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नया हरियाणा

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

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हरियाणा कांग्रेस की कमान होगी कुमारी शैलजा के हाथ में!

कांग्रेस एक के बाद मिल रही हार के बाद सबक लेने के बजाय किसी चमत्कार के इंतजार में बैठी है.

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28 अगस्त 2019



नया हरियाणा

कांग्रेस एक के बाद मिल रही हार के बाद सबक लेने के बजाय किसी चमत्कार के इंतजार में बैठी है. वैसे तो कांग्रेस पूरे देश भर में मिली करारी हार के बाद भी सबक सीखने को तैयार नहीं है, फिर हरियाणा कांग्रेस से कैसे उम्मीद की जा सकती हैं कि वो कुछ नया और बेहतर करके कांग्रेस की बिगड़ी हालत को सुधारेंगे। हरियाणा में कांग्रेसी नेता अपनी डफली, अपना राग अलापने में लगे हुए हैं. जहां एक तरफ बीजेपी के सीएम मनोहर लाल बीजेपी की लहर होते हुए भी जन आशीर्वाद यात्रा निकाल रहे हैं, वहीं कांग्रेसी नेता किसी चमत्कार की उम्मीद में बैठे हैं। कांग्रेस हाईकमान से हरियाणा कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी सुलझने का नाम नहीं ले रही है. पहले जब कमान राहुल गांधी के हाथ में थी तो माना जा रहा था कि इसी कारण प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर की पॉवर कम नहीं हो रही, परंतु जैसे ही कमान सोनिया गांधी के पास आई तो हुड्डा खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई थी. इस खेमे द्वारा यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि अब मामला सुलझ जाएगा. पर वैसा होता हुआ कुछ दिख नहीं रहा.
हरियाणा में खेमों में बंटी कांग्रेस के अलावा अशोक तंवर और पूर्व सीएम हुड्डा के बीच का शीतयुद्ध मंचों तक साफ दिखने लगा है. 18 अगस्त को पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा की तरफ से रोहतक में महापरिवर्तन रैली का आयोजन किया गया था. सगूफा तो यहां तक छोड़ा गया था कि हुड्डा किसी नई पार्टी का एलान करेंगे या कुछ बड़ा करेंगे. पूर्व सीएम हुड्डा ने मंच से कहा भी कि 'मैं बिना किसी दबाव के, तमाम बंधनों से मुक्त होकर, अपनी आत्मा की आवाज पर...आप लोगों के बीच आया हूं... अब पहले वाली कांग्रेस नहीं रही....कांग्रेस भटक गई है उनके पूरे भाषण से यही निकला कि उन्होंने दबाव की राजनीति का आखिरी दांव खेला है.
उसी मंच से बेरी के विधायक रघुवीर कादयान ने प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर को लेकर जातिगत भेदभाव वाली टिप्पणी तक कर डाली. रघुबीर कादियान ने कहा कि हुड्डा साहब ये जो म्हारी पगड़ी गैरों के सिर पर रखी है,(अशोक तंवर), उसको उतार कर लाएंगे, साबुन से धोकर, आपके सिर पर रखेंगे. ये हमारा वादा है. क्या दलितों की कांग्रेस में यही इज्जत है? एक दलित अध्यक्ष को लेकर कांग्रेस के मंच से इस तरह के भेदभाव भरे बयान दे जाते हैं और उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जाता. गौरतलब है कि इससे पहले हुड्डा गुट के लोगों ने अशोक तंवर की पिटाई करते हुए उनका सिर तक फोड़ दिया था. ऐसे में कांग्रेस के भीतर एकजुट होने की कल्पना करना असंभव लग रहा है.
 हरियाणा विधानसभा चुनाव के नजरिए से देखा जाए तो इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी की पूरी कोशिश है कि विपक्षियों के जो बचे-खुचे गढ़ रह गए हैं, इन्हें इस लहर में पूरी तरह धवस्त कर दिया जाए. 370 खत्म किए जाने के बाद जनता का मन पूरी तरह बीजेपी में रमा हुआ है, ऐसे में बीजेपी इस रमे हुए मन से सारे गढ़ ठहाने के सपने देख रही है.
कांग्रेस के गढ़--- आदमपुर (कुलदीप बिश्नोई), कैथल (रणदीप सुरजेवाला), किलोई(भूपेंद्र हुड्डा), बेरी, झज्जर, महम(आनंद सिंह डांगी), पलवल(करण सिंह दलाल), तिगांव, बरोदा, खरखौदा, तोशाम(किरण चौधरी)
इनेलो का गढ़—ऐलनाबाद (अभय चौटाला)
जेजेपी का गढ़- डबवाली (नैना चौटाला)
दुष्यंत जहां से चुनाव लड़ सकते हैं- उचाना (हालांकि गढ़ बीरेंद्र सिंह का माना जाता है)
ये वो 14 विधानसभा सीटें हैं, जिन पर बीजेपी फतह करने के लिए रणनीति बना रही है. ये गढ़ टूटते ही बीजेपी के 75 के बजाय 85 पार हो जाने की पूरी संभावना है. सवाल यही है कि आखिर इनमें से कौन-कौन से गढ़ तोड़ पाएगी बीजेपी? और कौन से नेता अपने गढ़ को बचा पाएंगे?

सोशल मीडिया पर चर्चाएं हैं कि हरियाणा की कमान अशोक तंवर से छीनकर कांग्रेस कुमारी सैलजा को देने वाली है. हालांकि ऐसी खबरें पिछले कई साल से चल रही हैं. इन खबरों के पीछे सच्चाई कितनी है ये तो कांग्रेस ही बेहतर बता सकती है. दूसरी तरफ तंवर विरोधी खेमे की तरफ से फैलाया गया प्रोपगेंडा भी हो सकता है.


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