Hindi Online Test Privacy Policy | About Us | Contact

नया हरियाणा

रविवार, 21 जुलाई 2019

पहला पन्‍ना सर्वे लोकप्रिय 90 विधान सभा हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप English

ब्रिटेन में राष्ट्रमंडल बैठक: क्या प्रधानमंत्री मोदी साध पाएंगे आर्थिक हित

भारत में राष्ट्रमंडल देशों की 2.4 अरब लोगों की आबादी का 55 फ़ीसदी हिस्सा रहता है.

Commonwealth meeting in Britain, Will Prime Minister Modi seek economic benefits?, naya haryana, नया हरियाणा

18 अप्रैल 2018



नया हरियाणा

पिछली साल जब प्रिंस चार्ल्स नवम्बर के महीने में भारत आए थे तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस हफ़्ते लंदन में होने वाली कॉमनवेल्थ बैठक में शामिल होने के लिए महारानी एलिज़ाबेथ का व्यक्तिगत निमंत्रण दिया था.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए 19 से 20 अप्रैल को लंदन में होने वाली कॉमनवेल्थ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में शामिल होंगे. बीते एक दशक में ऐसा करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री होंगे.

मोदी को विशेष निमंत्रण का मतलब?

आखिर भारत के प्रधानमंत्री मोदी को मिले इस निमंत्रण के क्या राजनीतिक और आर्थिक फायदे-नुकसान हो सकते हैं. इस पर  विद्वानों ने अपनी राय दी हैं.
दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़ीं जयश्री सेनगुप्ता बताती हैं, "ब्रिटेन का नरेंद्र मोदी को इस तरह महत्व देना बताता है कि ब्रेक्सिट के बाद के दौर में ब्रिटेन को विदेशी निवेश की बेहद ज़रूरत है." ब्रिटेन और भारत के लिए ये स्थिति ऐसी है जिसमें दोनों देशों का फायदा है.भारत के लिए राष्ट्रमंडल देशों का समूह एक ऐसा मंच है जिसमें वह इस समूह के 53 देशों के साथ रणनीतिक रूप से अपने संबंधों को मजबूत कर सकता है.राष्ट्रमंडल देशों का समूह एक ऐसा मंच भी है जहां चीन की मौजूदगी नहीं है जिससे भारत के पास विश्व मंच पर अपने बड़े प्रतिद्वंद्वी के साये में छुपने का जोख़िम भी नहीं है.

भारत में राष्ट्रमंडल देशों की 2.4 अरब लोगों की आबादी का 55 फ़ीसदी हिस्सा रहता है.ये एक अहम मौका होगा क्योंकि साल 2010 के बाद से पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इस बैठक में भाग लेने वाला है. साल 2011 और 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया था. इसके बाद 2015 में मोदी भी इसमें शामिल होने नहीं पहुंचे थे.भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत को राष्ट्रमंडल देशों में शामिल कराया था.लेकिन उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्रमंडल में रुचि नहीं दिखाई. इसे अक्सर एक औपनिवेशिक पहचान के रूप में देखा गया.

भारत के लिए राष्ट्रमंडल के पुनर्जन्म के मायने
भारत इस मंच की मदद से मुक्त व्यापार, सुरक्षा, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्रों पर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है. किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हर्ष पंत ने बीबीसी को बताया, "भारत मुक्त व्यापार के मुद्दे पर देशों का समूह बनाकर विश्व व्यापार संगठन में अपनी बात पुरजोर अंदाज में रख सकता है. वहां पर आर्थिक खुलेपन को लेकर समर्थन और संरक्षणवाद के ख़िलाफ़ माहौल बनेगा जिससे भारत की व्यापारिक क्षमता पर असर पड़ेगा."वह बताते हैं कि राष्ट्रमंडल समूह के देशों के बीच व्यापारिक खर्चा उन देशों के मुक़ाबले 19 फ़ीसदी कम है जो इसके सदस्य नहीं हैं. राष्ट्रमंडल के बारे में ज़्यादा नहीं जानने वाले भारतीय युवाओं को इसका सीधा फायदा मिलेगा क्योंकि इससे नई नौकरियां पैदा होंगी.

प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं, "अगर राष्ट्रमंडल को एक मंच के रूप में देखें जहां एक तरह के बाज़ार उभर सकते हैं, एक जैसे व्यापारिक मोर्चे सामने आ सकते हैं तो मैं सोचता हूं कि इससे भारत को दूसरे मंचों पर ज़्यादा अधिकार से अपनी बात रखने का मौका मिलेगा. इसमें आदर्श स्थिति ये होगी कि भारत आयात शुल्कों को हटाने की बात करे. भारत इस बारे में बात कर सकता है क्योंकि हम इसके बड़े वैश्विक अर्थों की ओर देख रहे हैं."

साभार-बीबीसी


बाकी समाचार