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नया हरियाणा

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

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ईशदीप सिंह चाउमिन बेचकर बने सीए

अपने नाम के अनुकूल ईशदीप ने कारनामा करके दिखाया है. ईशदीप के पापा-मम्मी दोनों गुरुद्वारे(बौली साहिब गुरुद्वारा, ढाकौली) के सामने फास्टफूड की दुकान चलाते हैं.

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11 अप्रैल 2018

नया हरियाणा

अपने हालातों को कोसने वाले खूब मिल जाएंगे, पर हालातों से लड़कर जीत को गले लगाने वाले जब मिलते हैं, तो दिल बाग-बाग और दीमाग वाह-वाह किए बिना नहीं रहता. ऐसे नूर कभी खुद से मिल जाते हैं तो कभी किसी दोस्त के बहाने से मिल जाते हैं. और एक पत्रकार के लिए ऐसी खबरें लिखना खुद के जुनून से बातें करना जैसा फील देती हैं. ऐसे ही एक शख्स से हम आज आपको मिलवाने वाले हैं, जिन्होंने हालात के सामने न सिर झुकाया और न अपने हालात का बहाना बनाकर अपनी कमजोरी बनाया, बल्कि अपने जुनून और मेहनत से मुश्किलों को ठिकाने लगा दिया. और यह सब संभव हो पाया परिवार के माध्यम से. दरअसल परिवार ही वह नींव होती है, जिस पर देखते ही देखते बड़े सा बड़ा महल खड़ा हो जाता है. ऐसे ही होनहार बालक और परिवार की कहानी से आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं.
भारतीय सिस्टम में सीए पास करना टफ परीक्षाओं को पास करने में से एक माना जाता है. चाउमिन बेचने वाले परिवार के ईशदीप सिंह ने यह कारनामा कर दिखाया और वो भी मुश्किल हालातों में. दरअसल चार्टर्ड अकाउंटेंट यानी सीए एक प्रतिष्ठित पेशा है और खूब पैसे वाला पेशा माना जाता है. द इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया (आईसीएआई) एक गवनिर्ंग बॉडी है, जो सीए की परीक्षाएं कराती है. इंस्टीट्यूट की फाइनल परीक्षा पास करने वाले छात्रों को इंडस्ट्री में क्वॉलिफाइड चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) के रूप में अच्छी नौकरी मिल जाती है. सीए करने के लिए आपको तीन परीक्षाएं पास करनी होती है. सीपीटी (एंट्रेंस एग्जाम), आईपीसीसी (इंटरमीडिएट एग्जाम) और फाइनल सीए एग्जाम. इन तीनों एग्जाम को क्वालीफाई करने वाले ईशदीप के परिवार में खुशी सभी के चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती है.
हैरानी इस बात को लेकर भी है कि प्रिंट मीडिया के पत्रकार साथियों को इसमें खबर जैसा कुछ नहीं लगा और उन्होंने स्टोरी करने से मना कर दिया. जबकि मेहनत करने वाले और सफल होने वाले युवा हमेशा आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणादायक होते हैं. समाज यूं ही आगे बढ़ता रहा है और बढ़ता रहेगा. ऐसा युवा अंधेरे में जलते दीपक के समान प्रकाश फैलाने का काम करते हैं.

