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नया हरियाणा

रविवार, 23 सितंबर 2018

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बसपा-इनेलो के गठबंधन की हो सकती है आज घोषणा

इस गठबंधन को लेकर राजनीति के जानकारों की अलग-अलग राय हैं.

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18 अप्रैल 2018

नया हरियाणा

दोपहर बाद 3 बजे चंडीगढ़ के एक पांच सितारा होटल में इनेलो नेता और विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। पूरी संभावना है कि उनके साथ बसपा के राज्य स्तर और कोई राष्ट्रीय नेता भी होंगे। जो इनेलो और बसपा के गठबंधन की घोषणा कर सकते हैं।

बसपा और इनेलो में इससे पहले भी गठबंधन रहा है, तो ऐसा होने की संभावनाएं अधिक हैं. दूसरी तरफ राजनीति का विश्लेषण करने वालों का दावा है कि यह गठबंधन हुआ तो हरियाणा में इनेलो की सरकार बनने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी. जबकि  क्या है स्थिति उसे देखते और समझने की कोशिश करते हैं-

हरियाणा में इनेलो का वोट प्रतिशत-

हरियाणा में इनेलो का वोट प्रतिशत-

1982 में लगभग 23%--भजनलाल

1987-38.58%,----देवीलाल सरकार ( 5 मुख्यमंत्री)

1991-22.03--भजनलाल

1996-20.56%,--बंसीलाल

2000-29.61%, --ओमप्रकाश चौटाला

2005--26.77%,--भूपेंद्र हुड्डा

2009-25.81%, --भूपेंद्र हुड्डा

2014-24.73%--मनोहरलाल

बसपा का वोट प्रतिशत- 1991-2.32%, 1996-5.44%, 2000--5.74%, 2005-3.22%, 2009-6.74%, 2014-4.37%

2014 के चुनाव में भाजपा को मिले थे 33.20% वोट और कांग्रेस को मिले थे-20.58%, इनेलो-24.73%, बसपा-4.37%

बसपा के मुख्यमंत्री चेहरे अरविंद शर्मा को विधान सभा चुनाव में कुल 10 हजार वोट आए और जीतने वाले को 80 हजार. यह रियल स्थिति है बसपा की.

बसपा के वोट प्रतिशत को जब कुछ अति- उत्साही लोग इनेलो के वोट प्रतिशत में जोड़कर राजनीतिक आंकलन करते हैं, तो वो एक सबसे जरूरी बात को अनदेखा या जानबूझकर इग्नोर कर देते हैं कि बसपा का अपना स्थाई हरियाणा में ज्यादा वोट बैंक है नहीं. जो प्रतिशत उन्हें बसपा का दिखता है, दरअसल वो मायावती के हाथी को चारा(टिकट खरीदकर) डालकर वो उम्मीद्वार लाते हैं, जिनका आजाद उम्मीद्वार के तौर पर अपना एक रूतबा होता है या किसी दूसरे दल से टिकट न मिलने का मायूसी होती है।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि दोनों का गठबंधन दोनों दलों के लिए फायदे का सौदा तो होगा. क्योंकि माया को माया मिल जाएगी और इनेलो को सत्ता मिलने की उम्मीद. अब जो सीट माया बांटेगी, उस एरिया के इनेलो नेता तीन-पांच किए बिना नहीं रहेंगे.

बसपा का असली वोट बैंक एक जाति पर टिके होने के कारण ज्यादा मजबूत दावेदारी बन नहीं पाती. दरअसल मायावती अपने आपको दलित समाज की नेता के रूप में कम से कम हरियाणा में खड़ा नहीं कर पाई. इस गठबंधन में सबसे बड़ा लौचा यह भी है कि इनेलो का वोटर तो ईमानदारी से बसपा को वोट दे देगा, पर बसपा का वोटर इनेलो को उतनी बड़ी मात्रा और ईमानदारी से वोट नहीं देगा. इसके कारण राजनीतिक और सामाजिक दोनों हैं. दूसरी तरफ यह गठबंधन दोनों तरफ के कार्यकर्ताओं को दिल से कभी स्वीकार नहीं होता. हाईकमान अगर राय- शुमारी करवाने लगे तो दोनों तरफ से ना के स्वर ज्यादा मिलेंगे.

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