लोग IIT, IIM और भी ना जाने कितने प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च पदों पर आसीन हैं।

3. सरकारी स्कूलों में पहले भी ग्रामीण परिवेश के छात्र अधिक पढते थे लेकिन अब लगभग हर गांव में छोटी छोटी दुकान नुमा प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं जो कम फीस में बच्चों का दाखिला करते हैं और अभिभावक भी अपनी शान बनाने के लिए कम से कम घर के लडके का दाखिला तो प्राइवेट स्कूल में करा ही देते हैं ।।सरकार लगभग हर विभाग (बिजली, परिवहन,आबकारी इत्यादि) से कमाती है लेकिन शिक्षा व चिकित्सा में उसे खर्च करना पड़ता है शायद इसलिए सरकारभी शिक्षा को निजी हाथो में सौंपने को ललायित रहती है।
4. नियम 134 A रही सही कसर पूरी करता है , गरीब बच्चा एक टेस्ट पास करके प्राइवेट स्कूल में दाखिला ले सकता है और माता पिता सहर्ष ही भेज देते हैं चाहे बच्चे के साथ वहां बराबरी का व्यवहार भी ना हो और इस सब में सरकारी स्कूल छात्रो का रास्ता ही तकते रह जाते हैं।
5.अध्यापकों की अपनी छवि भी छात्र संख्या को प्रभावित करती है। पिछले दिनो एक सरकारी स्कूल में 50बच्चों ने प्राइवेट स्कूल छोडकर सरकारी में दाखिला लिया क्योंकि उस स्कूल में जो नए प्रिंसिपल आए उनका पूरे जिले में मेहनत करने में नाम था। अध्यापकों को अपना ये कंलक धोना होगा कि सरकारी स्कूल के मास्टर पढाने में कोताही बरतते हैं।

अब जब हालात इतने कठिन हैं तो सरकारी स्कूलों को बढाने में समाज को अपना रोल अदा करना ही होगा। कितने ही अफसर, नेता, पत्रकार, समाज सेवी, डाक्टर, फौजी, इंजीनियर इन्हीं स्कूलों में पढकर जीवन में कामयाब हुए लेकिन कभी लौट कर अपने स्कूल की तरफ नहीं देखा। अब जाईये क्योंकि आप उनके लिए एक आदर्श होंगे जो उनके बीच से ही उंचाई तक पहुंचे।। कितने ही सैनिक स्कूलों में या दूसरे नामी गिरामी स्कूलों ने Old student association बना रखी है जिससे वे समय समय पर अपने स्कूल के छात्रों के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं।। आप भी कीजिए हो सके तो कुछ खेल का सामान , कुछ कापियां, रंग , कुछ किताबें, न ए पुराने कपडे वहाँ बांट कर आइए।
अब हमें सब कुछ ये सोच कर नहीं छोड़ देना है कि ये सरकार का काम है सरकार अपनी तरफ से हज़ारों प्रयास कर रही है पर हमें मिलकर एक बुझते दीए में घी डालना है।


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