Hindi Online Test Privacy Policy | About Us | Contact

नया हरियाणा

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

पहला पन्‍ना सर्वे लोकप्रिय 90 विधान सभा हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप English

सतनाली गांव पहुंचकर सीएम मनोहर लाल ने अंधविश्वास को दिखाया ठेंगा

मनोहर लाल ने जनभावनाओं से मिली शक्ति के बल पर ये साहस दिखाया है.

सतनाली गांव, महेंद्रगढ़, अंधविश्वास, मिथक, सीएम मनोहर लाल, naya haryana, नया हरियाणा

11 सितंबर 2019



नया हरियाणा

हरियाणा की राजनीतिक हलचलों में आज दो कयास सबसे ज्यादा उफान पर रहे हैं. पहला ये कि कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हो सकता है और दूसरा ये कि इनेलो के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा कांग्रेस या बीजेपी में शामिल हो सकते हैं, जिनमें से ज्यादा संभावनाएं कांग्रेस में शामिल होने की जताई जा रही हैं. थानसेर विधानसभा से बीजेपी के वर्तमान विधायक सुभाष सुधा की टिकट कटने के कोई आसार लग नहीं रहे हैं, दूसरे वो सीएम मनोहर लाल के ‘खास’ भी बताए जाते हैं. ऐसे में समीकरण अशोक अरोड़ा के कांग्रेस में जाने के ज्यादा बन रहे हैं. खैर अशोक अरोड़ा कांग्रेस में जाए या बीजेपी में, इनेलो में टिकते अब मुश्किल लग रहे हैं. 
हरियाणा में अभी तक सीएम की जन आशीर्वाद यात्रा से ऐसा लग रहा था कि चुनाव केवल बीजेपी लड़ रही है. अब कांग्रेस के भीतर की हलचल ने हरियाणा की राजनीति में रोमांच भर दिया है. सीएम की जन आशीर्वाद यात्रा ने कल पीएम की रैली में अपना समापन किया. इस यात्रा के दौरान सीएम मनोहर लाल महेंद्रगढ़ जिले के सतनाली गांव में गए थे, जिसको लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों ने मिथक के नाम पर सतनाली गांव के साथ एक अंधविश्वास जोड़ रखा है कि जो भी मुख्यमंत्री इस गांव में आया है, वो दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है. राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों को समाज में बुद्धिजीवी का दर्जा मिला हुआ है, वहीं इन दोनों वर्ग द्वारा इस तरह अंधविश्वास फैलाना दरअसल बुद्धिजीवी वर्ग को शर्मसार करना है. इन्होंने कुछ आंकड़ों के बल पर अपने अंधविश्वास को तर्क की तरह पेश करते हुए अपनी सद्इच्छा मिक्स करके जनता के सामने परोस दी है.
सतनाली गांव को लेकर इस तरह के दकियानूसी विचार रखना किसी सामाजिक अपराध से कम नहीं है. यह एक तरह का छुआछूत फैलाना है. जिसके जरिए मुख्यमंत्री को इस गांव में जाने से महरूम करना है. जबकि सीएम पूरे प्रदेश का मुखिया होता है. इन चंद पत्रकारों व विश्लेषकों ने किसी भी एंगल से अपना नैतिक व सामाजिक धर्म का निर्वाह नहीं किया है. उन्होंने बताया कि 1967 में पंडित भगवत दयाल शर्मा, बनारसी दास गुप्ता, 1988 में ताऊ देवीलाल, 1992 में भजन लाल, 1998 में बंसीलाल और 2005 में ओमप्रकाश चौटाला ने इस गांव या गांव के आसपास यात्रा की थी. जिसके बाद इनमें से कोई मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. दस साल मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र हुड्डा के पास कई निमंत्रण आए, परंतु उन्होंने डर के कारण कभी उस तरफ रूख नहीं किया. जबकि मनोहर लाल ने इन सभी अंधविश्वासी धारणाओं को धता बताते हुए सतनाली में जाना स्वीकार किया. 
सीएम मनोहर लाल ने जिस साहस का परिचय दिया है और उसे देखकर साफ कहा जा सकता है कि जनता के आशीर्वाद में सचमुच बल होता है. तभी इंसान सत्ता और कुर्सी चले जाने के डर से ऊपर उठकर ‘निरभाग’ घोषित कर दिए गए स्थान पर जाने का साहस जुटा पाता है. पूर्व सीएम हुड्डा की नजर में सतनाली गांव भले ही ‘निरभाग’ या  ‘अपशगुन’ की तरह रहा हो, परंतु मनोहर लाल ने उसे अपना मानकर बिना किसी डर के वहां जाकर मिथकों की आड़ में गढ़े गए अंधविश्वासों को तोड़ने का बौद्धिक व साहसिक काम किया है.
मिथक का पड़ाव सच और झूठ के दो विपरीत छोरों के बीच आता है. मिथक सच नहीं कहते, लेकिन सच होने का आभास देते हैं. इसलिए मिथक ताक़तवर होते हैं और हम उन्हें खालिस झूठ का दर्जा नहीं दे सकते. 
अंधविश्वास केवल धार्मिक नहीं होते बल्कि राजनीतिक भी होते हैं. राजनीतिक अंधविश्वास भारतीय राजनीति में भी खूब सारे हैं. जबकि हर अंधविश्वास में सच का एक अंश होता है. एक छोटा सा हिस्सा जो पूरा सच होने का दावा करता है, जो सच के बाक़ी सब अंशों को दबोच लेता है. इसी कारण अंधविश्वास ख़तरनाक़ होते हैं. नज़र पर पर्दा डाल देते हैं. इसीलिए इन्हें ठीक से समझना ज़रूरी है. इस तरह के अंधविश्वास या मिथक समाज को रूढ़िवादी समाज की तरफ धकेलते हैं. इन अंधविश्वासों को टूटना इसलिए भी जरूरी होता है, क्योंकि राजनीति भारतीय समाज की रगों में दौड़ती है और भारतीय समाज को जागरूक समाज में विकसित करने के लिए इस तरह की धारणाओं का टूटना जरूरी होता है.

Tags:

बाकी समाचार