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नया हरियाणा

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

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नारायणगढ़ में शौचालयों की खराब हालत के चलते बाहर शौच करने को मजबूर जनता

नगरपालिका शौचालयों में खानापूर्ति भर कर देती हैं, जबकि इनकी साफ सफाई पर ध्यान नहीं देती।

, naya haryana, नया हरियाणा

30 अप्रैल 2018

अजय वालिया

ये दृश्य मेरे शहर नारायणगढ़ के पुराने बस स्टैंड के सामने की बागड़ी बस्ती का है जिसे मैंने आज दिनाँक 29 अप्रैल 2018 को रात 9 बजे अपने कैमरे में कैद किया। आजादी के 71 साल बाद असल में ये मेरे भारत के दुर्भाग्य की तस्वीर है। गौर से देखें तो ये तस्वीर कितना कुछ कह रही है। एक माँ अपनी दो छोटी बच्चियों के साथ नगरपालिका द्वारा उपलब्ध कराए गए मुफ्त शौचालयों के ठीक बाहर अपने झुग्गियों के आगे शौच करा रही है। आखिर क्यों???? 

क्या नगरपालिका नारायणगढ़ इस दृश्य पर कुछ प्रतिक्रिया देगी ? अभी कुछ महीने पहले लाखों के बजट से बनाए गए नगरपालिका के इन शौचालयों की हालत इतनी बुरी है कि आप इन्हें इस्तेमाल करना तो दूर इनको देखने की भी कल्पना नहीं कर सकते। 

70 साल से इस सड़क से एमएलए मंत्री यहाँ से रोज गुजरते हैं। इस बस्ती के आगे मेरे होशोहवास में कितने ही मुख्यमंत्री यहाँ ठीक सामने रैलियाँ करके जा चुके हैं। इनकी आँखों पर वो कौनसा चश्मा है जो ये दृश्य इनको दिखता नहीं या इस दृश्य को ये देखना चाहते नहीं? 

वैसे एक विडम्बनापूर्ण तर्क ये भी है कि कागजों में नारायणगढ़ खुले में शौचमुक्त हो चुका है। 

 असल में ये तस्वीर, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे का सच है। ये स्त्री सम्मान का सच है। ये 71 साल की आजादी के विकास का सच है कि ना इन गरीबों को छत मिली ना शौच जैसी मूलभूत सुविधा .... आप अंदाजा लगा सकते हो कि यदि शौच जैसी सुविधा का ये हाल है तो स्वास्थ्य शिक्षा और रोजगार का सच क्या होगा? 

दो दिन पहले मिट्टी और कबाड़ के ढेर में अनाज के दाने ढूंढते हुए जो पोस्ट मैंने डाली थी ये उसी की अगली कड़ी है। 

ये  बच्चियाँ किसकी अपराधी हैं या इन  बच्चियों का अपराधी कौन है? कौन है जो इनके भविष्य को लील गया है?

मेरे मुल्क के रहबर कहाँ हैं ? वो कहाँ हैं जो हिन्द पर नाज करते हैं?

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