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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

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बेरोजगारी : पकौड़े नहीं तल सकते तो पान की दुकान लगा लो!

देश के युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है.

, naya haryana, नया हरियाणा

1 मई 2018

प्रदीप डबास

पकौड़े तलने के बाद देश के युवाओं को अब एक और रोजगार भी सुझा दिया गया है। इस बार युवाओं को पकौड़े बेचने की जरूरत नहीं है। वो कुछ और भी कर सकते हैं। मसलन पान की दुकान। जी हां त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव का कहना है कि रोजगार के लिए नेताओं के पीछे भागने की बजाए युवा यदि पान की दुकान भी लगा लेता है तो कुछ साल में ही उसके अकांउट में लाखों रुपये जमा हो सकते हैं। इन सहाब का बयान आने के बाद पार्टी आलाकमान हरकत में आया और उन्हें दिल्ली तलब किया गया, हो सकता है कि इन्हें समझाया गया हो कि इस तरह के बयान देने बचें। मुख्यमंत्री को तो समझा दिया जायेगा लेकिन देश के युवाओं को कौन समझाए कि करोड़ों नौकरियों के नाम पर उन्हें चूना लग चुका है।

ये बेहद गंभीर है। आप यदि रोजगार सृजित नहीं कर पा रहे हो तो कम से कम इस तरह के बयान देकर युवाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ तो ना किया जाये। वैसे ये भी सच है कि आने वाले कुछ समय में बेरोजगारी की इस समस्या से निजात मिलता नही दिख रहा है, बल्कि देश में बेरोजगारी कुछ हद तक बढ़ जरूर सकती है।

संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की पिछले साल वैश्विक रोजगार एवं सामाजिक दृष्टिकोण पर पिछले साल आई रिपोर्ट तो कम से कम ये ही कहती है। रिपोर्ट में बेरोजगारी बढ़ने की वजह से सामाजिक असामनता की स्थिति के और बिगड़ने की भी आशंका जताई गई है।

माना जा रहा है कि मौजूदा साल में बेरोजगारी 3.5 फीसदी तक रहेगी, जबकि पिछले साल ये 3.4 फीसदी थी। आंकड़ें साफ बोलते हैं कि चालू साल में बेरोजगारी .1 फीसदी और बढ़ेगी। ऐसे में नौजवानों को तैयार हो जाना चाहिए कि नौकरियां अगर दूर हैं तो स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ाया जाये। पहले पकौड़ों को स्वरोजगार का प्रतीक मान लिया गया था लेकिन अब तो लगता है कि पान की दुकान पर बैठकर बेरोजगार युवा चूना कत्था लगाएंगे।

सरकारी महकमों की हालत तो ये है कि तमाम विभागों में हजारों हजार पद खाली पड़े हैं लेकिन नई भर्तियां नहीं हो रही हैं। लोग सेवा निवृत्त हो रहे हैं और नये लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है। जिन संस्थानों को भर्तियों का जिम्मा दिया गया है वो खुद इतनी लचर हालत में हैं कि क्या कहा जाये। भर्तियां निकलती भी हैं तो सालों तक रोल नंबर नहीं पहुंचते। टेस्ट हो जाते हैं तो परिणाम घोषित नहीं किये जाते और अगर सब कुछ हो जाये तो कोई पेंच ऐसा छोड़ दिया जाता है कि भर्ती कोर्ट में जाकर लटक जाती है।

एक सर्वे कहता है कि रोज़गार सृजन भारत की 'एक मुख्य चुनौती' है। साल 2030 तक हर साल 1.2 करोड़ भारतीय नौकरी पाने की क़तार में खड़े होने लगेंगे। फ़िलहाल 2.6 करोड़ भारतीय नियमित रोज़गार की तलाश में बैठे हैं। ये संख्या ऑस्ट्रेलिया की आबादी के लगभग बराबर है।

भारत में बेरोजगारी का आलम ये हो चुका है कि युवा ये तक भूल जाते हैं कि उन्होंने पढ़ाई किस ऊंचे दर्जे की है और वो किस नौकरी के लिए प्रयास कर रहा है। पिछले दिनों रेलवे की करीब एक लाख नौकरियों के दो करोड़ से ज्यादा लोगों ने आवेदन भरे। इनमें से ज्यादातर नौकरियां ग्रेड सी और डी की थी और आवेदन एमए से पीएचडी तक उम्मीदवारों ने किया।

ये भी मानना जरूरी है कि सरकारें रोजगार का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरियों से नहीं मानती है बल्कि इसमें स्वरोजगार और प्राइवेट नौकरियां भी शामिल होती हैं, लेकिन प्राइवेट नौकरियों के हाल भी कोई बहुत बेहतर नहीं हैं। ज्यादातर जगहों पर तो काम करने वालों को वेतन के सिवाय कोई दूसरी सुविधाएं मिलती ही नहीं हैं। इसके अलावा बहुत से कर्मचारी तो ऐसे भी हैं जिन्हें संस्थान की ओर से अपना कर्मचारी तक नहीं दिखाया जाता और वेतन भी नकद राशि देकर भुगतान कर दिया जाता है। इसके लिए काफी हद तक वो कर्मचारी भी जिम्मेदार हैं जो ये सबकुछ सहन करता है और नौकरी जाने के भय से आवाज नहीं उठाता।

कई बार ये भी दलील दी जाती है कि लगातार बढ़ रही जनसंख्या बेरोजगारी की मूल जड़ है। ये कहने वाले सिर्फ अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं करते हैं। तर्कसंगत तरीके से देखा जाये तो किसी भी राज्य में अगर आबादी बढ़ रही है तो वहां सरकारी सेवाओं का दायरा भी बढ़ता है। हम ये भी तो कह सकते हैं कि बढ़ती आबादी रोजगार सर्जन की एक वजह हो सकती है। उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की आबादी अगर 20 करोड़ से ज्यादा या इसके आस-पास है तो ये भी तो सवाल उठता है कि क्या वहां पर सरकारी सेवाएं उस अनुपात में उपलब्ध हैं। सवाल है कि क्या सरकारें इन राज्यों के हर घर को बिजली और साफ पानी देने में कामयाब हो पाई है, क्या सभी गांव में आदमियों और पशुओं के लिए डिस्पेंसरी मौजूद हैं। शिक्षा के प्राथमिक, माध्यमिक और सीनीयर सैकेंडरी स्कूलों की स्थिति क्या है। सवाल ऐसे हैं कि अगर इनपर काम होने लगे तो शायद किसी भी राज्य में बेरोजगार ढूंढ़े ना मिले।

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