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ईशदीप सिंह चाउमिन बेचकर बने सीए
अपने नाम के अनुकूल ईशदीप ने कारनामा करके दिखाया है. ईशदीप के पापा-मम्मी दोनों गुरुद्वारे(बौली साहिब गुरुद्वारा, ढाकौली) के सामने फास्टफूड की दुकान चलाते हैं.  ईशदीप के पापा और उनके चाचा दो भाई हैं. सरदार गुरदेव सिंह और चाचा सरदार गुरबख्शी सिंह. ईशदीप की माता भूपिंद्र कौर और चाची हरजीत कौर. दोनों भाइयों को एक-एक लड़का और दो-दो लड़कियां हैं. ईशदीप की बड़ी बहन इंद्रवीर कौर(बीए), डाइटिसियन के पास रहकर डाइटिसियन का कोर्स करके डाइटिसियन बनी और उससे छोटी बहन गुरलीन कौर(बीएससी होम साइंस) के बाद डाइटिसियन बनी. दोनों बेटियों की शादी किराए के घर में रहते की. घर का गुजारा चलने लायक आमदनी के साथ मेहनत करना जीवन मूल्यों के रूप में सभी ने आत्मसात् किया हुआ है. आज के दौर में जहां बच्चे मां-बाप के साथ रहना पसंद नहीं करते, पर इनका परिवार आज भी मिल जुलकर रहता है और मेहनत करने पर यकीन रखता है.
लुधियाना से 1999 में घाटा खाकर पंचकूला आ गए. वहां फैक्ट्री में घाटा पड़ गया. यहां आकर शुरू में फड़ी लगाने का काम किया. उसके बाद हैफेड की कैंटिन चलाने का मौका मिला. जिसमें 1 साल 4 महीने में करीब 1 लाख 44 हजार का घाटा खाकर छोड़नी पड़ी. पर कैंटिन चलाते वक्त ईशदीप के मां-बाप दोनों बर्तन धोने का काम करते और सब्जी-रोटी खुद बनाते. शुरू-शुरू में सब्जी में मसालों को लेकर शिकायतें आती कि घर जैसी सब्जी नहीं चलेगी. धीरे-धीरे बनाना सीख गए. शाम को फास्ट फूड आइटम के लिए कारीगर रख लिया. उससे सामान बनवाते और खुद बर्तन साफ करते. कारीगर के रहते बचत नहीं होती थी. समय के साथ खुद बनाना सीखा और खुद ही संभालने लगे. पर घाटे ने पीछा नहीं छोड़ा. आखिरकार कैंटिन छोड़नी पड़ी. पर हिम्मत कभी नहीं छोड़ी. हिम्मतें मर्दा हिम्मतें खुदा-वाले फलसफे पर चलते रहे और मुश्किलों से लड़ते रहे.
ईशदीप के पापा अपने मामा के बुलावे पर पंचकूला आए थे. उन्होंने आने के साथ 6 महीने का राशन लाकर दिया था और बच्चों की पढ़ाई की फीस भर दी थी. उस समय ईशदीप की उम्र मात्र 6 साल थी.पहली क्लास थी. बचपन से पापा के साथ हाथ बंटाना सीख गए और आज भी समय मिलते ही हाथ बंटाने पहुंच जाते हैं चाउमिन की दुकान पर.
सीए बनने की प्रेरणा
10वीं पास की ही थी कि पापा के साथ हरकिशन ट्रस्ट में गए, जिसे गुरुग्रंथ साहिब संस्था चलाती थी. जो गरीब बच्चों को कोचिंग वगैरह देने का काम करती है, वो भी कम पैसों में. वहां ईशदीप के पापा हजार रु भी दे आए इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए और उसके बाद अपने मामा(हरि) जो कि सीए थे, उनसे सलाह करने चले गए. ईशदीप बताते हैं कि हरि अंकल ने कम शब्दों में सलीके की बात बताई कि अगर  सीए बनना चाहोगे तो मेहनत ज्यादा लगेगी और पैसे लगेंगे कम, आएंगे ज्यादा. दूसरी तरफ इंजीनियरिंग में मेहनत कम, पैसे ज्यादा लगेंगे और आएंगे कम. उनकी बात समझ आ गई थी,क्योंकि हमारे पास लगाने को पैसे तो थे नहीं. जबकि सीए में मेहनत भले ही ज्यादा थी, पर वह अपने हाथ में तो थी. बस उसी दिन ठान लिया था कि मेहनत ही है जो हमारे हालात को बदल सकती है. वरना जीवन भर यूं ही खटते रहना पड़ेगा. उसके सरकारी कॉलेज से बीकॉम पास की. इंजीनियर में तो पैसा लगाने को था नहीं, इसलिए सीए बनने का सोचा.तीसरी बार में लास्ट बार सोचकर दिया था. फाइनल रिजल्ट में भी पास हो गया. 
