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नया हरियाणा

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

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झज्जर विधानसभा का राजनीतिक इतिहास

झज्जर विधानसभा सीट 1977 से आरक्षित सीट है

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30 जुलाई 2019



नया हरियाणा

झज्जर विधानसभा सीट 1977 से आरक्षित सीट है. पहले यहां से जनता पार्टी, लोकदल, हविपा, कांग्रेस और आजाद उम्मीदवार विधायक बने और 2005 में भूपेंद्र हुड्डा के सीएम बनने के बाद कांग्रेस का दबदबा रहा है.

2014 के विधानसभा परिणाम

गीता भुक्कल कांग्रेस 51697

साधुराम इनेलो 25113

दरियाव सिंह बीजेपी 20178

साधुराम बीजेपी में शामिल हो गए हैं और रोहतक लोकसभा चुनाव दीपेंद्र हुड्डा के हारने के बाद यहां के हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं. बीजेपी ने अपना हैड कवाटर भी रोहतक में बनाया हुआ है. धीरे-धीरे हुड्डा के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए बीजेपी संघर्षरत है.

 

चौधरी छोटूराम ने 1920 में अपने चुनावी जीवन की शुरुआत झज्जर विधानसभा से ही की थी. तब यह इलाका 'साउथ ईस्ट रोहतक-ग़ैर- मुस्लिम- ग्रामीण' कहलाता था. 1937 के चुनाव में इसका नामकरण 'झज्जर सामान्य ग्रामीण' हो गया. चौधरी छोटूराम ने 1937 में यहीं से चुनाव लड़ा और सर सिकंदर हयात खां की सरकार में विकास मंत्री बने. 1945 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके भतीजे चौधरी श्रीचंद यहां से विजयी हुए. 1946 में कांग्रेस उम्मीदवार प्रोफेसर शेर सिंह ने झज्जर में जीत हासिल की. 1952 में यह डबल सीट हो गई. शेर सिंह सामान्य सीट से और चौधरी चांदराम आरक्षित सीट से विधायक चुने गए. दोनों सीटों पर कांग्रेस का कब्जा था. 1957 में सामान्य सीट तो शेर सिंह ने जीती लेकिन आरक्षित सीट से फूल सिंह विजयी हुए.

1962 का चुनाव हरियाणा के राजनीतिक इतिहास में बेहद चर्चित और निर्णायक माना जाता है. तीन बार से जीत रहे शेर सिंह ने कांग्रेस छोड़कर हरियाणा लोक समिति की स्थापना कर ली और उसके उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतरे. लेकिन कांग्रेस ने जाट बहुल इस क्षेत्र में पंडित भगवत दयाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया. हालांकि 

भगवत दयाल के जीवन का यह पहला चुनाव था लेकिन वह शेर सिंह को पराजित करने में सफल हो गए. भगवत दयाल को 29404 और शेर सिंह को 28122 वोट मिले. 1967 में चौधरी मनफूल सिंह यहां से जीते और कुछ समय के लिए विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे. 1968 मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने महंत गंगासागर को प्रत्याशी बनाया और उन्होंने मनफूल सिंह को मात  दी. 1972 में मनफूल सिंह संगठन कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में पुनः जीते.

1977 चुनाव में झज्जर विधानसभा क्षेत्र आरक्षित हो गया और जनता पार्टी के मांगेराम, विशाल हरियाणा पार्टी के बनारसीदास को पराजित कर विधायक चुने गए. 1982 में बनारसीदास लोकदल से लड़े और कांग्रेसी मांगेराम को हराया. 1987 में चौधरी देवीलाल ने बाबू जगजीवन राम की पुत्री मेधावी कीर्ति को निर्दलीय ही विधानसभा पहुंचा दिया. मेधावी ने कांग्रेस के मांगेराम को हराया. चौधरी देवीलाल ने मेधावी को राज्य मंत्री भी बनाया. 1991 में जनता दल के दरिया सिंह ने कांग्रेस के बनारसीदास को करारी हार दी. 1996 में हरियाणा विकास पार्टी के राम प्रकाश दहिया ने जनहित मोर्चा के कृपाराम पूनिया को हराया. रामप्रकाश मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने चंडीगढ़ जा रहे थे तो उनकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. नतीजतन उपचुनाव हुआ जिसमें उनकी कांता की जीत हुई. चौधरी बंसीलाल ने कांता को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया. लेकिन 1999 में जब बंसीलाल सरकार का पतन हुआ तो कांता इनेलो में शामिल हो गई. वर्ष 2000 विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी दरियाव सिंह ने कांग्रेस के फूल चंद को पराजित किया. 2005 में हरीराम इनेलो प्रत्याशी कांता को हराने में सफल रहे. 2009 और 2014 में गीता भुक्कल ने यहां से जीत दर्ज की. गीता भुक्कल हुड्डा सरकार में शिक्षा मंत्री भी रहीं हैं.

झज्जर विधानसभा क्षेत्र का प्रदेश को पहला मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा, पहला केंद्रीय मंत्री प्रोफेसर शेर सिंह, पहला उपमुख्यमंत्री चौधरी चांदराम और पहले विधानसभा उपाध्यक्ष चौधरी मनफूल सिंह को देने का गौरव हासिल है. साथ ही 3 महिला मंत्री मेधावी कीर्ति, कांता देवी व गीता भुक्कल भी इस विधानसभा क्षेत्र की ही देन हैं.


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