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नया हरियाणा

बुधवार, 11 दिसंबर 2019

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तपासे के गाल पर देवीलाल के थप्पड़ का सच !

हरियाणा की राजनीति में ये किस्सा खूब चलता है।

देवी लाल, राज्यपाल को मारा थप्पड़, naya haryana, नया हरियाणा

25 नवंबर 2019



वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी


कांग्रेस 36 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में तो जरूर उभरी लेकिन लोकदल -भाजपा गठबंधन 37 सीटें( 31 लोकदल व 6 भाजपा ) हांसिल कर कांग्रेस से महज़ एक पायदान आगे था . सारा दारोमदार 16 निर्दलियों पर था और सरकार के गठन में उन्हीं की अहम भूमिका होनी थी . सतर्क देवीलाल  और मंगलसेन ने सरकार बनाने के लिए आवश्यक 46 विधायक जुटा  लिए. असल में गठबंधन को 9 ही अतिरिक्त विधायकों की जरूरत थी . बिना कोई देरी किये  देवीलाल मंगलसेन के साथ 22 मई( शनिवार),1982 को राज्यपाल तपासे से मिले और सरकार बनाने का दावा पेश किया. तपासे ने उनसे कहा कि पार्टी के विधायकों ने अभी  उन्हें विधायक दल का नेता नहीं चुना है , इसलिए वे विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद 24 मई(सोमवार) को मिलें और विधायकों की गिनती कराएं ताकि वे (राज्यपाल) संतुष्ट हो सकें . देवीलाल का मुख्यमंत्री बनना तय मानते हुए उनके समर्थकों ने प्रदेश भर में उत्सवी माहौल पैदा कर दिया. 

देवीलाल के सामने अब सबसे बड़ी  समस्या शपथ ग्रहण तक विधायकों को भजनलाल की तोड़फोड़ से बचाने की थी क्योंकि भजनलाल अभी भी मुख्यमंत्री थे और आर्थिक व अन्य संसाधनों के मामले में देवीलाल से कहीं बढ़कर थे. सो, देवीलाल सभी 46 विधायकों को हिमाचल प्रदेश के परवानू में ले गए .अगले दिन  जब देवीलाल और उनके साथी भावी सरकार के गठन की योजनाओं को अंतिम रूप दे रहे थे, तभी आल इंडिया रेडियो ने खबर प्रसारित की कि भजनलाल को हरियाणा के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दी गयी है और उन्हें सदन में 30 जून तक बहुमत सिद्ध करना होगा. भजनलाल ने 23 मई(रविवार) को राज्यपाल को 41 विधायकों की ही सूची सौंपी थी ,जिसमें 6 निर्दलीय विधायकों --रहीम खां(नूंह), शारदा रानी(बल्लभगढ़) , राजिंदर सिंह मलिक(कैलाना), सरदार लछमन सिंह(कालका) ,लछमन दास अरोड़ा(सिरसा) व कर्नल राम सिंह(रेवाड़ी) के नाम शामिल थे .

भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाए जाने की  ख़बर देवीलाल के लिए वज्रपात से कम नहीं थी . उनके क्रोध की कोई सीमा नहीं थी . वे राज्यपाल तपासे के इस अनैतिक कदम से इतने खफा थे कि यदि तपासे उनके सामने होते तो उन्हें देवीलाल की पहलवानी का नमूना देखने को मिल जाता, जिसकी एक झलक अगले दिन तपासे को देखने को मिली भी .  तपासे  का यह कदम निश्चित ही देवीलाल के साथ विश्वासघात तो था ही,साथ ही पूरी तरह से पक्षपात पूर्ण भी था. राज्यपाल की  जल्दबाजी से साफ था कि वे "दिल्ली" के प्रभाव में काम कर रहें हैं. उन्होंने न केवल भजनलाल को शपथ दिलाई बल्कि 27 मई को 19 अन्य मंत्रियों को भी उसी दिन शपथ दिलाकर भजनलाल की राह आसान कर दी. जिन मंत्रियों को शपथ दिलाई गयी ,उनमें एक लाल सिंह भी थे जो भजनलाल के निवर्तमान मंत्रिमंडल में डिप्टी मिनिस्टर थे और जिन्हें कांग्रेस से निष्काषित कर दिया गया था. 5 ऐसे लोगों को भी मंत्री बनाया गया जो कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लादे थे . असल में हॉर्स ट्रेडिंग तो बहुमत सिद्ध करने से पहले ही की  जा चुकी थी और वह राज्यपाल की आँखों के सामने हुई थी  लेकिन वे आँखें मूंदे रहे . कहा तो यह भी जाता है कि भजनलाल ने तपासे परिवार को को मुम्बई में इस कृपा के लिए एक बड़ा सा घर भी उपलब्ध कराया. भजनलाल अपनी इस पूरी कवायद के दौरान इंदिरा व राजीव गाँधी के सीधे संपर्क में रहे. 23 मई को उन्होंने इंदिरा गाँधी से मंत्रणा की . यह भी कहा जाता है कि इंदिरा ने तपासे को निर्देश दिए. भजनलाल  दोपहर को इंदिरा के निवास 1, सफ़दर जंग रोड से एयर पोर्ट के लिए निकले और वहां से हरियाणा सरकार के हेलीकाप्टर से सीधे राज भवन गए . जहाँ लगभग सवा घंटे उनकी तपासे से वार्ता हुई . बाहर निकलने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे 6.30 बजे शपथ लेंगे. तयशुदा समय पर शेरवानी और चूड़ीदार पाजामे के परिधान में भजनलाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. 