कहते हैं कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती, उनकी मदद के लिए सारी कायनात हाथ आगे बढ़ा देती है. ऐसे ही कुछ सुखद हादसे ईशदीप के साथ भी हुए. जब उनके पास सीए की कोचिंग लेने के लिए पैसे नहीं थे. उन्हें कोचिंग लेनी थी सीपीटी की.जो  स्नातक से पहले करने होती है. 32 सेक्टर में रजनीश मित्तल सर मिलने गया. वहां उनके पीए ने कहा कि पहले फीस जमा करवाओ. फीस थी नहीं. सो मित्तल सर के नाम लैटर लिखकर दे आया. उन्होंने अपने पास बुलाया और बातचीत करने के बाद उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं पैसे नहीं है तो, तुम मेहनत करना चाहते हो तो करो.
 अमूमन हर जगह यही होता चला गया. आधे से ज्यादा फ्री में टयूशन की. ऐसे ही पंकज गुप्ता सर ने कहा कि फीस की बात छोड़ दे, पढ़ना चाहता है तो पढ़. जितने दे सकता हो उतने दे देना. भागमभाग में जिंदगी हाथ पकड़कर सही रास्ते पर लेकर चलती रही और रब ने चाहा तो ये मुकाम भी हासिल हो गया. आज याद आते हैं वो दिन जब मैं  साइकिल से 10 सैक्टर तक जाता और उसके बाद 19 सैक्टर तक और  17 सैक्टर पर साइकिल खड़ी करके बस पकड़ता. आज सोचता हूं तो बहुत अजीब लगता है सोचकर. क्योंकि जब आप किसी जुनून में होते हैं तो आपको खुद की मेहनत देखने का भी मौका नहीं मिलता, क्योंकि आपकी नजर उस समय मंजिल पर होती है और रास्ते में आने वाली दिक्कतें आसान बनती चली जाती हैं. सीए फाइनल 2015 तक आते-आते हाथ बंटाने में कमी जरूर आ गई थी. क्योंकि अंतिम समय में दिन-रात पढ़ाई का तनाव बढ़ जाता है. 
आज सोचता हूं कि परिवार, आस पड़ोस, दोस्तों और रिश्तेदारों ने मेरे लिए कितना कुछ किया है. कोई भी इंसान अकेला कभी आगे नहीं बढ़ता और मंजिल पर पहुंचाने में आपकी पीठ को सहारा और भरोसा देने वाले कितने ही हाथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर आपके साथ होते हैं. जिन्हें अक्सर लोग भूला देते हैं. मेरा परिवार जो कभी फड़ी लगाता था-डेरा बसी आदि जगहों पर और उसके बाद मनियारी और इलैक्ट्रनिक का काम करते थे.हैफेड में घाटा खाकर भी कभी उनके हौसले को जवाब देते नहीं देखा. आज जब उनकी (मम्मी-पापा)  आंखों में मेरे सफल होने की चमक देखता हूं तो लगता है आंखों में सीधे रब उतर आया है. उस समय जो सुकून मिलता है, उस सुकून के लिए लोग पता नहीं कहा-कहा नहीं भटकते और मुझे वो यहीं मिल जाता है.
एक ऐसा दौर भी देखा है जिंदगी में, जब सीए छोड़ने का मन कर गया था. प्रेसर बढ़ता जा रहा था और मन के किसी कोने में हार घर कर गई थी. ऊपर से बड़ी बहन की शादी थी, साथ में सीए के साथ काम भी करना पड़ता था. फिर अंदर से एक आवाज आई कि बेटा छोड़ना तो है ही. एक लास्ट अटैंप तो मारकर देख लें और इसमें लगा दें जितना जोर लगा सकता है. इस बार की तैयारी में सब कुछ बदला हुआ लग रहा था. पढ़ने और सीखने दोनों के रंग-ढंग बदल गए. ईशदीप के पापा बताते हैं कि उनके पास बैंक बैलेंस के नाम पर बच्चों की पढ़ाई ही है. हमें याद हैं वो दिन भी जब हम अपने बच्चों को जेब खर्च भी मुश्किल से दे पाते थे. वो शुक्र है रब का कि बाकी का खर्चा यार, दोस्तों और रिश्तेदारों ने दे दिया.
ईशदीप अपनी सफलता में कहीं-न-कहीं किस्मत को भी मानते हैं और बताते हैं कि मेरा दोस्त मुझसे तगड़ा हार्ड वर्क करता है और पढ़ने में स्मार्ट भी है, पर उसका नहीं हुआ. ऐसे में मुझे कहीं-न-कहीं यह जरूर लगता है कि किस्मत का भी इसमें बड़ा रोल होता है. आप उसे दुआ कहें या कुछ ओर नाम दें. पर कुछ न कुछ होता जरूर है.
 
