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नया हरियाणा

रविवार, 17 नवंबर 2019

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इनेलो-जेजेपी खत्म होने के कगार पर, बीजेपी को कांग्रेस देगी चुनौती!

जेजेपी के साथ बसपा ने गठबंधन तोड़कर जेजेपी को दौड़ से बाहर कर दिया है.

INLD-JJP on the verge of ending, Congress will challenge BJP, naya haryana, नया हरियाणा

9 सितंबर 2019



नया हरियाणा

भाजपा ने 2014 लोकसभा चुनाव में सात लोकसभा सीटें जीती थीं और 52 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की थी। इसके बाद विधानसभा चुनाव में 47 सीटों पर जीत का झंडा गाड़ा था। इस बार सभी 10 लोकसभा सीटें जीतने के साथ ही भाजपा ने 79 सीटों पर शानदार बढ़त बनाई। भाजपा ने इस बार उत्तर हरियाणा के साथ-साथ मध्य और दक्षिण हरियाणा में भी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की है। 2009 में कांग्रेस की लोकसभा में 9 सीटें आई थी और 67 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2009 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 40 सीटें ही जीत पाई थी। अगर इनेलो परिवार का विखंडन नहीं हुआ होता तो क्या बीजेपी के लिए 2019 की राह आसान हो सकती थी?
 हालांकि लोकसभा चुनावों के मुद्दे और वोटिंग पैर्टन विधानसभा चुनावों से एकदम अलग होते हैं। क्योंकि बीजेपी भी इन 52 सीटों में से कुछ सीटें हार गई थी और कुछ ऐसी सीटें जीत भी गई थी, जिनमें लोकसभा चुनाव के समय हारी हुई थी। विधानसभा चुनाव में कैंडिडेट और जातिगत समीकरण बहुत मायने रखते हैं। विधानसभा चुनावों में दूसरे दलों द्वारा उतारे जाने वाले प्रत्याशियों से भी खेल बनते और बिगड़ते रहते हैं। कुछ सीटों पर मनोहर लाल के सीएम होने का फायदा मिलेगा तो कुछ सीटों पर इसका नुकसान भी होगा। इस फायदे और नुकसान के गुणा-गणित को लोकल नेता कैसे साधते हैं, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।
इनेलो सुप्रीमो एवं पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला तथा अभय सिंह चौटाला के गढ़ सिरसा में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया है। पिछले चुनाव में भाजपा यहां एकमात्र टोहाना हलके से चुनाव जीती थी। इस बार भाजपा ने सिरसा संसदीय क्षेत्र की सभी नौ सीटों पर बढ़त ली है। भाजपा नैना चौटाला के डबवाली, अभय सिंह चौटाला के ऐलनाबाद और बलकौर सिंह के कालांवाली हलकों में भी आगे रही। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अभय सिंह चौटाला के बूथ में भी सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की है।
हरियाणा में सिरसा जिले की 5 विधानसभा सीटों कालांवाली, ऐलनाबाद, डबवाली, रानियां व सिरसा को इनेलो का गढ़ माना जाता है। 2014 के लोकसभा व विधानसभा चुनाव में सिरसा जिले की सभी 5 सीटों पर इनेलो ने जीत हुई थी। कालांवाली से इनेलो व अकाली गठबंधन के बलकौर सिंह विधायक बने थे, दूसरे नंबर पर कांग्रेस के शीशपाल कहरवाला रहे थे। डबवाली से इनेलो की नैना चौटाला ने जीत दर्ज की थी, दूसरे नंबर पर कांग्रेस के डॉ. केवी सिंह रहे थे। रानियां से इनेलो के रामचंद्र कंबोज विधायक बने थे, दूसरे नंबर पर हलोपा के गोविंद कांडा रहे थे। सिरसा विधानसभा से इनेलो के मक्खन सिंह सिंगला विधायक बने थे, दूसरे नंबर पर हलोपा के गोपाल कांडा रहे थे। ऐलनाबाद से इनेलो के अभय चौटाला की जीत हुई थी, दूसरे नंबर पर भाजपा के पवन बैनीवाल रहे थे। सिरसा से मक्खन लाल सिंगला, कालांवली से बलकौर सिंह, रानियां से रामचंद्र कंबोज बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। डबवाली से नैना चौटाला जेजेपी पार्टी में चली गई हैं और ऐलनाबाद से अभय चौटाला इनेलो में अकेले रह गए हैं। 2019 में सिरसा लोकसभा में बीजेपी की सुनीता दुग्गल ने जीत दर्ज की है, जबकि 2014 में यहां से इनेलो के सांसद चरणजीत सिंह रूडी थे।  इस बार यहां से कांग्रेस दूसरे, जेजेपी और इनेलो तीसरे और चौथे नंबर पर रहे। सिरसा जिले की सभी 5 सीटों पर बीजेपी की जीत हुई है। क्या यही परिणाम 2019 विधानसभा चुनाव में रहने वाले हैं? क्या इन विधानसभा चुनावों में जेजेपी और इनेलो दोनों अपने तथाकथित गढ़ को बचा पाने में सफल हो पाएंगी? या परिवार की टूटन का फायदा सीधे बीजेपी को मिलेगा? बीजेपी की पूरी रणनीति से साफ लग रहा है कि वो हर परिवारवादी नेताओं को उनके गढ़ में ही समेटकर रखना चाहती है। 
ओपी चौटाला, अभय चौटाला, प्रकाश सिंह बादल और खाप पंचायतों के माध्यम से जो चौटाला परिवार को एक करने की कवायद चल रही है, इसके पीछे परिवार को एक करने से ज्यादा सामने दिख रही करारी हार बड़ा कारण हो सकती है। क्योंकि चौटाला परिवार जो इन दिनों नरमी दिखाए हुए है, वो उनके पुराने राजनीतिक इतिहास को देखते हुए एकदम उलट व्यवहार दिख रहा है। चौटाला परिवार का दो पार्टियों में बंट जाने से इनके कोर वोर्टर आपस में बंटकर रह गए हैं और उनका हौंसला टूट चुका है, क्योंकि परिवार के अलग होने से पूर्व बसपा के गठबंधन होने से उन्हें राज आने की पूरी संभावनाएं नजर आने लगी थी। जो परिवार के विखंडन ने पूरी तरह तहस-नहस कर दी हैं। कायदे से जेजेपी की डबवाली में और इनेलो  की ऐलनाबाद में दावेदारी रह गई है। क्या ये दोनों अपनी-अपनी सीट बचा पाएंगे? दरअसल दुष्यंत चौटाला ने जहां अपनी ग्राउंड रूट पार्टी इनेलो को तो खत्म किया ही, खुद भी सोशल मीडिया तक सिकुड़कर रह गए हैं। उनके द्वारा हर रोज नए मुद्दे उछालना सोशल मीडिया के पैर्टन से बहुत मिलता जुलता है। जहां मुद्दों की उमर बहुत छोटी है। दरअसल सोशल मीडिया पर मुद्दे भी मनोरंजन का हिस्सा होते हैं, इसलिए उनमें गंभीरता कम होती है और हो-हल्ला ज्यादा होता है। बीजेपी ने विपक्ष के सामने सोशल मीडिया नामक जुमला फेंक कर उसे सोशल मीडिया तक ही उलझाकर रख दिया है, जिसमें हरियाणा की जेजेपी पार्टी सबसे ज्यादा फंसी हुई दिखती है। जेजेपी की सारी कवायद फेसबुकिया मुद्दों तक सीमित रह गई है।


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