  उधर , निराश व हताश देवीलाल खेमे में यह तय हुआ कि सभी 46  विधायक राज भवन मार्च करेंगे . निर्धारित समय पर देवीलाल ने सभी 46 विधायकों  की मीडिया  व जनता के सामने परेड कराई. बाद में देवीलाल विधायकों के साथ राज्यपाल तपासे से मिले . इस मुलाक़ात में क्या हुआ , उसकी चर्चा अभी भी हरियाणा के लोग करते हैं.  कहा तो यह जाता है कि क्रोधित देवीलाल ने तपासे को थप्पड़ मारा लेकिन सच यह है कि देवीलाल का मजबूत हाथ तपासे की ठोड़ी तक पहुंचा जरूर था लेकिन साथ बैठे नेताओं की तत्परता से अनहोनी टल गयी . 25 जून को सदन में भजनलाल को बहुमत सिद्ध करना था लेकिन जब तक 46 विधायक देवीलाल की कस्टडी में थे ,तब तक बहुमत सिद्ध कर पाना असंभव था.

इस घटना का विवरण 15 जून ,1982 के  "इंडिया टुडे" के  अंक में यूँ प्रस्तुत किया गया ..."Eighteen hours after Haryana Governor Ganapatrao Devji Tapase committed the most undemocratic faux pas in India's political history, he was cowering on a sofa in the Chandigarh Raj Bhavan's large reception hall.

"This is Haryana!" yelled apoplectic Lok Dal MLAs, eyes bloodshot, neck veins bulging, pressing around the diminutive Tapase in a knee-touching, eyeball-to-eyeball confrontation. "The bullets are going to fly," they chorused, "blood's going to flow!"

Tapase is 73 years old, suffers from herpes, wears a perpetually pained expression, and seems incapable of engaging in coherent conversation. As the verbal assault intensified, led by Lok Dal leader and chief minister-aspirant Devi Lal, Bharatiya Janata Party (BJP) leader Dr Mangal Sein, and lawyers Parkash Singh Daulta and Maharaj Singh, Tapase could only mumble in protest.

At one point, as his hand involuntarily rose to touch his chin, it was brushed brusquely aside by Devi Lal. Growled the hefty Jat leader as he tweaked the governor's chin: "You slave of Indira Gandhi, do you think you can get away with what you've done?" It was incredible political drama, a savage satire on electoral politics, and Tapase had only himself to blame for the mess. That Monday's fracas in the august gubernatorial residence only peaked a sordid week-end. 

  25 जून को सदन में भजनलाल के बहुमत सिद्ध करने तक देवीलाल को अपने विधायक संभालने थे . यह बेहद चुनौतीपूर्ण काम था. देवीलाल ने हर संभव प्रयास किये कि उनके समर्थक विधायकों की संख्या अक्षुण बनी रहे लेकिन यह संभव नहीं हो सका .देवीलाल ने निर्णय लिया कि वे तपासे और भजनलाल को जनता में एक्सपोज करेंगे. इस मकसद से उन्होंने पहली रैली चंडीगढ़ में की . चंडीगढ़ और दिल्ली के बीच भी देवीलाल ने चार जन -सभाएं कर लोगों को अपने साथ हुए विश्वासघात की कहानी सुनाई. इस यात्रा के दौरान ही कई विधायक  मौका पाकर भाग निकले. एक विधायक तो दिल्ली के होटल से ड्रेन पाइप से नीचे उतर कर भाग गया .इस एक महीने में कई विधायक भजनलाल ने तोड़े. कुछेक विधायकों के भागने के किस्से आज भी हरियाणा के लोग याद करते हैं... ये किस्से " पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर " में पढ़े जा सकते हैं .

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