पैसे आने पर आपके  वैल्यू बदल तो नहीं जाएंगे. इस सवाल के जवाब में मुस्कुराते हुए ईशदीप ने कहा कि जो इतनी जल्दी पलट या बदल जाए वो कम से कम वैल्यू तो नहीं हो सकते. एसी में बैठकर काम करने वाले हर इंसान को पसीने की खुशबू कभी नहीं भूलनी चाहिए. ईशदीप को अंग्रेजी साहित्य लिखने और पढ़ने का भी शौक है. पापा से पंजाबी सीख चुके हैं और उर्दू सीख रहे हैं. दूसरी तरफ ऑनलाइन फ्रेंच सीख रहे हैं. अंग्रेजी बोलने-सीखने के लिए क्या किया का जवाब देते हुए बताते हैं कि दोस्तों के अंग्रेजी फिल्में देखकर, मैग्जीन पढ़कर बोलनी-पढ़नी सीखी.
क्या सीए बनने के बाद खुद का काम  शुरू किया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब देते हुए ईशदीप कहते हैं कि यह आम धारणा होती है कि सीए बन गए हो तो अब लाखों छापोगे. जबकि सीए बनकर आपके परिवार का बैकग्रांउड नहीं है तो आप केवल नौकरी कर सकते हो. ठीक वकील के पेशे की तरह. भारत में ये पेशे परिवार के नाम पर चलते हैं. वरना आपको लंबे संघर्ष के बाद खुद का नाम बनाना पड़ता है. हां, इतना जरूर फायदा मिलता है कि मेरा नाम होने पर मेरे बच्चे इसी फिल्ड में आना चाहेंगे तो उन्हें इसका फायदा मिलेगा. पर फिलहाल मुझे खुद ही करना होगा.
सीए का क्या असली काम दो नंबर के पैसे को ठिकाने लगाने का होता है?
छोटे स्तर पर तो यह होता रहता है, कंपनियों में तो कम से कम हम जैसे नए सीए को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता.  हो सकता है इनर मैनेजमेंट करते हों. हमें तो नार्मल काम करने होते हैं, ईमानदारी से ही काम करना होता है. वैसे भी सीए चाहे तो एक पैसा इधर-उधर नहीं हो सकता. उनकी कलम ही वो रास्ता निकालती है, जिसमें ब्लैक मनी को सफेद किया जाता है. नोटबंदी के समय में सीए ने ही रास्ता निकाला था. सीए पर लगाम कसने वाली कोई संस्था नहीं थी. पहले आईसीआई बॉडी थी.  अब नफरा के नाम से बनाई गई है.  
नोटबंदी से फायदा हुआ या नुकसान
सोच अच्छी थी, पर होमवर्क अच्छे से नहीं किया. इसलिए सफल तो नहीं कह सकते.

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सीए का टेस्ट पास करने के बाद पहला  नौकरी का मौका चंडीगढ़ में ही मिला  था. पर उसमें एक तो सैलरी कम थी, दूसरा उसमें सीखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. इसलिए मैंने विप्रो बैंग्लोर में जाना तय किया, क्योंकि उसमें सीखने के लिए काफी स्कोप था. और मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है. सही मायनों में तो यात्रा अभी शुरू हुई है.
 


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